लावारिस कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

देश में लावारिस कुत्तों के हमलों और काटने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिकारियों को उन पागल, गंभीर रूप से बीमार लावारिस कुत्तों को कानूनी रूप से मृत्यु देने का निर्देश दिया है जो मानव जीवन के लिए खतरा बन चुके हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने पशु प्रेमियों और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। अदालत ने पिछले साल नवम्बर में दिए गए अपने उस आदेश में संशोधन करने से इन्कार कर दिया, जिसमें लावारिस कुत्तों को शेल्टर होम में स्थानांतरित करने की बात कही गई थी। पिछले साल जुलाई में रेबीज़ के कारण एक छह साल की बच्ची की मौत की खबर के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को स्वत: संज्ञान में लिया था, जिसके बाद लंबी सुनवाई के बाद यह ऐतिहासिक फैसला आया है।
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। राज्य मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता। अदालत भी उन कठोर ज़मीनी हकीकतों से आंखें नहीं मूंद सकती, जहां बच्चे, विदेशी यात्री और बुजुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं। संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहां बच्चों और बुजुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताकत या किस्मत के भरोसे हो। इसमें दो राय नहीं कि स्थानीय निकायों द्वारा लावारिस कुत्तों को हटाने के संबंध में विगत में दिए अपने निर्देशों को नरम न करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बिगड़ते जन-सुरक्षा संकट में एक आवश्यक हस्तक्षेप है। 
हाल के वर्षों में, देश भर में स्थानीय प्रशासन व निकाय कुत्तों के काटने की घटनाओं में लगातार हो रही चिंताजनक वृद्धि को रोकने में विफल ही रहे हैं। ऐसे में शासन व प्रशासन स्तर पर इस समस्या के निराकरण की कोई सार्थक पहल न होते देख शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा है। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, साल 2023 में 30 लाख से अधिक कुत्तों के काटने के मामले दर्ज किए गए थे। उसके अगले साल 2024 में रोकथाम के कोई ठोस प्रयास न होने के कारण 37 लाख मामले दर्ज किए गए। आंकड़े बताते हैं कि औसतन प्रतिदिन 10 हज़ार घटनाएं सामने आ रही हैं। वहीं कई राज्यों व शहरों में इन घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है। अदालत ने गौर किया कि एबीसी ढांचे की शुरुआत के बाद से लगभग दो दशक बीत जाने के बावजूद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से लगातार बढ़ती लावारिस कुत्तों की आबादी को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विस्तार और सुदृढ़ करने के लिए निरंतर, व्यवस्थित और क्रमिक प्रयासों का स्पष्ट अभाव रहा है।
अदालत ने लावारिस कुत्तों से जुड़ी घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि को उजागर करने वाली कई समाचार पत्रों की रिपोर्टों का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि उदयपुर में 2026 में लगभग 1,750 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज किए गए, जबकि भीलवाड़ा में एक ही दिन में 42 लोगों को कुत्ते ने काटा। अदालत ने यह भी बताया कि तमिलनाडु में 2026 के पहले चार महीनों में लगभग 2.63 लाख कुत्ते के काटने के मामले और 17 संबंधित मौतें दर्ज की गईं। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यह मुद्दा आवासीय इलाकों से आगे बढ़कर हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थानों तक फैल गया है, और यह भी बताया कि नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के अधिकारियों ने 1 जनवरी, 2026 से हवाई अड्डे के टर्मिनलों में कम से कम 31 कुत्ते के काटने की घटनाओं को स्वीकार किया है। 
केरलम राज्य के आंकड़ों के अनुसार, वहां एक साल के भीतर ही 3.6 लाख से अधिक कुत्तों के काटने के मामले सामने आए हैं। वहीं दूसरी दिल्ली से सटे नोएडा में कुछ ही महीनों में हज़ारों शिकायतों के बाद हॉटस्पॉट की पहचान की गई। इन शिकायतों में स्कूलों के पास उनका जमावड़ा होना, चलने में असमर्थ बुजुर्ग नागरिकों का शिकार बनना आदि मामले उजागर हुए हैं। दरअसल, विगत में भी इस संकट के कारगर समाधान के लिये शीर्ष अदालत ने सख्त निर्देश दिए थे। स्थानीय नगर निगम व नगर पालिकाओं की जवाबदेही तय की थी कि कुत्तों को शेल्टर होम ले जाकर उनकी नसबंदी की जाए और टीकाकरण किया जाए। लेकिन इस दिशा में कारगर पहल होती नज़र नहीं आई। वहीं तस्वीर का दूसरा पहलू है कि यह संकट समाज और संस्थाओं द्वारा जानवरों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार में परेशान करने वाली विफलता को भी दर्शाता है।
निश्चय ही बढ़ते तापमान, भूख व आश्रय के अभाव से उपजे असुरक्षा बोध ने भी कुत्तों को आक्रामक बनाने में भूमिका निभाई है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों ने समय रहते दूरदर्शिता के साथ काम किया होता, तो आज स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस मुद्दे पर लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत के निर्देशों के बाद अब राज्यों और नगर निकायों पर संस्थागत क्षेत्रों को लावारिस कुत्तों से मुक्त रखने और प्रभावी नियंत्रण नीति लागू करने का दबाव बढ़ गया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जहां पशु प्रेमियों में निराशा है, वहीं कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं और पीड़ितों को इस आदेश से ज़रूर राहत मिली होगी। देखना है कि अदालत के आदेशों के बाद किस तरह की कार्रवाई को अंजाम दिया जाता है।
 (स्वतंत्र पत्रकार)

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