सतीशन केरलम के नये मुख्यमंत्री, दक्षिण में अब उन्हीं के भरोसे है कांग्रेस
स्वघोषित तौर पर नेहरुवादी समाजवाद के समर्थक कांग्रेस नेता वीडी सतीशन ने 20 अन्य मंत्रियों के साथ 18 मई 2026 की सुबह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं व अन्य प्रदेशों में उसके मुख्यमंत्रियों के समक्ष केरलम के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस तरह कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन दस साल बाद तिरुवनंतपुरम में शासन करने के लिए लौटा, वामपंथियों को विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त देने के बाद, जिसके नतीजे 4 मई 2026 को घोषित किये गये थे। हालांकि कांग्रेस को अपना नया मुख्यमंत्री चुनने में काफी समय लगा; क्योंकि इस पद के लिए अनेक मज़बूत दावेदार थे, लेकिन केरलम की बागडोर संभालते ही सतीशन हरकत में आ गये और उनके काबिना की पहली बैठक में अनेक कल्याणकारी फैसलों को मंजूरी दी गई, जिनमें विशेषरूप से शामिल हैं केएसआरटीएस बसों में महिलाओं के लिए 15 जून 2026 से मुफ्त यात्रा, आशा बहनों के भत्ते में 3,000 रूपये मासिक की वृद्धि व वरिष्ठ नागरिकों हेतु एक अलग विभाग की स्थापना।
तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह वैसे तो बहुत भव्य था, लेकिन दो व्यक्तियों के अनुपस्थिति ने सियासी अटकलों को गर्म रखा। एक, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय, जिन्हें इस पद तक पहुंचाने में कांग्रेस की विशेष भूमिका रही थी; क्योंकि वह बहुमत से 10 विधायक कम थे, समारोह में नहीं आये, जबकि उन्हें निमंत्रण दिया गया था। उनकी अनुपस्थिति का आधिकारिक कारण सचिवालय में उनकी पूर्व निर्धारित व्यस्तता बताया गया। लेकिन प्रबल संभावना यह प्रतीत होती है कि अन्ना द्रमुक के बागी 24 विधायकों का समर्थन मिलने के बाद विजय कांग्रेस की बैसाखियों की ज़रूरत महसूस नहीं कर रहे हैं या उससे दूरी बनाना चाहते हैं, भले ही व्यक्तिगत तौर पर उनके राहुल गांधी से रिश्ते अच्छे हों। यह भी है कि विजय की महत्वाकांक्षा केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, वह पॉपुलर एक्टर हैं और उनके फैन क्लब दक्षिण भारत के सभी राज्यों में हैं, जिन्हें वह अपनी पार्टी टीवीके के स्थानीय कार्यालय बनाकर अपनी पार्टी का विस्तार करने के इच्छुक हैं।
इसलिए वह कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी की बी टीम के रूप में दिखायी नहीं देना चाहते। इस पृष्ठभूमि में उनका तिरुवनंतपुरम समारोह से दूर रहना सियासी मज़बूरी कहा जा सकता है। दूसरा यह कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरुर की अनुपस्थिति को भी नोट किया गया। थरुर के बारे में बताया गया कि वह फिलहाल अमरीका में हैं, लेक्चर देने के लिए। बहरहाल, कांग्रेस के लिए यह अच्छा रहा कि उसके वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला न केवल समारोह में मौजूद रहे बल्कि उन्होंने मंत्री पद की शपथ भी ली। वह भी केसी वेणुगोपाल के साथ मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से थे। उनका मंत्री बनना ज़ाहिर करता है कि कांग्रेस ने फिलहाल के लिए अपनी अंदरूनी गुटबाज़ी पर विराम लगा दिया है, संभवत: चेन्निथला की शर्तों को मानकर कि उन्हें अपनी पसंद का मंत्रालय दिया जाये व उनके दो समर्थकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाये।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस बार कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के रूप में एकदम सही चुनाव किया है और अपनी पिछली गलतियों को दोहराया नहीं है। मसलन, राजस्थान में कांग्रेस की वापसी के सारे मार्ग सचिन पायलट ने अपनी कड़ी मेहनत से तैयार किये थे, लेकिन मुख्यमंत्री आजमाये हुए अशोक गहलोत को बना दिया गया, जिसका कांग्रेस को बाद में भारी नुकसान उठाना पड़ा था। यही गलती मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर की गई थी। केरलम में वामपंथियों के दस वर्ष के शासन को समाप्त करने और कांग्रेस की शानदार जीत की पटकथा सतीशन ने ही लिखी है, इसलिए मुख्यमंत्री उन्हें ही बनना चाहिए था। वामपंथियों के खिलाफ चुनावी संघर्ष में सतीशन ने वैचारिक फ्रेमवर्क भी तैयार किया। केरलम में उत्तर भारत के विपरीत आज भी सांप्रदायिक राजनीति से अपने आपको दूर रखे हुए है। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि मुस्लिम बहुल थावानुर से एक ईसाई वीएस जॉय विधायक चुने गये। हिन्दू बहुल कलामास्सेरी से एक मुस्लिम वीई अब्दुल गफूर विधायक बने और ईसाई बहुल कोच्ची ने भी एक गैर-ईसाई को अपना विधायक बनाया।
यह है असल ‘केरलम स्टोरी’ जो सौहार्द व समाजवाद को प्राथमिकता देती है। सतीशन ने दावा किया कि वाम पार्टियों ने अपने समाजवाद को कमज़ोर कर दिया है और कांग्रेस ही सही अर्थों में समाजवादी है। सतीशन ने बल देते हुए कहा, ‘हम ही नेहरुवादी समाजवाद के झंडाबरदार हैं।’ यह वक्तव्य उस समय आया जब माकपा अनेक संगठनात्मक खींचतानों के दौर से गुज़र रही थी। सतीशन ने माकपा के दो विद्रोही नेताओं को कन्नूर व अलाप्पुज्झा से अपनी सीटें जीतने में मदद की। सतीशन की इस चाल की वजह से अनेक कांग्रेसी प्रत्याशी उन चुनाव क्षेत्रों से सफल हुए जो वामपंथ के गढ़ समझे जाते थे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



