ऊर्जा संरक्षण को जन आन्दोलन बनाया जाना चाहिए

विश्व के सभी देशों में भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए गए हैं। विश्व सबसे कम भारत में दाम बढ़े हैं। यह थोड़ी राहत की बात हो सकती है, परन्तु भारत की जैसी अर्थव्यवस्था पर निश्चित तौर पर यह बढ़े हुए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम आम जनता पर भारी पड़ सकते हैं। भारत में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने का प्रभाव आम जनता पर ही पड़ता है। भारत एक विकासशील देश है और यहां की अर्थव्यवस्था बहुत ही संवेदनशील एवं परिवर्तनशील है। 
देश की जनसंख्या अधिक है। आवश्यक वस्तुओं के यदि थोड़े से भी दाम बढ़ते हैं तो देश की अर्थव्यवस्था पर बेहत प्रभाव पड़ता है। पेट्रोलियम पदार्थ केवल वाहनों का ईंधन भर नहीं हैं, बल्कि आधुनिक औद्योगिक, उत्पादन, ऊर्जा और व्यापार का आधार हैं। जब तेल की कीमतों में वृद्धि होती है तो उसका प्रभाव केवल पेट्रोल पम्प तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि से लेकर कारखानों और आम आदमी की रसोई तक महसूस किया जाता है। आज वैश्विक स्तर पर बढ़ती पेट्रोल-डीज़ल कीमतों ने भारत सहित अनेक देशों की आर्थिक संरचना को झकझोर कर रख दिया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ओपेक देशों की उत्पादन नीतियां तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर बना दिया है। कच्चे तेल के दाम बढ़ गए हैं। इसका सीधा प्रभाव उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल महंगा होने का अर्थ है—देश के आयात बिल में भारी वृद्धि, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और व्यापार घाटे में बढ़ौतरी।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने एक बार कहा था कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें विकासशील देशों के लिए दोहरी चुनौती हैं—एक ओर महंगाई बढ़ती है और दूसरी ओर विकास की गति धीमी पड़ती है। वास्तव में यही स्थिति आज अनेक देशों में दिखाई देती है। बढ़ती ईंधन कीमतों के कारण उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। छोटे और मध्यम उद्योग, जो पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा और मंदी से जूझ रहे थे, वे ऊर्जा लागत के दबाव में कमज़ोर पड़ने लगे हैं। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा संकट वैश्विक आर्थिक मंदी को और गहरा कर सकता है। जब परिवहन और उत्पादन महंगा होता है तो वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। उपभोक्ता कम खरीदारी करते हैं, बाज़ार की मांग घटती है और उद्योगों का विस्तार रुकने लगता है। यूरोप में गैस और तेल संकट ने ऊर्जा आधारित उद्योगों को प्रभावित किया, जबकि एशियाई देशों में आयात लागत ने आर्थिक संतुलन बिगाड़ा।
ऊर्जा संकट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि केवल पारम्परिक ईंधन पर निर्भरता भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है। इसलिए विश्व अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। भारत ने सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में कई योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई मंचों पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भारत के भविष्य की आवश्यकता बताया है। उनका मानना है कि यदि भारत को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाना है तो ऊर्जा के क्षेत्र में आयात निर्भरता कम करनी होगी।
हालांकि केवल नीतियां बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि सार्वजनिक परिवहन को मज़बूत किया जाए, ऊर्जा संरक्षण को जन आंदोलन बनाया जाए और वैकल्पिक ऊर्जा तकनीकों को सस्ता व सुलभ बनाया जाए। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी तेल उत्पादक और उपभोक्ता देशों के बीच संतुलित संवाद आवश्यक है, ताकि बाज़ार में कृत्रिम अस्थिरता कम हो सके।
अंतत: यह कहा जा सकता है कि तेल की बढ़ती धार ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर दिया है। महंगाई, उत्पादन लागत, बेरोज़गारी, व्यापार घाटा और आर्थिक असंतुलन जैसी समस्याएं इसी ऊर्जा संकट की छाया बन कर उभरी हैं। यदि विश्व को स्थिर और संतुलित आर्थिक विकास की ओर बढ़ना है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, संतुलित नीतियों और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता देनी होगी। 


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