दुनिया में अकेले पड़ते ट्रम्प : अब याद आये भारत और मोदी
गत 24 मई 2026 को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नई दिल्ली में आयोजित अमरीकी दूतावास के कार्यक्रम में अचानक लाइव कॉल करके जिस तरह से भारत और हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की झड़ी लगा दी, उसने केवल एक दोस्ताना कूटनीतिक क्षण ही नहीं बनाया बल्कि बदलती विश्व राजनीति का एक गहरा संकेत भी दिया। ट्रम्प ने कहा, ‘आई लव प्राइम मिनिस्टर मोदी’ और यह भी, ‘इंडिया कैन काउंट ऑन मी’ यानी मुझ पर भरोसा रखें मैं आपके साथ हूं या ज़रूरत पड़ने पर मैं आपकी मदद करुंगा।’ राष्ट्रपति ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब यूं तो प्रत्यक्ष तौर पर अमरीका और ईरान के बीच एक समझौते की लगभग पुष्टि हो जाने के बाद तात्कालिक तौर पर होर्मुज संकट टलता नज़र आ रहा है। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत ये है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी मनमानी नीतियों और गतिविधियों के कारण पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ गये हैं। आज के समय में यूरोप उनके साथ नहीं है, नाटो ने स्पष्ट तौर पर कह दिया है ईरान-अमरीका जंग से हमारा कोई लेना देना नहीं है। रूस पहले से ही अमरीका का सोते-जगते कठिन प्रतिद्वंदी है, कम से कम सैन्य मामले में। ...और ताबूत में आखिरी कील चीन ने तब ठोंक दी है, जब उसने कहा होर्मुज मामले में वह ईरान की सम्प्रभुता का सम्मान करता है, जिसका व्यापक तौर पर मतलब यह था कि हम तुम्हारे साथ इस संकट में खड़े तो होंगे ही नहीं, लेकिन अगर तुमने कुछ मनमानी करने की कोशिश की, तो हम होर्मुज में अपने हितों की रक्षा करने के लिए आमने-सामने भी आ सकते हैं।
यही वजह है कि अपनी चीन यात्रा से लौटने के बाद से न केवल राष्ट्रपति ट्रम्प उखड़े-उखड़े नज़र आ रहे हैं बल्कि उनकी पहले की चाल-ढाल में एक निर्णायक बदलाव दिख रहा है। ‘अमरीका फर्स्ट’ की अपनी अकड़भरी नीति के अब कई देशों को ‘अमरीका एलोन’ जैसी लगने लगी है। यूरोप के साथ टैरिफ युद्ध, नाटो पर लगातार दबाव, रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर लगातार बढ़ती रणनीतिक अस्पष्टता और चीन के साथ तीखी प्रतिस्पर्धा में दो कदम पीछे हटने के कारण ट्रम्प को समझ में आ गया है कि जिस तरह वो चल रहे हैं, अगर वैसे ही चलते रहेंगे तो उनकी तो छीछालेदर हो ही रही है, अमरीका भी कहीं का नहीं रहेगा। इसलिए अमरीका को भारत याद आ रहा है, प्रधानमंत्री मोदी याद आ रहे हैं। क्योंकि अब उन्हें ऐसे साझेदार देश की ज़रूरत है, जो न केवल सामरिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी लगातार बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हो और सबसे बड़ी बात ये कि राजनीतिक रूप से भी स्थिर ताकत हो। भारत एक साथ ये सभी मांगें पूरी करता है। इसलिए यह महज दिल पसीजने की बात नहीं है कि आज राष्ट्रपति ट्रम्प कह रहे हैं, भारत को जितना तेल, जितनी गैस चाहिए, हम देंगे यानी अमरीका हमारी ऊर्जा की सारी ज़रूरतें पूरी करेगा।
चाहे यह संयोग हो या परिस्थितियोंवश बना समीकरण, इस समय हमारी कूटनीतिक महत्ता दुनिया में सबसे ज्यादा है। ये महज कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है कि एक तरफरूस हमसे कह रहा है कि जितना तेल या गैस चाहिए, हम देंगे और दूसरी तरफ हूबहू यही शब्द अमरीका भी बोल रहा है। जाहिर है हममें कोई न कोई ऐसी खूबी, ऐसी खासियत तो है ही, जिससे हर गुट चाहता है कि हम उसके पाले में चले जाएं। लेकिन अगर हमें अपनी ताकत बरकरार रखना है, दुनिया के कूटनीतिक नक्शे में खुद को प्रासंगिक बनाये रखना है, तो हमें बहुत सोच-समझकर दोनो गुटों से एक ऐसी दूरी बनाकर रखना होगा, जिससे कोई भी हमें ब्लैकमेल न कर सके। भारत की यही ताकत है और यह ताकत हमें हमारे गुटनिरपेक्ष अतीत से हासिल हो रही है। ऐसे में हमें अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर होने की बजाये, सारे रास्ते खुले रखकर एक ऐसा संतुलन बनाकर चलना होगा कि निकट भविष्य में यानी जब तक हम अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आत्मनिर्भर नहीं हो जाते, कोई देश हमें ब्लैकमेल न कर सके।
असल में ट्रम्प की राजनीति हमेशा से लेन-देन की रही है। वो रिश्तों को भावनात्मक रणनीति या दूरगामी कूटनीतिक सोच के आधार पर नहीं बनाते, उनकी रणनीति का मजबूत पक्ष उपयोगितावादी होता है। किसी एक देश को नहीं, दुनिया के हर देश के साथ उनका यही तात्कालिक और यही दूरगामी नजरिया होता है। चाहे यूरोप हो, चाहे चीन हो, चाहे भारत हो, चाहे नाटो संगठन हो या इस संगठन में शामिल देश हों, अमरीका सबको इसी चश्मे से देखता है। वह नाटो संगठन को कहता है, यह अमरीका पर बोझ बन गया है। हाल के महीनों में जिस तरह से यूरोप से अमरीकी सैनिकों की वापसी हुई है और फिर अचानक पौलेंड में अतिरिक्त सैनिक भेजने जैसे फैसलों ने अमरीकावासियों को ही नहीं, यूरोपीय लोगों को भी गहरे असमंजस में डाल दिया है कि आखिर डोनाल्ड ट्रम्प चाहते क्या हैं? ट्रम्प हमेशा से एक अप्रत्याशित छवि वाले राजनेता रहे हैं। कनाडा, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने भी हाल के दिनों में खुलकर अमरीकी आर्थिक दबाव पर चिंता जताया है। यहां तक कि कई राजनीतिक विश्लेषकों ने तो यह भी कहा है कि पश्चिमी देशों की पुरानी नियम आधारित विश्व व्यवस्था ट्रम्प के अनिश्चिततावादी व्यवहार के चलते दरक रही है।
क्योंकि हम जानते हैं रूस हमारी पुरानी रक्षा ज़रूरतें पूरी करता रहा है, लेकिन एक तरफ आज इसकी जहां तकनीक पुरानी पड़ गई है, वहीं उसके चीन के साथ जो घनिष्ठ रिश्ते बनते जा रहे हैं, उसके चलते हम चाहे भले रूस पर किसी तरह के विश्वासघात की आशंका न करें, मगर हमें यह आशंका तो रखनी ही होगी कि चीन और भारत के किसी कठिन मुठभेड़ के समय वह तटस्थ तो रह ही सकता है। ऐसे में हमें इस कूटनीतिक असंतुलन को संतुलित करने के लिए अमरीका का साथ चाहिए ही होगा। खास करके इंडो-पैसफिक क्षेत्र में। इसलिए रूसी पक्ष या रूस और चीन के संयुक्त पक्ष द्वारा भी भारत को बार-बार उकसाने के बावजूद हमने अमरीका का ऐसे साथ नहीं छोड़ा कि दोबारा से रिश्ते बनाना ही मुश्किल हो जाए। भारत की यही खूबी आज ट्रम्प को मजबूर कर दिया है कि वह हमारी तारीफ करे, हमें अपने साथ मिलाने के लिए बढ़-चढ़कर हमारी ज़रूरतों को पूरा करने को स्वीकार करें। मतलब यह कि हमें अपनी सालों के कूटनीतिक धैर्य और दोनों गुटों से दूरी बनाये रखने के कारण यह ताकत हासिल हुई है, तो हमें इसको बरकरार रखना चाहिए। रूस हो या अमरीका किसी के भी लुभावने प्रलोभनों पर पूरी तरह से उसके पक्ष में हमें नहीं जाना चाहिए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



