‘बात निकली है तो फिर...’

इन पंक्तियों के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। एक अर्थ यह भी हो सकता है कि यदि बात चल ही पड़ी है तो उसे निर्णय तक पहुंचाना चाहिए, परन्तु अक्सर ऐसा नहीं होता, ज्यादातर आरम्भ किए गए कार्य आधे-अधूरे और अधर में ही दम तोड़ देते हैं। मंज़िल तक पहुंचना प्रत्येक आरम्भ की गई प्रक्रिया के लिए मुश्किल होता है। ऐसा आधा-अधूरा छोड़ा हुआ काम बड़ी विफलता की निशानी होता है, चाहे यह किसी भी क्षेत्र में हो। देश की आज़ादी के बाद यही कुछ यहां घटित होता दिखाई देता रहा है। हमारी सरकारें अक्सर अपने वचनों और वादों पर पूरा नहीं उतरती रहीं। यही कारण है कि आज भी हम समाज के समूचे विकास में अधर में या आधा-अधूरा ही रह गए हैं।
पिछले 75 वर्षों से सरकारें ़गरीबी को खत्म करने की बातें करती रही हैं, परन्तु आज भी करोड़ों लोग बेचारगी वाला जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हैं। केन्द्र या राज्य सरकारें हों, अब तक प्रत्येक सरकार बेरोज़गारी को नकेल डालने की बात करती रही है, परन्तु आज वह बेलगाम ही नहीं हुई, अपितु इसका भयानक रूप सामने आ रहा है। करोड़ों ही युवा दिशाहीन हो चुके हैं। उनमें पैदा हुई निराशा से डर लगने लगा है। सुराल की भांति बढ़ती जनसंख्या के परिणामों की प्रत्येक सुचेत मनुष्य और प्रशासन को जानकारी है। आज बेहद सीमित हो रहे प्राकृतिक स्रोतों से कहीं अधिक बच्चों का जन्म लेना भविष्य की भुखमरी और कमियों की गवाही भरता प्रतीत होता है। ये बातें बड़ी हैं। डींगे हांकती हमारी सरकारें उन समस्याओं को हल करने में भी असमर्थ रही हैं, जिन्हें वह अपनी इच्छा शक्ति से पूरा कर सकती थीं। इसलिए बेचारगी में घिरी वह अदालतों का सहारा लेती हैं।
आज देश के प्रत्येक तरह के निर्माण और सामाजिक अनुशासन में जो कुछ भी हुआ है, उनमें हमारी अदालतों का बड़ा हिस्सा रहा है। बात चाहे बेसहारा पशुओं और कुत्तों की हो, जो देश भर में लाखों नहीं करोड़ों की संख्या में दयनीय और बेचारगी वाली हालत में सड़कों और बाज़ारों में घूमते-फिरते हैं और नरक भोग रहे हैं। देश की बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ उनकी संख्या भी असंख्यक होती जा रही है, उन्हें सड़कों और अन्य स्थानों पर भटकते देख कर कोई  ही होगा जिसके मन में उनकी हालत के प्रति दया भावना पैदा होती है। यदि हमारे प्रशासन और बड़े-बड़े दावे करती सरकारें अब तक ऐसे मामलों का भी हल नहीं कर सकीं तो हम उनकी कारगुज़ारी को अधूरा नहीं, अपितु विफल समझते हैं। हम गलियों, बाज़ारों और सड़कों पर घूमते जानवरों और कुत्तों को आवारा नहीं लावारिस समझते हैं, जो सदियों से धार्मिकता में रंगी इस धरती पर एक समस्या बने हुए हैं। लावारिस कुत्तों पर विगत अवधि में ध्यान इसलिए केन्द्रित हुआ है, क्योंकि उनके द्वारा लोगों को काटने और घायल करने के समाचारों की भरमार हो चुकी है। इन समाचारों की संख्या भी लाखों में है। देश के सुचेत वर्ग ने इस समस्या की ओर लगातार ध्यान दिलाया है, परन्तु प्रशासन इसे हल करने में पीछे ही रहा है।
जब बात अधिक फैल गई, स्थिति अधिक गम्भीर होने लगी तो विगत वर्ष नवम्बर माह में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने लावारिस कुत्तों के प्रति अपनी कुछ टिप्पणियां कीं और निर्देश दिए। इनमें उनकी नसबंदी करने और उन्हें रखने के स्थानों की सरकारों को निशानदेही करने के लिए कहा गया था, परन्तु इसमें मेनका गांधी जैसे ़गैर-ज़िम्मेदार और स्वयं बने पशु रक्षक सामने आए और उन्होंने अदालतों के इन निर्देशों को पुन: चुनौती दी, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले आदेशों को कायम रखते हुए यह कहा है कि पागल, ला-इलाज बीमारी वाले और ़खतरनाक कुत्तों को मौत का टीका लगाया जाना ज़रूरी है, क्योंकि देश भर में कुत्तों के काटने की घटित हो रही लाखों ही घटनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। लोगों की जान की सुरक्षा बहुत ज़रूरी है। यह कानून के शासन के विरुद्ध और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। सर्वोच्च अदालत ने यह आदेश न मानने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को भी सज़ा के भागी बनाने की बात की है। आज तक हमारी समझ में यह बात नहीं आई कि बेसहारा पशुओं और लावारिस कुत्तों की समस्या को हल करने में सरकारें क्यों पीछे रही हैं और सभ्य समाज ऐसे बेलगाम घटनाक्रम को किस तरह सहन करता रहा? नि:संदेह इन लावारिस कुत्तों और जानवरों के मामले को स्थायी रूप से हल करने के लिए कड़ा कानून बनना ज़रूरी है। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे बेलगाम घटनाक्रम को पूरी तरह नकेल डालना ज़रूरी है, ताकि निकली इस बात को सफल बनाया जा सके।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

#‘बात निकली है तो फिर...’