क्वाड देशों की सक्रियता

विगत दिवस अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर लगातार बहुत कुछ घटित होता रहा है। रूस और यूक्रेन का वर्षों से चले आ रहे युद्ध के बाद अमरीका-इज़रायल और ईरान के कुछ महीनों के युद्ध के प्रभाव ने एक तरह से विश्व का नक्शा ही बदल दिया है। विश्व आज महंगाई की चपेट में है। तेल जोकि आधुनिक ज़िन्दगी की रफ्तार बन चुका है, की कीमतों में वृद्धि ने सभी ओर बेहद चिन्ता पैदा कर दी है। भारत भी इसकी चपेट में आ चुका है। अन्तर्राष्ट्रीय यत्नों के बावजूद अमरीका और ईरान का युद्ध रुकता नज़र नहीं आ रहा। विगत दिवस अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इसी सन्दर्भ में चीन का दौरा भी किया गया था। उसमें से कोई भी ठोस परिणाम सामने नहीं आए। कुछ दिन पहले अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा उपरोक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति और भारत-अमरीका संबंधों के सन्दर्भ में अहम रहा है। विगत अवधि में दोनों देशों के बीच टैरिफ मुद्दे पर पैदा हुए विवाद और डोनाल्ड ट्रम्प की पाकिस्तान के साथ बढ़ रही निकटता द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करती रही है। भारत के रूस और ईरान के साथ संबंधों को लेकर भी दोनों देशों में दूरियां बनी रही हैं। 
मार्को रूबियो का दौरा आपसी संबंधों में पुन: विश्वास पैदा करने का यत्न कहा जा सकता है, परन्तु एक बहुत अहम घटना भारत में क्वाड विदेश मंत्रियों के हुए सम्मेलन की भी है। क्वार्ड में भारत के अतिरिक्त अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। क्वाड देशों के इस सम्मेलन का इस समय महत्त्व और भी बढ़ जाता है जब ईरान ने होर्मुज़ जल मार्ग पर कब्ज़ा करके विश्व भर के देशों के समुद्री आवागमन को रोक दिया है, जिससे खाड़ी देशों से कच्चे तेल के आयात पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। दूसरी तरफ अमरीका ने ईरान की नाकाबंदी करके उसकी तेल की सप्लाई भी रोक दी है। आज विश्व भर के देश यह चाहते हैं कि इस समुद्री मार्ग को जल्द से जल्द खोला जाए। इसका क्वाड देशों ने अपने समझौते में भी ज़िक्र किया है, परन्तु इससे भी बड़ी बात यह है कि चीन ने अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण अपने पड़ोसी देशों को तो चुनौती दी हुई है, परन्तु उसने हिन्द-महासागर में भी अपनी विस्तारवादी नीतियों पर अमल करके हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के लिए ़खतरा पैदा कर दिया है। 
समुद्र के साथ लगता यह क्षेत्र 8 लाख किलोमीटर का है, जिससे दर्जनों ही देश प्रभावित होते हैं। यह समुद्री क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया से शुरू होता है और हिन्द महासागर तक को अपने दायरे में लेता है। इंडोनेशिया, फिलीपींस और जापान के अनेक ही द्वीप इसमें आते हैं। चीन, दक्षिणी चीन सागर के समुद्र के बड़े भाग को अपनी सम्पत्ति दर्शा रहा है, जिससे इस क्षेत्र के दर्जनों ही देश प्रभावित हुए हैं। क्वाड का मुख्य उद्देश्य चीन के इस बढ़ते विस्तारवाद को हर हाल में रोकना है, ताकि अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री रास्तों के व्यापारिक और अन्य हर तरह के आवागमन सुरक्षित रह सके। जापान भारत का लम्बी अवधि से मित्र देश रहा है। इसने भारत के मूलभूत ढांचे के निर्माण में अब तक बड़ा योगदान डाला है। आज भी यह सहयोग जारी है। ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत के व्यापारिक और मित्रता वाले संबंध बने रहे हैं।
आज लाखों ही भारतीय ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में बसे हुए हैं। विगत अवधि में दोनों देशों में व्यापार बढ़ाने और कई अन्य क्षेत्रों में सहयोग के लिए अहम समझौते भी हुए हैं, जिन्हें समय-समय पर स्वीकार भी किया जाता रहा है। इसी वर्ष क्वाड देशों के प्रमुखों का शिखर सम्मेलन भी भारत में होने की सम्भावना है। यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि चारों देशों का यह समूह अन्तर्राष्ट्रीय मंच  पर आज एक बड़ी शक्ति बन कर उभरा है। इसके अतिरिक्त भी भारत ने यूरोप और अफ्रीका के ज्यादातर देशों के साथ अपने अच्छे संबंध बनाए हुए हैं।
आज भारत की हज़ारों ही कम्पनियां इन देशों में अपना काम-काज कर रही हैं जो भारत की आर्थिकता को बेहतर बनाने में भी अपना योगदान डाल रही हैं। क्वाड देशों में ईंधन की सुरक्षा और अन्य प्रत्येक तरह के ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग क्रियात्मक रूप में भारत के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है। इस सम्मेलन में ़िफजी, जो दक्षिण पैसिफिक महासागर में स्थित है और अंग्रेज़ों की एक बस्ती भी रहा है, में क्वाड देशों की ओर से एक बंदरगाह का निर्माण करना एक अहम कदम है। ये सभी देश इसमें भागीदारी करेंगे। यह निर्माण समुद्री व्यापार को और उत्साहित करने और इसके रास्तों को और अधिक सुरक्षित करने में सहायक होगा, जिससे समुद्री आवागमन को  और भी अधिक सुचारू बनाया जा सकेगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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