अगले जन्म मुझे सद्बुद्धि दीजो! 

विश्व का सबसे विकसित देश जिसके छींक भर देने से विश्व के देशों को सर्दी पकड़ लेती थी, दुनिया दवाई खोजने निकल पड़ती थी। यहां तक की उसकी खांसी से बाकी देशों को अस्थमा का अटैक पड़ जाता था। आज वही देश खांस-खांसकर बिस्तर पर पड़ा है। याद करिए ज्यादा दिन की बात नहीं हम उसी देश की बात कर रहें हैं। एक ऐसा देश जिसके डॉलर के हल्के से कंपन से गरीब देशों की अर्थव्यवस्थाएं धराशायी हो जाती थीं और जिसके गले में कुछ अटक जाने से पूरा विश्व घबराहट में खांसी की गोलियां खाने लगता था। आज वही देश खुद अस्पताल की बिस्तर यात्रा कर रहा है। कभी जो देश दूसरों के हेल्थ केयर का ज्ञान देता था आज अपने लिए ही डॉक्टर को ढूंढ रहा है।
बचपन में एक कहानी सुनी थी। जंगल में एक शेर था सब उससे डरते थे। उसका रौब ही उसका राज था, उसकी दहाड़ ही कानून थी, उसकी आंखों की चमक अदालत और उसकी पूंछ का झटका फांसी का फरमान पर डर की भी एक सीमा होती है। वैसे भी कहते हैं हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है। डर की भी एक एक्सपायरी डेट होता है। जानवरों ने कहा, अब बहुत हुआ। हमें नहीं खामख्वाह उस शेर की दहाड़ सुननी। जंगल के जानवरों ने फैसला किया अब ऐसे काम नहीं चलेगा। हम इस जंगल में रहेंगे ही नहीं, तो उस शेर से डरना नहीं पड़ेगा।
जानवरों ने जंगल बदल दिया अब नए जंगल में सभी राजा थे किसी को किसी से डरने की ज़रूरत नहीं थी। सब बराबर थे पर सोचने वाली बात यह थी उस शेर का क्या हुआ? वह शेर अपने पुराने जंगल में अकेला दहाड़ता रह गया। उसकी दहाड़ से डरने वाला उसे सुनने वाला कोई नहीं था। राजा शेर अब सोच में पड़ गया कि अब क्या होगा, उसकी बात मानने वाला और डरने वाला तो कोई रह ही नहीं गया।
ठीक इस कहानी की तरह विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका का भी हाल है। कभी जो देश दुनिया को लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लम्बे चौड़े भाषण दिया करता था, अब खुद ही अपनी संसद की कुर्सियां बचाने में लगा हुआ है। रूस कभी उसकी आंखों का इशारा समझ लेता था अब वही रूस शेर की पूंछ पकड़े-पकड़े नाच रहा है। चीन जो कभी सस्ता माल सप्लाई करता था आज उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी तोड़ने की तैयारी में खड़ा है। यूरोप जो कभी उसकी हां में हां मिलाता था आज अपनी ऊर्जा और अपनी सुरक्षा के लिए नए गठबंधन बनाने में लगा है और अंत में बारी आती है भारत की। अब वह भी ‘दूसरों के जंगल’ का दर्शक नहीं रहा। वह खुद दहाड़ने लगा है, अब वह भी आंखें दिखाने लगा है।
अब ट्रम्प दादू को कौन समझाए वह जमाने गए जब उनके एक भाषण एक ट्वीट से सोशल मीडिया कांप जाती थी। अब तो ट्रम्प की बातें सुनकर एक ही मुहावरा याद आता है तेल लगा बैंगन जिसका कोई वजूद नहीं इधर से उधर लुढ़कता ही रहता है। ट्रम्प दादू आपके अपने देश में लोगों को नौकरियां, स्वास्थ्य सुविधाएं और शांति नहीं मिल पा रही और ट्रम्प दादू चाहते हैं कि वह ट्विटर पर ट्रेडिंग करें। अब वह दिन गए भारत को कोई भी आंखें दिखा लेता था। दुनिया यह समझ चुकी है हम जो कहते हैं करके दिखाते हैं। आत्मनिर्भर की बातें सिर्फ बातें नहीं खुली आंखों से देखा गया सच है। हमें अपने पैरों पर चलना भी आता है और दौड़ना भी...
ट्रम्प दादू को भी समझने की ज़रूरत है ईशु का नाम भजने की उम्र में और नाती-पोते खिलाने की उम्र में वो सबसे पंगा लेकर बैठे हैं। सुकून से जीवन जीने की उम्र में वे परमाणु बटन से खेलने का शौक पाल बैठे हैं। अहंकार की चादर इतनी मोटी है कि कोई सलाह, कोई अनुभव, कोई भी तरकीब उन तक पहुंच नहीं पाती। दुनिया भर के छोटे-बड़े देश अब यही कह रहे हैं ‘भाई तू अपने ही जंगल में दहाड़ लो हम अपना रास्ता खुद बना लेंगे’ और सच मानिए धीरे-धीरे लोगों का डर खत्म होने लगा है और ट्रम्प अपने जंगल में अकेले ही दहाड़ रहे हैं। अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि प्रभु सद्बद्धि दो, ये जन्म अहंकार और अड़ियलपन में बीत गया। कम से कम अगला जन्म मोहे ट्रम्प न कीजो।

-लाल बाग कॉलोनी, छोटी बसही
मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड 231001
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