अनाज के भंडारण की समस्या
कोई समय था जब भारत में खाने वाले मुख्य अनाज की बड़ी समस्या थी। देश को अपने करोड़ों लोगों की मूलभूत ज़रूरतों के लिए बड़ी मात्रा में अनाज आयात करना पड़ता था। गेहूं और चावल विदेशों से अधिक मंगवाए जाते थे, जिनका सीधा संबंध लोगों की खाद्य ज़रूरत पूरी करने के साथ होता है। उस समय अन्य देशों के साथ-साथ अमरीका से बड़ी मात्रा में गेहूं मंगवाई जाती थी। धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के आने से भारत अनाज उत्पादन के मामले में अपने पैरों पर खड़ा होना शुरू हो गया था।
पंजाब का क्षेत्र देश की धरती का 2 प्रतिशत के लगभग है परन्तु 1960 के दशक में हरितक्रांति आने से पंजाब ने देश के लिए अधिक से अधिक गेहूं और धान पैदा करना शुरू कर दिया था। जिससे इस क्षेत्र में बड़ी तबदीली आई। पिछला लम्बा समय पंजाब देश के खाद्य क्षेत्र में बड़ा हिस्सा डालता रहा है। परन्तु आज हालात बदल चुके हैं। देश अनाज के क्षेत्र में आत्म-निर्भर ही नहीं हो रहा बल्कि इसने बड़ी मात्रा में अनाज विशेषतौर पर चावल और गेहूं विदेशों की मंडियों में भी भेजने शुरू कर दिए हैं। अब पंजाब और हरियाणा में ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में भी यह फसलें पूरी तरह प्रफुल्लित होनी शुरू हो गई हैं। इससे देश में पंजाब और हरियाणा की इन फसलों की मांग घटनी शुरू हो गई है। प्रदेश के लिए यह भी एक बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषतौर पर धान का अधिक से अधिक उत्पादन पंजाब के लिए अब इस कारण नकारात्मक बनता नज़र आ रहा कि इसके उत्पादन के लिए पानी की बहुत खपत होती है। इस कारण सबसे बड़ा नुकसान भूमिगत पानी का हो रहा है और इस बात की भारी संभावना है कि आगामी कुछ समय में ही पंजाब में पानी का संकट गहरा हो जाएगा। पहली सरकारों ने भी नहरी पानी खेतों तक पहुंचाने के यत्न किए थे, परन्तु पंजाब की मौजूदा सरकार के इस पक्ष से किए यत्न बेहद सफल दिखाई दे रहे हैं। यदि नहरी पानी का पुन: अधिक इस्तेमाल किया जाए तो इससे भी भू-जल के गिरते स्तर की समस्या का कुछ हद तक समाधान किया जा सकता है। इसके साथ ही गेहूं तथा चावल के अधिक उत्पादन के भंडारण की बड़ी समस्या हरियाणा तथा पंजाब की राज्य सरकारों को ही नहीं पेश आ रही, अपितु यह देश के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है। इन दोनों फसलों का अब देश की ज़रूरत से अधिक उत्पादन हो रहा है, जिनके भंडारण की समस्या गम्भीर होती जा रही है। गोदामों की कमी बुरी तरह खटकने लगी है।
इसलिए ज़्यादातर अनाज के रख-रखाव को प्रकृति के भरोसे ही छोड़ दिया जाता है। खुले आसमान के नीचे इन फसलों की लगीं ढेरियां बड़ी होती जा रही हैं, जो कि बहुत चिन्ता का विषय है, क्योंकि इस तरह के रख-रखाव से अनाज का बहुत नुकसान होता है। विगत वर्षों में भी यह देखा गया है कि अधिक समय तक खुले आसमान में पड़े तथा गोदामों में पड़े अनाज की गुणवत्ता पर व्यापक प्रभाव पड़ने से यह बेहद खराब हो जाता है, जो अरबों-खरबों के नुकसान का कारण बनता है। एक ओर बढ़ती जनसंख्या को हमारी सरकारें सीमित करने से असमर्थ रही हैं, दूसरी ओर अनाज का यह अनादर तथा नुकसान हमारी समूची योजनाबंदी को मुंह चिढ़ाता दिखाई देता है। विगत कुछ वर्षों से पहले रूस तथा यूक्रेन के भीषण युद्ध और बाद में अब पश्चिम एशिया के हो रहे युद्ध ने भारत की अनाज निर्यात करने की कार्रवाइयों पर बड़ा प्रभाव डाला है, जिससे अनाज भंडारण की समस्या और भी गम्भीर हो चुकी है। इस अनाज भंडारण के रख-रखाव के लिए किए जाने वाले प्राथमिक प्रबंधों की कमज़ोरी देश के लिए और भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है, जिसके प्रति केन्द्र तथा राज्य सरकारों को पूरी तरह तत्परता दिखाते हुए गोदामों के विस्तार तथा फसली चक्र की पुन: योजनाबंदी किए जाने की ज़रूरत होगी। इस संबंधी किसी भी हाल में सरकारों को लापरवाह नहीं होना चाहिए।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द



