प्रशंसनीय फैसला
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां शामिल थे, द्वारा गत दिवस जम्मू-कश्मीर के एक व्यक्ति इफ्तिखार अंदराबी जो नशा तस्करी और आतंकवाद की फंडिग के आरोप में ़गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने संबंधी एक्ट (यू.ए.पी.ए.) के तहत पिछले 5 वर्ष से जेल में नज़रबंद था, को ज़मानत देते समय ऐसी टिप्पणियां की हैं जो देश के न्यायिक और राजनीतिक क्षेत्रों में बड़ी चर्चा का विषय बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के इन न्यायाधीशों ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि यू.ए.पी.ए. जैसे कड़े कानून के तहत नज़रबंद व्यक्तियों के मामले यदि लम्बे समय तक लटकते हैं तो उन्हें ज़मानत भी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की कानून व्यवस्था में ज़मानत नियम और नज़रबंदी अपवाद एक महत्त्वपूर्ण धारणा ही नहीं, अपितु कानून की भावना के अनुसार है। इसका पालन होना चाहिए। किसी व्यक्ति को इस कारण ज़मानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसकी यू.ए.पी.ए. जैसे कड़े कानून के तहत गिरफ्तारी की गई है या सरकार यह समझती है कि आरोपी के खिल़ाफ प्राथमिक मामले के सबूत मौजूद हैं।
माननीय न्यायाधीशों ने यह भी कहा है कि यू.ए.पी.ए. की धारा 43-डी (5) जो ऐसे आरोपियों को ज़मानत देने की सम्भावनाओं को कम करती है, को भी संविधान की धारा 21 जोकि व्यक्ति को जीने का अधिकार देती है, के तहत रख कर ही देखा जाना चाहिए। यू.ए.पी.ए. कानून की धारा 43-डी (5) के दृष्टिगत किसी को ज़मानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां यह भी वर्णनीय है कि उपरोक्त न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट की ही एक पीठ द्वारा 2020 के दिल्ली दंगों के आरोपियों उमर ़खालिद और शरजील जो यू.ए.पी.ए. कानून के तहत ही पिछले 5 वर्ष से जेल में बंद हैं, को ज़मानत देने से किए गए इनकार का भी गम्भीर संज्ञान लेते हुए उक्त पीठ के फैसले से अपने मतभेद का प्रगटावा किया है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां ने स्पष्ट रूप में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के के.ए.नजीब मामले में दिए गए फैसले की रौशनी में उमर ़खालिद और शरजील को भी ज़मानत दी जानी चाहिए थी। क्योंकि वह भी पिछले पांच वर्ष से नज़रबंद हैं।
इस संबंध में हमारा यह भी स्पष्ट विचार है कि किसी व्यक्ति को इसलिए भी लम्बे समय तक जेल में नहीं डाला जा सकता कि उसके विरुद्ध नैशनल सिक्योरिटी एक्ट (एन.एस.ए.) या अनलॉफुल एक्टीविटीज़ (परिवैंशन) कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। पिछले समय में यह फैशन ही बन गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा अपने राजनीतिक और विचारधारक विरोधियों या किसी मुद्दे पर आन्दोलन करने वालों को एन.एस.ए. या यू.ए.पी.ए. जैसे काले कानून के तहत नज़रबंद करके वर्षों तक जेल में डाल दिया जाता है। अदालतें ऐसे व्यक्तियों को इसी कारण ज़मानत नहीं देतीं क्योंकि इनके ऊपर सरकारों द्वारा कड़े कानून के तहत मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि अदालतों में ऐसे व्यक्तियों के मामलों की सुनवाई होती है और फैसले होते हैं तो 5 प्रतिशत व्यक्ति भी दोषी नहीं पाए जाते और संबंधित व्यक्ति बरी हो जाते हैं यदि ज्यादा पीछे न जाएं तो हमारे सामने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा शास्त्री सोनम वांगचुक और अमृत पाल सिंह के उदाहरण मौजूद हैं। उपरोक्त दोनों व्यक्तियों को एन.एस.ए. के तहत लम्बे समय तक जेल में रखा गया था। सोनम वांगचुक को तो जनाक्रोश के तहत सरकार रिहा करने हेतु विवश हो गई है। अब अमृतपाल सिंह से भी एन.एस.ए. तो हटा लिया गया है परन्तु अन्य मामलों के तहत अभी भी वह असम की डिब्रूगढ़ जेल में नज़र बंद हैं।
इस सन्दर्भ में हमारा स्पष्ट विचार है कि एन.एस.ए. और यू.ए.पी.ए. जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल आतंकवाद या देश-द्रोह से संबंधित बहुत ही गम्भीर आरोपों के मामले में सिर्फ उनके विरुद्ध ही होना चाहिए जिनके विरुद्ध न झुठलाए जाने वाले ठोस सबूत हों। ऐसे मामलों में भी आरोपियों को अपना पक्ष पेश करने का और स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने का पूरा-पूरा अवसर मिलना चाहिए। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां कानून का शासन है। सरकार देश के भीतर और देश के बाहर भी अपने इस संकल्प का ज़ोर-शोर से प्रचार भी करती है, परन्तु जब सरकारों द्वारा अपने राजनीतिक और विचारधारक विरोधियों या आन्दोलनकारियों की ज़ुबान बंद करने के लिए उन्हें कड़े कानूनों के तहत जेल में डाला जाता है तो देश में आज़ादी, लोकतंत्र और कानून के शासन की धारणा को भारी आघात पहुंचता है। इससे विदेशों में भी देश की छवि खराब होती है, पीड़ित लोगों के मानवाधिकारों का भी घोर उल्लंघन होता है। उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त फैसले से हमारी सरकारें भी कोई सबक ज़रूर लेंगी।

