अध्यापकों और मूलभूत सुविधाओं से वंचित देश के सरकारी स्कूल
शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा यह राज्यों के विषय हैं। राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के विभिन्न राज्यों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था भिन्न-भिन्न रूपों में बदहाली का शिकार हो चुकी है। देश के सरकारी स्कूल सुधार की राह देख रहे हैं। आज जब देश विश्व गुरु का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है और शिक्षा मंत्रालय भी लगातार नई-नई योजनाओं की घोषणा कर रहा है, क्या ऐसे में इन सरकारी स्कूलों की दशा सुधर पाएगी? शिक्षा व्यवस्था किसी भी समाज एवं राष्ट्र की नींव है। भारत जिस प्रकार कृषि प्रधान देश है ठीक उसी प्रकार यह सरकारी स्कूल अथवा शिक्षा प्रधान भी है। अधिकांशत देश के महानगरों और कुछ कस्बों में ही निजी स्कूल हैं। गांव- देहात और दूरदराज क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों विद्यार्थी सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। उनके पास न तो आर्थिक संपन्नता है और न ही ऐसे दूसरे संसाधन हैं कि वे निजी स्कूलों का रुख कर सकें। क्या प्रत्येक बच्चे तक समुचित शिक्षा की पहुंच के बिना विकसित भारत का संकल्प पूरा हो सकता है? क्या ऐसे विद्यार्थियों के लिए सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं नहीं होनी चाहिए?
विगत दिनों सरकारी स्कूलों से संबंधित दो महत्वपूर्ण समाचार पढ़े। पहला समाचार शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की 349 वीं और 363 वीं रिपोर्ट से संबंधित था, जिसमें शिक्षकों के खाली पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की बार-बार सिफारिश की गई है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में प्राथमिक स्कूलों के स्वीकृत 45,46,395 पदों में से 5,72,682 पद रिक्त हैं। इसी प्रकार वर्ष 2024-25 में माध्यमिक स्कूलों के स्वीकृत 24,29,365 पदों में से 3,99,980 पद रिक्त हैं। इसके साथ ही यह भी सामने आया कि उत्तर प्रदेश में 2.17 लाख, बिहार में 1.92 लाख, बंगाल में 55 हज़ार, झारखंड में 72 हज़ार, मध्य प्रदेश में 55 हज़ार, हरियाणा में 15 हज़ार और जम्मू कश्मीर में 13 हज़ार पद रिक्त हैं। सामान्यत: इन प्रदेशों के अतिरिक्त राष्ट्रीय राजधानी सहित अन्य प्रदेशों में भी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के हज़ारों पद रिक्त पड़े हैं। अनेक स्थानों पर अतिथि व संविदा शिक्षक काम कर रहे हैं। गौरतलब यह भी है कि केन्द्र सरकार राज्यों को स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए 41,249 करोड़ रुपये वित्त वर्ष 2025-26 में आवंटित कर चुकी है। क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पद शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट और बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो फिर इसके ज़िम्मेदार राज्यों और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
दूसरा समाचार हाल ही में आई नीति आयोग की रिपोर्ट से संबंधित है, जिसमें यह स्पष्ट हुआ है कि विगत दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में 22 प्रतिशत की गिरावट आई है। वर्ष 2005 में जहां 71 प्रतिशत दाखिले सरकारी स्कूलों में होते थे वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 प्रतिशत रह गया है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि अब सभी माध्यमिक संस्थानों में निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 44.01 प्रतिशत हो गई है जो निजी शिक्षा की ओर अभिभावकों के झुकाव को दर्शाता है। उपरोक्त दोनों समाचार जहां एक ओर सरकारी स्कूलों की दयनीय हालत को व्यक्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य स्तर पर शासन-प्रशासन की लापरवाही को भी उजागर करते हैं।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। क्या यह स्थिति चिंताजनक नहीं है? सर्वविदित यह भी है कि देश में अनेक सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां आज भी शौचालय, पीने का पानी, विद्यार्थियों के बैठने की समुचित व्यवस्था, भवन एवं स्कूल तक जाने का रास्ता जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। सत्य यह भी है कि सरकारी स्कूलों के लाखों शिक्षक समय-समय पर मतदान, मतदाता सूची पुनरीक्षण, जनगणना एवं विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों एवं अभियानों में लगा दिए जाते हैं। क्या ऐसे में उनकी अध्ययन-अध्यापन की गतिविधियां प्रभावित नहीं होती हैं? शैक्षिक सत्र शुरू हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है लेकिन पाठ्य पुस्तकों की मांग और आपूर्ति के हिसाब से केवल आधी पुस्तकें ही छपी हैं।
शिक्षा मंत्रालय लगातार कौशल विकास, तकनीक आधारित शिक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) एवं गुणवत्ता शिक्षा आदि के लिए प्रयासरत है, लेकिन ऐसे विद्यालय जहां न तो मूलभूत सुविधाएं हैं और न ही शिक्षकों की समुचित संख्या है, क्या वहां पर उक्त प्रयास अथवा योजना लागू हो पाना संभव है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना, ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना एवं तकनीक के उपयोग पर ज़ोर देने जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण प्रविधान हैं, लेकिन वह धरातल से बहुत दूर दिखाई दे रहे हैं। क्या ऐसी सुस्ती राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संकल्प और विकसित भारत की गति को कमज़ोर नहीं कर रही है? अकेले छत्तीसगढ़ के 5 हज़ार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है। उत्तराखंड के 1,655 विद्यालयों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं हैं। वहीं 1,728 विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। क्या ऐसे में उन्नत शिक्षा की बात केवल जुमला नहीं है?
जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच चुका है। आज भी आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल एवं बिहार जैसे प्रदेशों में साक्षरता की अनुमानित दर 70 से 75 प्रतिशत ही है। क्या शेष लगभग 25 से 30 प्रतिशत निरक्षर आबादी को साक्षर किए बिना भारत विकसित देश बन सकता है?
स्कूली शिक्षा की तस्वीर बदलने अथवा उसमें सुधारों की दृष्टि से केन्द्र सरकार की ओर से पीएम श्री स्कूल, समग्र शिक्षा, प्रेरणा, उल्लास, निपुण भारत, विद्या प्रवेश, विद्यांजलि, दीक्षा जैसी विभिन्न योजनाएं आरंभ की गई हैं लेकिन क्या ये योजनाएं दूरवर्ती क्षेत्रों में पहुंच पा रही हैं? सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए वहां व्यापक स्तर पर आमूलचूल परिवर्तनों और सतत निगरानी की आवश्यकता है। धरातल पर उतरकर यथार्थ को समझना होगा। इन स्कूलों में अविलंब सुधारों के व्यापक योजनाएं बना कर निरन्तर काम करना होगा। ध्यान रहे, सबकी शिक्षा तक पहुंच और उन्नत शिक्षा से ही विकसित भारत का संकल्प पूरा हो सकेगा। (युवराज)



