विपक्षी पार्टियों के पास एकजुटता के सिवाय कोई हल नहीं

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जबरदस्त जीत ने विपक्ष के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी के बारें में ये कहा जाता था कि उनको हराना बहुत मुश्किल है लेकिन जिस बुरी तरह से वो हारी वो आश्चर्यजनक है। मैं इस बहस में नहीं पड़ता कि भाजपा ने किन हथकंडों का इस्तेमाल किया या फिर उसने चुनाव आयोग की मदद से चुनाव जीता। असली बात ये है कि भाजपा आज बंगाल में सरकार में है और उसके पास 200 से अधिक सीट है। और अगर ये बात मान भी ली जाये तो भी विपक्ष को सोचना होगा कि वो आगे के चुनाव कैसे लड़ेगा और और अगर भाजपा बंगाल के टेमप्लेट को आगे भी दुहराती है तो फिर भाजपा का सामना कांग्रेस और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां कैसे करेंगी।
भाजपा निश्चित तौर पर कांग्रेस को कमजोर करना चाहती है, लेकिन उससे ज्यादा वो क्षेत्रीय दलों को खत्म करने पर जोर देगी। क्योंकि भाजपा की विचारधारा में क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी भारत नामक राष्ट्र राज्य को कमजोर करता है। वो संघवाद को भारत की कमजोरी का प्रतीक मानती है। वो एक मज़बूत राष्ट्रीय राजनीति और राजनीतिक दल की पक्षधर है। उसे लगता है कि क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी व क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल कहीं न कहीं केंद्रीय राजनीति को कमजोर करता है। दीन दयाल उपाध्याय एकात्म मानववाद के अपने भाषण में कहते हैं कि कहां है भारत माता? कही बंग माता दिखती है तो कही। तेलुगु माता और तमिल माता। गोलवलकर भी संघवाद की जगह एकीकृत सत्ता की वकालत करते हैं। ऐसे में भाजपा ये चाहेंगी कि क्षेत्रीय दल खत्म हो जाये। 
उसकी राजनीति साफ है। जब वो कमजोर थी तो उसने क्षेत्रीय या फिर समाजवादी आंदोलन से निकले दलों का सहारा लिया, अपने को मज़बूत किया और बाद में उसे पूरी तरह चूस कर फेंक दिया। या फिर उनको इतना कमजोर कर दिया कि वो भाजपा के सामने पूरी तरह नतमस्तक हो गये। खुद तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से अलग होने के बाद भाजपा से हांथ मिलाया और बंगाल में उसको खड़ा करने में मदद की। यही काम उड़ीसा में बीजू जनता दल ने किया था या फिर असम में असम गण परिषद ने। आज तीनों राज्यों में भाजपा की बहुमत वाली सरकार है। और तीनों दल अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहे हैं। ये वो राज्य जहां 2014 के पहले भाजपा मज़बूत नहीं थी। 
2024 के चुनाव में भाजपा की हालत खराब हो गई थी। वो तीसरी बार सरकार में तो आयी लेकिन भाजपा की सीटें घट कर 240 रह गई। बहुमत से 32 सीटें कम। ये भाजपा के लिये खतरे की घंटी थी। उसने अपनी रणनीति बदली और उसके बाद उसने एक के बाद एक विधानसभा के चुनाव जीते। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव उदाहरण हैं। इन राज्यों में विपक्ष की जीत तय मानी जा रही थी, लेकिन भाजपा भारी बहुमत से जीती। फिर उसने बिहार, असम और बंगाल में चमत्कार किया। भले ही इन सभी जीत के लिये एसआईआर को दोष दिया जाये लेकिन हकीकत ये है कि आज तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और विपक्ष कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। और बंगाल की जीत के बाद ये कहा जा रहा है कि अब भाजपा को यूपी और उत्तराखंड में हराना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में विपक्ष के पास दो विकल्प हैं। या तो वो पूरी तरह से भाजपा के सामने सरेंडर कर दे या फिर मज़बूती से सामना करे। 
सचाई ये है कि भाजपा का सामना ये विपक्षी दल अकेले कर नहीं सकते। वो भाजपा को तभी रोक सकते हैं या फिर हरा सकते हैं जब सभी दल अपने मतभेदों को भुलाकर एकजुट हों और किलर इंस्टिंक्ट के साथ लड़ें। क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस से शिकायत हो सकती है, राहुल की लीडरशिप पसंद न हो लेकिन जब सवाल अस्तित्व का हो तो ये प्रश्न गौण हो जाते हैं। ये भी बड़ा सच है कि बिना कांग्रेस के न तो विपक्षी एकता हो सकती है और न ही उसके बगैर भाजपा को हराया जा सकता है। आज की तारीख में कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार है, तीन राज्यों में वो गठबंधन की सरकार में शामिल है। और अखिल भारतीय स्तर पर उसके बार 22 प्रतिशत वोट है। ऐसे में कांग्रेस को छोड़कर कोई विपक्षी एकता हो भी जाये तो वो कारगर साबित नहीं होगी। 
ममता और स्टालिन को राहुल से शिकायत हो सकती है लेकिन ये सवाल एक कमरे में बंद हो कर सुलझाये जा सकते हैं, लेकिन अगर सार्वजनिक तौर पर एक दूसरे पर हमले किये गये तो फिर सब डूबेंगे, बचेगा कोई नहीं। अतीत इस बात गवाह है कि विपक्ष चाहे कितना ही कमजोर क्यों न रहा हो, जब एकजुट हुआ, उसने केंद्रीय सत्ता नाकों चने चबवाये। 1967 मे विपक्षी एकता ने कांग्रेस को पहली बार नीचा दिखाया। नौ राज्यों में संयुक्त विपक्ष की सरकार बनीं थी। 1977 में कांग्रेस चुनाव हार गई और यही कस्सि 1989 में दोहराया गया। 2024 में भी विपक्ष एकजुट हुआ था भाजपा के खिलाफ मोदी को बहुमत नहीं मिला। बनारस में भी उनकी जीत का मार्जिन काफी कम हो गया। वो तस्वीर याद होगी जब ‘इंडिया गठबंधन’ के 24 दलों के मोर्चे के खिलाफ भाजपा ने 38 दलों को इकट्ठा कर फोटो खिंचवाई थी। 
इस बार भाजपा पहले की तुलना में काफी सतर्क होगी। उसे गच्चा दे पाना आसान नहीं होगा। फिर भाजपा ने जिस तरह हरियाणा चुनाव के बाद अपने को संगठित किया है, नया अंदाज दिया है और वो अपराजेय लगने लगी है वैसे में विपक्ष को 2024 की अपेक्षा अधिक संगठित होना होगा। एक स्वर में बात करनी होगी। एक ज़बान बोलनी होगी। सार्वजनिक स्तर पर एक-दूसरे पर हमले बंद करने होंगे, एक राष्ट्रीय कमेटी बनानी होगी, एक राष्ट्रीय एजेंडा तय करने होगा और निरंतर एक-दूसरे से सलाह मशविरा कर फैसले करने होंगे ताकि जनता को लगे कि विपक्ष सिर्फ कहने को एकजुट नहीं हुआ है, वो भाजपा को हटाने के लिये रणनीतिक तौर पर भी तैयार है। एकजुटता आज के विपक्ष की एक मात्र कुंजी है। और अगर वो आपस में लड़ते रहे, तो संसदीय चुनाव तक आधे विपक्षी दलों के नेता या तो जेल में होंगे या फिर आधी पार्टियां टूट कर शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बन जायेगी। और तब रोने के लिये कोई कंधा नहीं मिलेगा।

#विपक्षी पार्टियों के पास एकजुटता के सिवाय कोई हल नहीं