अन्तर्राष्ट्रीय यत्नों का जारी रहना ज़रूरी
इस समय अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर दो बड़े युद्ध जारी हैं। अमरीका और इज़रायल का ईरान के साथ और रूस का यूक्रेन के साथ युद्ध। रूस और यूक्रेन के युद्ध में अब तक भारी विनाश हुआ है। यूक्रेन का चाहे इस युद्ध में बड़ा नुकसान हो चुका है और रूस ने उसके एक बड़े भाग पर कब्ज़ा भी कर लिया है, परन्तु इसके बावजूद ज़ेलेंस्की के नेतृत्व में यूक्रेन इस बड़ी शक्ति के सामने खड़ा है। हथियारों से इसकी सहायता अमरीका और यूरोप के ज्यादातर देश लगातार कर रहे हैं। इज़रायल और ईरान का युद्ध बहुत पुराना है। इज़रायल 1948 में अरब की धरती पर अस्तित्व में आया था। उसी समय से ही यह कई अरब देशों के साथ और ईरान के साथ उलझा रहा है। ईरान ने हमास के अतिरिक्त लेबनान में हिज़बुल्लाह और यमन में हूती लड़ाकों को भी इज़रायल के साथ लड़ाई करने में पूरी सहायता की है और लगातार यह भी दावा किया है कि वह इज़रायल का अरब धरती से अस्तित्व मिटा देगा।
गाज़ा पट्टी पर हमास का कब्ज़ा रहा है। जिसके लड़ाकों ने इज़रायल पर हमला करके उसके सैकड़ों ही नागरिकों की हत्या कर दी थी और ज्यादातर का अपहरण भी कर लिया था, जिसके बाद दोनों देशों में कड़ा टकराव हो गया और गाज़ा पट्टी के फिलिस्तीनी इस युद्ध की चपेट में आ गए, जिन्हें अब तक बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ा है और 70,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इसी वर्ष 28 फरवरी से अमरीका और इज़रायल ने ईरान पर धावा बोला है। उसके वरिष्ठ नेताओं को मार दिया और वहां के मूलभूत ढांचे को बुरी तरह नष्ट कर दिया गया। अब तक हज़ारों ही लोग वहां पर मारे जा चुके हैं। ईरान ने भी प्रत्येक पक्ष से बड़ा नुकसान होने के बावजूद युद्ध जारी रखा है और उसकी ओर से अपने साथ लगते होर्मुज़ समुद्री जल मार्ग पर प्रभावशाली ढंग से कब्ज़ा कर लेने के कारण व्यापार का यह अन्तर्राष्ट्रीय मार्ग बंद हो गया है, जिसका विपरीत प्रभाव विश्व भर पर पड़ा है। इस मार्ग में से लगभग 20 प्रतिशत तेल का आदान-प्रदान होता है। ज्यादातर खाड़ी देश इसके द्वारा ही तेल का व्यापार करते हैं। इसके बंद हो जाने से विश्व में तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिसके प्रभाव से ज्यादातर देशों की आर्थिकता डावांडोल हो चुकी है। चाहे पाकिस्तान, तुर्की और कुछ अन्य देशों ने इस युद्ध को बंद करवाने के यत्न किए हैं परन्तु उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली।
इसी क्रम में अब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की चीन की तीन दिवसीय यात्रा को भी देखा जा सकता है, जिसमें ट्रम्प ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर होर्मुज़ मार्ग खुलवाने के लिए दबाव डाला है। यह मार्ग बंद होने से चीन का भी बड़ा व्यापारिक नुकसान हो रहा है। अमरीका सहित यूरोप और विश्व के बड़े-छोटे देश ईरान से यह मार्ग खुलवाना चाहते हैं। चाहे अब भारत में हुई ‘ब्रिक्स’ देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का हो रहे अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम से सीधा संबंध नहीं है, परन्तु इसमें भी इस युद्ध के प्रभाव को देखा जा सकता है। इस मामले पर इन देशों की आपसी सहमति न होने के कारण इस सम्मेलन का कोई साझा बयान जारी नहीं किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संक्षिप्त अरब अमीरात यात्रा में भी इस युद्ध को रोकने और होर्मुज़ मार्ग खुलवाने की बात मुख्य रूप में उभर कर सामने आई है। ‘ब्रिक्स’ के पहले सदस्य ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका थे। वर्ष 2024 में इसमें मिस्र, इथोपिया, ईरान और यूनाइटेड अरब अमीरात को भी शामिल किया गया था। प्रत्येक वर्ष अलग-अलग देशों में होने वाली इन देशों के प्रमुखों की भेंट को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली माना जाता रहा है। भारत में इस संस्था के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद इसी वर्ष सितम्बर के अंत में दिल्ली में इन सभी देशों के प्रमुखों का शिखर सम्मेलन भी होने जा रहा है।
परन्तु इस पूरे घटित महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम का जारी इन युद्धों पर फिलहाल ज्यादा प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं देता। चाहे ट्रम्प की चीन यात्रा में होर्मुज़ मार्ग खोलने पर सहमति ज़रूर बनी परन्तु ताइवान सहित अन्य बड़े मामलों पर दोनों प्रमुखों की सहमति नहीं बन सकी। इसी तरह ‘ब्रिक्स सम्मेलन’ भी कोई प्रभावशाली परिणाम का धारणी नहीं बन सका, जिस कारण इन युद्धों के बंद होने की अभी सम्भावना नहीं बन सकी। अभी तो इस घटित हो रहे अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम के और भी लम्बा होने की सम्भावना ही बनती दिखाई दे रही है, परन्तु अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर ऐसे यत्न जारी रहने ज़रूरी हैं ताकि निकट भविष्य में कुछ अच्छे और सकारात्मक परिणाम की ओर बढ़ा जा सके।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

