वैश्विक तपिश से बिगड़ते हालात, कब समझेगा इंसान

वैश्विक तपिश (ग्लोबल वार्मिंग) आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि धरती पर रहने वाला प्रत्येक जीव यहां तक कि वनस्पति भी त्रस्त है। वैश्विक तपिश से निपटने के लिए दुनियाभर में प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन समस्या कम होने के बजाय प्रत्येक वर्ष बढ़ती ही जा रही है। चूंकि यह एक शुरुआत भर है, इसलिए अगर हम अभी से नहीं संभलें तो भविष्य और भी भयावह हो सकता है।
वैज्ञानिक अनुसंधान की रिपोर्ट बताते हैं कि वैश्विक तपिश धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही बढ़ौतरी है। हमारी धरती प्राकृतिक तौर पर सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुज़रती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परिवर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इससे धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं। यह आवरण लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से वैश्विक तपिश के दुष्प्रभाव शुरू हो जाता है।
वैश्विक तपिश के लिए सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार तो मनुष्य और उसकी गतिविधियां ही हैं। मनुष्य अनजाने में या जानबूझकर अपने ही जीवन को खत्म करने पर तुला हुआ है। मानव निर्मित इन गतिविधियों से कार्बन डाईआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड इत्यादि ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है जिससे इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है। यही आवरण सूर्य की परिवर्तित किरणों को रोक रहा है जिससे धरती के तापमान में वृद्धि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाज़ों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों उद्योगों इत्यादि से अंधाधुंध होने वाले गैसीय उत्सर्जन की वजह से कार्बन डाईआक्साइड में बढ़ोतरी हो रही है। जंगलों का बड़ी संख्या में हो रहा विनाश इसकी दूसरी वजह है। जंगल कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं, लेकिन जंगलों की बेतहाशा कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रक भी हमारे हाथ से छूटता जा रहा है।
वैश्विक तपिश की एक अन्य वजह क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सीएफसी) भी है जो रेफ्रीजरेटर्स, अग्निशामक दमकल यंत्रों इत्यादि में इस्तेमाल की जाती है। यह धरती के ऊपर बने एक प्राकृतिक आवरण ओज़ोन परत को नष्ट करने का काम करती है। ओज़ोन परत सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस ओज़ोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें सीधे धरती पर पहुंच रही हैं और इस तरह से उसे लगातार गर्म बना रही हैं। बढ़ते तापमान का ही नतीजा है कि धु्रवों पर सदियों से जमी बर्फ  भी पिघलने लगी है। विकसित या हो अविकसित देश, हर जगह बिजली की ज़रूरत बढ़ती जा रही है। बिजली के उत्पादन के लिए जीवाष्म ईंधन का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में करना पड़ता है। जीवाश्म ईंधन के जलने पर कार्बन डाईआक्साइड पैदा होती है जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ा देती है। इसका नतीजा वैश्विक तपिश के रूप में सामने आता है। विगत दस वर्षों में धरती के औसत तापमान में 0.3 से 0.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। आशंका यही जताई जा रही है कि आने वाले समय में वैश्विक तपिश में और बढ़ोतरी ही होगी।
वैश्विक तपिश को लेकर कई दशकों से वैज्ञानिक चिंता ज़ाहिर कर रहे थे, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इस वजह से अब मौसम में भारी बदलाव हो रहा है। अब तो भारत के ही कई शहरों में पारा 50 डिग्री के आसपास पहुंच गया है। ग्लेशियरों की बर्फ के पिघलने से समुद्रों में पानी की मात्रा बढ़ जाएगी जिससे साल-दर-साल उनकी सतह में भी बढ़ोतरी होती जाएगी। समुद्रों की सतह बढ़ने से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जाएगा।
सभी  पेट्रोल, डीज़ल और बिजली का उपयोग कम करके हानिकारक गैसों को कम कर सकते हैं। जंगलों की कटाई को रोकना होगा। अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे। इससे भी वैश्विक तपिश के असर को किया जा सकता है।     -मे. 92191-79431

#वैश्विक तपिश से बिगड़ते हालात
# कब समझेगा इंसान