कांग्रेस के लिए खास अनुभव रहा सतीशन को मुख्यमंत्री चुनना

केरलम के मुख्यमंत्री के चयन के दौरान कांग्रेस पार्टी को अपने ही खेमे में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस प्रक्रिया में 11 दिन लगे और यह पार्टी के अलग-अलग गुटों के बीच मतभेदों को सुलझाने में अहम साबित हुई, जिससे एकता के लिए आपसी सहमति के महत्व का पता चलता है। के.सी. वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला से कड़ी टक्कर मिलने के बावजूद वी.डी. सतीशन को चुना गया। प्रियंका और राहुल गांधी ने अपना फैसला लेते समय जनता की भावना का भी ध्यान रखा। चयन प्रक्रिया के दौरान अंदरूनी तनाव भी सामने आए, लेकिन आखिरकार वेणुगोपाल ने पार्टी के बड़े हित को देखते हुए सतीशन की नियुक्ति का समर्थन किया।
कांग्रेस आलाकमान इस मामले पर बंटा हुआ था। सोनिया गांधी चेन्निथला के पक्ष में थीं, जबकि राहुल गांधी वेणुगोपाल का समर्थन कर रहे थे और प्रियंका गांधी सतीशन को पसंद कर रही थीं। इससे पार्टी के आलाकमान के भीतर चल रहे आपसी मतभेद खुलकर सामने आ गए। इसके अलावा कांग्रेस पर उसके सहयोगी दल-इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और जनता की भावना, दोनों की ओर से दबाव था। इन दोनों ही बातों का गांधी परिवार की छवि पर असर पड़ा।
राहुल और प्रियंका गांधी ने इस स्थिति पर आपस में चर्चा की, लेकिन उनके बीच के मतभेद कांग्रेस कार्यालयों के बाहर और प्रियंका के वायनाड स्थित दफ्तर के बाहर लगे पोस्टरों में साफ दिखाई दे रहे थे। ऐसे ही एक पोस्टर पर लिखा था, ‘मिस्टर राहुल, हो सकता है कि के.सी. आपका झोला उठाने वाले हों, लेकिन केरल की जनता आपको कभी माफ नहीं करेगी।’ इस पोस्टर के ज़रिए राहुल द्वारा वेणुगोपाल को चुनने के फैसले पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की गई थी।
राहुल गांधी ने जनता की नब्ज़ टटोलकर और मुख्यमंत्री पद के दावेदारों-वेणुगोपाल, सतीशान और चेन्निथला के साथ तालमेल बिठाकर केरल के मुख्यमंत्री के चयन में एक अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के साथ लंबी बैठकें कीं, ताकि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के भीतर चुनाव के बाद पैदा हुए गतिरोध को दूर किया जा सके।
आईयूएमएल ने वी.डी. सतीशन के धर्मनिरपेक्ष रवैये को देखते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए उनका समर्थन किया। वेणुगोपाल ने राहुल और प्रियंका से दो घंटे से भी ज्यादा समय तक मुलाकात की और मुख्यमंत्री के तौर पर सतीशन की नियुक्ति के प्रति अपना समर्थन ज़ाहिर किया। हालांकि वेणुगोपाल खुद भी मुख्यमंत्री पद के एक मज़बूत दावेदार थे, लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पार्टी का हित सबसे ऊपर होना चाहिए। सतीशन जो छह बार विधायक रह चुके हैं और यूडीएफ के चुनाव प्रचार के नेता थे, ने यह वादा किया था कि अगर यूडीएफ केरल की 140 सीटों में से कम से कम 100 सीटें नहीं जीत पाती है, तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। आखिरकार इस गठबंधन ने 102 सीटें जीतीं, जिसमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। यह सतीशन के नेतृत्व पर लोगों के भरोसे को दिखाता है।
वेणुगोपाल को राहुल गांधी का समर्थन मिलने में एक पेंच यह था कि विधायक बनने के लिए वेणुगोपाल को अपने सांसद पद से इस्तीफा देना पड़ता। ज़मीनी स्तर पर हुए विरोध प्रदर्शनों में सतीशन को ज्यादा समर्थन मिला और वे पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ एक मज़बूत विपक्षी आवाज़ बनकर उभरे। एक दशक के बाद केरल में यूडीएफ की सत्ता में वापसी में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
केरल की राजनीति में हलचल मचाने की सतीशन की क्षमता कई अहम बातों पर निर्भर करेगी। वह पार्टी के साथ मिलकर काम करेंगे, लेकिन पार्टी की सत्ता संरचना और पदक्रम भी काफी मायने रखते हैं। साल 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान, ईसाई और मुस्लिम समुदायों के बीच पैदा हुई खाई ने कांग्रेस पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया था। इस खाई की वजह से कई लोगों ने पार्टी से दूरी बना ली, जिससे पिनाराई विजयन को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने में मदद मिली।
उनके सामने सबसे पहली चुनौती मंत्रिमंडल का गठन करना है। इसमें कांग्रेस के भीतर के अलग-अलग गुटों को जगह देना, आईयूएमएल जैसे अहम सहयोगी दलों को संतुष्ट करना और पार्टी के भीतर किसी भी तरह की नाराज़गी को पनपने से रोकना शामिल है। उन्होंने कांग्रेस के दस मंत्रियों और बाद में आईयूएमएल के पांच मंत्रियों के नामों की घोषणा की है।
उन्हें भारी राजकोषीय घाटे और राज्य पर चढ़े भारी-भरकम कज़र् की समस्या से भी निपटना होगा, जिसके लिए उन्हें आर्थिक विकास को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना होगी। उन्हें अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होगा, बेरोज़गारों को रोज़गार देना होगा, अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़ी राजनीति को समझदारी से संभालना होगा, ‘लीग’ और ‘जमात-ए-इस्लामी’ के साथ संबंधों को लेकर भाजपा की आलोचनाओं का जवाब देना होगा, और साथ ही विरोधी राजनीतिक गुटों की साज़िशों से बचते हुए पार्टी की एकता को भी बनाए रखना होगा।
सतीशन के लिए मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में जमात-ए-इस्लामी ने एक अहम भूमिका निभाई है। ऐसे सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाते हुए अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखना एक चुनौती भरा काम होगा। सतीशन के सामने एक और मुश्किल काम यह है कि वह जमात के हितों और उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी-सुन्नी सर्वोच्च संस्था ‘समस्ता’-के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाएं। ‘समस्ता’ ने भी चुपचाप सतीशन का समर्थन किया है।
सतीशन एक ऐसी विधायी पार्टी का नेतृत्व करते हैं जिसमें कुछ ऐसे सदस्य भी शामिल हैं जिन्होंने उनका समर्थन नहीं किया था। उन्हें हिंदू मतदाताओं का समर्थन खोने का जोखिम हो सकता है, जो मुस्लिम समुदाय के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित है। यह स्थिति उन उदारवादी और सुधारवादी मुसलमानों के लिए भी चिंता का विषय है, जो इन बदलावों को लेकर आशंकित हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद सतीशन ने इस जनादेश को एक सामूहिक उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया है। एक मज़बूत टीम बनाने और केरल की राजनीतिक तथा वित्तीय चुनौतियों से निपटने में उनकी सफलता ही यह तय करेगी कि कैंटोनमेंट हाउस से क्लिफ हाउस तक का उनका यह सफर उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होता है या नहीं। (संवाद)
 

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