जन-जातीय गरिमा की भावना का उत्सव हैं जंगल
हमारे देश भर में फैले जंगलों, पहाड़ियों और दूरदराज की बस्तियों में एक शांत लेकिन सफल परिवर्तन चल रहा है। जनजातीय समुदाय लंबे समय से भारत की विकास गाथा के केन्द्र में अपने उचित स्थान का इंतजार कर रहे थे। आज वे राष्ट्र की प्रगति के सक्रिय वास्तुकार के रूप में उभर रहे हैं। जनजातीय गरिमा उत्सव की यही भावना है : विकसित भारत की यात्रा का एक राष्ट्रीय उत्सव, जहां प्रगति भूगोल या परिस्थिति का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का समान रूप से अधिकार है।
यह समझने के लिए कि प्रौद्योगिकी जनजातीय विकास के लिए अपरिहार्य क्यों हो गई है, किसी को पहले चुनौती की व्यापकता को समझना चाहिए। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए), राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और संबंधित पहलों में 549 ज़िलों और 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,911 ब्लॉकों के 63,000 से अधिक गांवों को शामिल किया गया है, जिससे 5.5 करोड़ से अधिक आदिवासी नागरिक लाभान्वित हुए हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) पर विशेष ध्यान देने के साथ, इन प्रयासों का उद्देश्य आवास, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कनेक्टिविटी और आजीविका जैसी आवश्यक सेवाओं का सम्पूर्ण कवरेज सुनिश्चित करना है। इस तरह के विविध और विस्तृत इलाके में हर परिवार तक पहुंचने के लिए ऐसी प्रणाली की आवश्यकता होती है जो डेटा-संचालित, कनेक्टेड और उत्तरदायी होती है और यही हम तैयार कर रहे हैं। इस वर्ष जनजातीय गरिमा उत्सव का आयोजन लगभग चार विषयगत सप्ताह के आसपास किया जा रहा है, जो एक साथ जनजातीय विकास के पूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। उद्घाटन का विषय, ‘विकास के एक वाहक के रूप में प्रौद्योगिकी’, इस बात को दर्शाता है कि कैसे डिजिटल सिस्टम, विज्ञान और नवाचार भारत के कुछ दूरस्थ समुदायों तक शासन और अवसर का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण के केंद्र में एक सरल सिद्धांत निहित है :- जनजातीय भाषाओं, संस्कृतियों, विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पर्याप्त सम्मान करते हुए विकास को अंतिम दूरी तक पहुंचना चाहिए।
उद्देश्य के साथ निर्देशित होने पर प्रौद्योगिकी क्या हासिल कर सकती है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बिरसा 101 यानी सिकल सेल रोग के लिए भारत की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर-आधारित जीन थेरेपी है। सिकल सेल रोग लम्बे समय से जनजातीय आबादी के लिए स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है और भारत अब समानता और पहुंच में निहित उन्नत विज्ञान के साथ उस चुनौती का जवाब दे रहा है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑ़फ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) और सीरम इंस्टीट्यूट ऑ़फ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से अनुसंधान, नैदानिक परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। सीएसआईआर-आईजीआईबी में हाल ही में एक संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और सिकल सेल योद्धाओं को एक साथ लाया गया, जो वैज्ञानिक प्रगति और प्रयासों के पीछे की मानवीय तात्कालिकता दोनों को दर्शाता है।
समावेशन की यही भावना इस बात को आकार दे रही है कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जनजातीय विकास के साथ जोड़ा जा रहा है। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में, मंत्रालय ने एक सरल लेकिन दृढ विश्वास पर आधारित एआई-सक्षम प्लेटफार्मों की श्रृंखला प्रस्तुत की, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भाषा एक बाधा नहीं है जिसे दूर किया जाना है, बल्कि एक पहचान है जिसका उत्सव मनाया जाना चाहिए। आदि वाणी, जनजातीय भाषाओं के लिए एआई-संचालित अनुवादक, टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट और टेक्स्ट-टू-स्पीच अनुवाद, ओसीआर और आदिवासी भाषाओं में सरकारी योजना की जानकारी के वितरण का समर्थन करता है, जिससे नागरिकों को घर पर बोलने वाली भाषा में सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ने में सक्षम बनाया जाता है। ट्राइबॉट एक बहुभाषी संवादी एआई सहायक है, जो दूरदराज के क्षेत्रों में नागरिकों को तत्क्षण मार्गदर्शन और शिकायत निपटारे में सहायता प्रदान करके इस प्रयास को और मजबूत करता है। भगवान बिरसा मुंडा सेल और आईआईटी दिल्ली के साथ आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान भी इन प्रयासों पर चर्चा की गई, जो जनजातीय भाषाओं के दीर्घकालिक संरक्षण और सुदृढ़ीकरण सहित एआई के सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और समुदाय-केंद्रित इस्तेमाल पर केंद्रित थी।
एक क्षण ऐसा होता है, जो उस सार को पकड़ लेता है, जिसके लिए हम काम कर रहे होते हैं। यह किसी नीतिगत दस्तावेज या मंत्रिस्तरीय समीक्षा में नहीं पाया जाता है। यह तब पाया जाता है जब दूरदराज की बस्ती की एक आदिवासी महिला, तकनीक से, भाषा से सशक्त होती है और उसे इस बात का अहसास होता हो कि उसकी बात को राष्ट्र सुन रहा है। ऐसे में वह अपनी शर्तों पर सरकारी सेवाओं से जुड़ती है और पूरी गरिमा के साथ जवाब प्राप्त करती है। वह क्षण किसी यात्रा का अंत नहीं है। यह भारत की राष्ट्रीय गाथा में एक नए अध्याय की शुरुआत है।
जनजातीय गरिमा उत्सव इस संदेश को गर्व के साथ ले जाता है। जनजातीय समुदाय, अपनी दृढता, अपने पारिस्थितिक ज्ञान, अपनी कलात्मक परंपराओं और इस भूमि में अपनी गहरी जड़ों के साथ, विकसित भारत की दहलीज पर इंतजार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इसके सबसे शक्तिशाली और प्रेरक वाहकों में शामिल हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी दूरियों को पाटती है, जैसे-जैसे विज्ञान उपचार प्रदान करता है, जैसा कि एआई जंगलों और पहाड़ियों की भाषाओं में बोलता है और जैसे-जैसे शासन सबसे दूर के गांव के अंतिम परिवार तक पहुंचता है, हम हर दिन भारत के करीब आते हैं जो न केवल व्यापकता के रूप में विकसित है, बल्कि अपनी मानवता में परिपूर्ण है। यह वह विकसित भारत है जिसे हम माननीय प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित होकर एक साथ मिलकर निर्मित कर रहे हैं।
(लेखिका भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव हैं)

