रूस-चीन गठजोड़ भारत के लिए उभरती चुनौती तो नहीं !

अमरीका की दादागिरी समाप्त होने के बाद जो नई विश्व व्यवस्था बन रही है, उसमें चीन व रूस की बढ़ती दोस्ती भारत के लिए जटिल विदेश नीति चुनौती उत्पन्न कर रही है। इससे नई दिल्ली को बहुआयामी समझौतों और रणनीतिक स्वायत्तता पर बहुत अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। भारत एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां अब उसके लिए एक रास्ते का चयन करना मजबूरी होता जा रहा है। फिलहाल धुरी को संतुलित करने के लिए नई दिल्ली को पश्चिम से गहरी भागीदारी करनी पड़ रही है जैसा कि हाल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड्स, नॉर्वे, इटली आदि की यात्रा से स्पष्ट है, साथ ही देशज रक्षा व आर्थिक आत्म-निर्भरता को मज़बूत करने की भी ज़रूरत पैदा हो गई है। 
इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजिंग-मास्को गठजोड़ से भारत की रक्षा सप्लाई चेन जटिल हो गई है, क्योंकि भारत-रूस के सैन्य हार्डवेयर पर बहुत अधिक निर्भर है। दो बड़ी शक्तियों के बीच करीबी संबंधों के कारण रूस के लिए यह कठिन होता जा रहा है कि वह भारत को वह एडवांस्ड टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराये, जिससे चीन नाराज़ हो जाये। इससे बचने के लिए ही भारत सक्रिय तौर पर रणनीतिक स्वायत्तता, बहुआयामी गठबंधन जैसे क्वाड पर बल देने के अतिरिक्त घरेलू देशज कार्यक्रमों जैसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विस्तार कर रहा है। दरअसल, बात सिर्फ रणनीतिक संतुलन व रक्षा जटिलताओं की भी नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव व असंतुलन की भी है। बीजिंग-मास्को संबंध में पॉवर असंतुलन बहुत अधिक चीन के पक्ष में है, जिससे बीजिंग का केंद्रीय एशिया व यूरेशिया में एकछत्र आर्थिक राज हो जायेगा। इससे भारत के विस्तृत पड़ोस में नई दिल्ली की रणनीतिक पहुंच सीमित हो जाती है और यूरेशियन ब्लॉक जैसे शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) व ब्रिक्स में भारत का प्रभाव कमज़ोर हो जाता है। 
भारत फिलहाल ब्रिक्स का अध्यक्ष है, लेकिन ईरान पर अमरीका व इज़रायल के बेमतलब व बेमकसद हमले के संदर्भ में किसी प्रकार का कोई वक्तव्य जारी नहीं किया गया। युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बंद कर दिया गया, जिससे तेल, गैस आदि का भारी संकट उत्पन्न हो गया है और नतीजतन महंगाई भी बढ़ती जा रही है। इस पृष्ठभूमि में बीजिंग-मास्को के गठजोड़ की वजह से चीन रूस का बुनियादी ऊर्जा भागीदार बन गया है, जिससे रूसी तेल व गैस के लिए गहन प्रतिस्पर्धा हो गई है। हालांकि पश्चिम के दबाव के बावजूद भारत अपने घरेलू हितों को साधने के लिए सस्ता क्रूड हासिल कर ही रहा है, लेकिन चीन-रूस की एनर्जी पाइपलाइन डायनामिक्स के चलते सप्लाई स्थिरता व दामों को बनाये रखने के लिए भारत को सक्रिय प्रबंधन की आवश्यकता पड़ेगी। 
चूंकि चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को बढ़-चढ़कर प्रमोट कर रहा है, तो ऐसे में बीजिंग-मास्को गठजोड़ के कारण केंद्रीय एशिया में भारत-समर्थित जो कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स हैं, वह हाशिये पर आ सकते हैं। इससे बचने के लिए नई दिल्ली को चाहिए कि विकल्पों पर अधिक ध्यान दे, जैसे इंटरनेशनल नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर पर ताकि यूरेशियन व्यापार को मज़बूत किया जा सके। ईरान में चाबहार पोर्ट को बीच में छोड़ना भी कोई समझदारी नहीं थी। अब भी समय है कि उस पर पुन:विचार किया जाये। दरअसल, यह जो प्रभावित करने वाले परिवर्तन आ रहे हैं, उनका प्रबंधन करने के लिए नई दिल्ली को चाहिए कि रूस से अपने संबंध मज़बूत करने के सिलसिले में अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मास्को के पास बीजिंग से अलग भी विकल्प हों और साथ ही भारत का विदेश मंत्रालय ग्लोबल साउथ में अपनी पहुंच का विस्तार करे ताकि क्षेत्रीय स्थिरता को सुरक्षित रखा जा सके। 
नई विश्व व्यवस्था तेज़ी के साथ विकसित हो रही है, प्रतिक्रिया स्वरूप सभी प्रमुख खिलाड़ी अपनी नीतियों को पुनर्स्थापित कर रहे हैं। पश्चिम में अंदर से चुनौतियां उठ रही हैं, क्योंकि वैश्विक बलों के हमलों के कारण घरेलू महत्वकांक्षाएं बदल रही हैं और वैश्विक सत्ता संतुलन भी बदलता जा रहा है। हालांकि पश्चिम, विशेषकर अमरीका (राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा के बावजूद) बीजिंग को दीर्घकालीन चुनौती के रूप में देख रहा है, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि पश्चिम के अधिकतर प्रयास व संसाधन अब यूरोपीय संकट के प्रबंधन में लग रहे हैं। रूस एक बार फिर यूरोपीय कुलीनों के दिमागों में गंभीर खतरे के रूप में उभरने लगा है, खासकर चीन से उसकी बढ़ती नज़दीकियों के कारण। गौरतलब है कि हाल ही में रूस के राष्ट्रपति वाल्दिमीर पुतिन की दो दिन की चीन यात्रा के दौरान बीजिंग व मास्को ने 7,000 शब्दों का एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया था, जिसमें विशेषरूप से इस बात पर बल दिया गया कि ‘ताकत व स्थिरता’ के लिहाज़ से दोनों देश ‘अपने इतिहास के सबसे अच्छे समय का अनुभव कर रहे हैं’। 
इस माह के आरंभ में पुतिन ने रूस के राष्ट्रपति के रूप में नया कार्यकाल आरंभ किया। इसके बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए उन्होंने चीन को चुना। इस प्रतीक को अनदेखा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यूक्रेन संकट के बाद मास्को की निर्भरता बीजिंग पर बढ़ी है और इन दोनों देशों की बढ़ती दोस्ती को पश्चिम अपने लिए गंभीर खतरे के रूप में देखता है। पश्चिम का मानना है कि चीन की मदद के कारण ही रूस यूक्रेन पर अपने हमले जारी रखे हुए हैं। अमरीका की इस धमकी के कुछ दिन बाद ही पुतिन ने चीन की यात्रा पर जाना तय किया। इससे ज़ाहिर है कि अब अमरीका की धमकियों में कोई दम नहीं रहा है, वाशिंगटन को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। 
चीन इस समय ड्राइविंग सीट में है। इसलिए भी नई दिल्ली के लिए आने वाले वर्षों में रूस-चीन गठजोड़ का प्रबंधन करना सबसे महत्वपूर्ण विदेश नीतिक चुनौती होगी। यह बुनियादी तौर पर भारत की रणनीतिक दृष्टिकोण को बदल देती है। यह ऊपर बताया जा चुका है कि भारत अपने सैन्य उपकरणों व टेक्नोलॉजी के लिए रूस पर निर्भर करता है, जो प्रभावित हो सकता है।  एससीओ व ब्रिक्स जैसे वैश्विक मंचों पर भी भारत का प्रभाव कम हो सकता है। ज़ाहिर है इस स्थिति में नई दिल्ली की गहन परीक्षा होगी कि वह नई विश्व व्यवस्था में किस तरह अपने महत्व को बरकरार रख पायेगी। ज़रूरत इस बात की है कि ध्यानपूर्वक विदेश नीति पुन:स्थपित किया जाये ताकि मुख्य शक्तियों के साथ संतुलन बना रहे और हमारे राष्ट्रीय हित भी सुरक्षित रहें। ब्रिक्स का 18वां सम्मेलन नई दिल्ली में (12-13 सितम्बर, 2026) को होगा, जिसमें पुतिन व शी जिनपिंग के आने की उम्मीद है। भारतीय कूटनीति के लिए वह बेहतरीन अवसर होगा।          -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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