फसली विभिन्नता के लिए आवश्यक कदम उठाने की ज़रूरत
फसली विभिन्नता, विशेषकर खरीफ के मौसम में, समय की ज़रूरत है। धान की काश्त का रकबा बढ़कर 32 लाख हैक्टेयर से पार हो गया है। सब्ज़ क्रांति के बाद रकबा बढ़ना शुरू हुआ और फिर लगातार बढ़ता ही गया। अनुसंधान संस्थाओं द्वारा भी इसका योग्य विकल्प नहीं दिया गया ताकि किसानों को धान जितना लाभ हो सके। यही कारण है कि हर वर्ष धान का रकबा बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ गत सप्ताह की गई मुलाकात में भी फसली विभिन्नता की बात उभर कर सामने आई। किसान इस वर्ष फिर कोई अन्य लाभदायक विकल्प न होने के कारण अधिक से अधिक रकबे पर धान की काश्त करने को आमादा हैं। लेकिन वे दुविधा में हैं कि धान की कौन-सी किस्म लगाई जाए। पीएयू द्वारा विकसित पी.आर.-126 और आईएआरआई द्वारा जारी की गईं पूसा-1824 और पूसा-2090 किस्में जो पकने में कम समय लेती हैं, की बिजाई के लिए किसान अधिक सोच रहे हैं। चाहे आईएआरआई की ये दोनों किस्में लम्बा समय लेकर सबसे अधिक उत्पादन देने वाली पूसा-44 के विकल्प के रूप में घोषित की गई हैं, परन्तु अभी किसानों में अधिक लोकप्रिय नहीं हुईं।
मंडी में कई अप्रमाणित किस्में तथा हाईब्रिड किस्मों के बीज निजी कम्पनियों द्वारा बेचे जा रहे हैं। किसान उन्हें अपना रहे हैं, क्योंकि इनका उत्पादन अधिक है और कीटनाशकों तथा अन्य सामग्री पर कम खर्च आता है। पंजाब सरकार ने हाइब्रिड किस्मों की काश्त पर पाबंदी लगाई थी, क्योंकि इन किस्मों की फसल में टोटा अधिक निकलता है और मिलें इनका विरोध कर रही हैं। इन किस्मों की फसलों के मंडीकरण में भी किसानों को मुश्किलें आ रही हैं और एफसीआई तथा संबंधित खरीद एजेंसियां किसानों की एमएसपी पर फसल बेचने की ज़ोरदार मांग को ध्यान में रखते हुए मिल मालिकों के विरोध के बावजूद उनकी फसल एमएसपी पर लेने के लिए मजबूर थे। हाइब्रिड से चावल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। हाइब्रिड निजी कंपनियों ने माननीय अदालतों मे पहुंच करके पंजाब सरकार का हाइब्रिड की काश्त न करने का आदेश रद्द करवा दिया। अब कुछ निजी कंपनियां करोड़ों रुपये का हाइब्रिड किस्में का बीज बेच रही हैं। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री से अपनी मुलाकात के दौरान मांग की थी कि कुछ हाइब्रिड किस्मों के बीजों को डी-नोटिफाई किया जाए। पंजाब केंद्रीय अनाज भंडार में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। चावल की गुणवत्ता बरकरार रहनी चाहिए।
केन्द्र सरकार ने जो 2026-27 के लिए धान की एमएसपी में 72 रुपये बढ़ाकर 2441 रुपये प्रति क्ंिवटल की है (ए-ग्रेड धान की कीमत बढ़ा कर 2461 रुपये की गई है)। कृषि खर्चे बेहद बढ़ जाने के कारण किसान इससे संतुष्ट नहीं हैं। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल और कन्सोर्टियम आफ इंडियान फार्मर्स एसोसिएशन के नेता सतनाम सिंह बेहरू ने एमएसपी में बढ़ोतरी को बिल्कुल नाकाफी बताते हुए रद्द कर दिया है। फसली विभिन्नता के लिए मक्की, कपास, दालें और तेल बीज फसलों आदि की एमएसपी बढ़ा कर इन फसलों के लिए जो लक्ष्य तय किए गए हैं, उनसे धान की काश्त का रकबा कम होने की कोई संभावना नहीं है। मक्की की काश्त बढ़ाने के लिए कई सालों से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसमें कोई खास सफलता नहीं मिली। जो पंजाब सरकार ने 20 हज़ार हैक्टेयर रकबा धान की फसल से निकाल कर मक्की की काश्त बढ़ा कर 2 लाख हैक्टेयर रकबे पर मक्की की बिजाई का लक्ष्य रखा है, उसे हासिल करने की सम्भावना बहुत कम है। फिर पीएयू से सम्मानित प्रगतिशील किसान राजमोहन सिंह कालेका का कहना है कि मक्की की एमएसपी पर भी किसानों की फसल विगत वर्षों में नहीं बिकी। इस बार तो एमएसपी में वृद्धि भी मामूली की गई है।
बासमती ही एक ऐसी फसल है, जिसे अपनाने से फसली विभिन्नता की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। बासमती को पानी की ज़रूरत कम होती है और कई कम समय में पकने वाली किस्में मॉनसून की बारिश से ही पक जाती हैं। विगत वर्षों में बासमती की काश्त का रकबा बढ़ कर 7 लाख हैक्टेयर हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार रकबे 10 लाख हैक्टेयर तक ले जाने की गुंजाइश है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और बासमती के प्रसिद्ध निर्यातक विजय सेतिया कहते हैं कि बासमती का भविष्य उज्वल है। इस समय बासमती का किसानों को अच्छा दाम मिल रहा है और इस साल की फसल भी पश्चिम एशिया में युद्ध के बावजूद लाभदायक दाम पर बिकने की संभावना है। सिर्फ ज़रूरत है किसानों को शुद्ध बीज उपलब्ध करने की। इससे बासमती की गुणवत्ता में सुधार आएगा और किसानों को मंडी में लाभदायक दाम मिलेगा। बीज बदल दर जो कम से कम 33 प्रतिशत तक होना चाहिए, कम हो रही है, जो चिंता का विषय है। इस वर्ष प्रमाणित विक्रेताओं का तस्दीकशुदा बीज न बिकने के कारण भारी मात्रा में पड़ा है। इससे पता चलता है कि किसान अपने बीज या मंडी में बिक रहीं अप्रमाणित हाइब्रिड किस्मों के बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, जो खतरे की घंटी है। पंजाब सरकार ने हाईकोर्ट के निजी कंपनियों के हाइब्रिड बीजों की काश्त को छूट देने वाले फैसले को रद्द करवाने के लिए अपील की हुई है। विभिन्नता के लिए दूसरी योग्य फसल फलों और सब्ज़ियों की काश्त है। पिछले सालों के दौरान इनका कुछ रकबा बढ़ा है। इस प्रकार बासमती तथा फलों को अधिक मज़बूती से फसली विभिन्नता योजना में लाया जाए ताकि जो धान की काश्त में से कुछ रकबा निकल आए।
पानी की अधिक खपत होने और ट्यूबवेल के बेवजह चलने से राज्य के 150 ब्लॉकों में से 117 ब्लॉकों में भू-जल का स्तर ‘ब्लैक ज़ोन’ में आ गया है। धान की बजाय वैकल्पिक फसलों की काश्त बहुत ज़रूरी है। पंजाब की ज़मीन उपजाऊ और उत्पादक होने के कारण कई वैकल्पिक फसलों की सफलतापूवर्क काश्त की जा सकती हैं, लेकिन ऐसी फसलें, जो धान जितना ही मुनाफा दे सकें, का अनुसंधान करके पीएयू तथा आईएआरआई द्वारा किसानों को सिफारिश करने की ज़रूरत है।



