आर्थिक संकट विकट हो रहा है
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की जनता से अपील की है कि एक साल तक सोना न खरीदें, विदेश यात्राएं स्थगित रखें, पैट्रोल और गैस ईंधन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाएं और वर्क फ्राम होम की नीति अपनाएं। विपक्ष ने उनकी कटु आलोचना की। मजाक भी बताया गया और कार्टून जारी किए गए। इस कदम को अतिरेक बताया गया।
संकट काल में समय-समय पर देश के प्रधानमंत्री ऐसी अपील कर चुके हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने सोमवार को एक समय का व्रत रखने की अपील की थी। मनमोहन सिंह ने सावधान किया था कि पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। अगर मोदी ऐसी अपील कर रहे हैं तो ज़रूर संकट बड़ा होगा और हमें इस संकट का मुकाबला करना होगा। पिछले एक पखवाड़े में ही ईरान-अमरीका के बीच पुन: बनी युद्ध की स्थितियां, खाड़ी में ओमान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे कई देशों में युद्ध की लपटें भड़कने और बनती आशंकाओं के बीच यह कथन दूरदर्शी लगने लगता है। हम अगर आसपास देखें या पूरे एशिया पर दृष्टिपात करें तो आपको आर्थिक व्यवस्था के संकट ही संकट नज़र आएंगे। यह व्यवस्था उन देशों की राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था के लिए काफी परिवर्तन लाने वाली साबित हो सकती है। युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ। खत्म होने के बाद दुष्प्रभाव लम्बे समय तक बने रह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री से पहले कई एशियाई देशों के प्रधानमंत्री अपनी जनता को आगाह कर चुके हैं और लोगों से खर्च में कटौती तथा बदले दौर का सामना करने की तैयारी की मुहर लगा चुके हैं। अमरीका की मॉनिटरिंग संस्था (्नश्चद्यद्गस्र) के अनुसार पाकिस्तान, फिलीपींस और दक्षिण कोरिया में दर्जनों विरोध प्रदर्शन किए गए फिर ईंधन और दूसरी चीज़ों का कम इस्तेमाल करने के साथ-साथ सरकारें आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत तलाश रही हैं। इंडोनेशिया के पास मात्र तीन सप्ताह से ज्यादा का तेल भंडार नहीं है। वियतनाम एक महीने की भंडारण क्षमता पर टिका है। पाकिस्तान में पैट्रोल की कीमतों से कोहराम मचा है। बांग्लादेश में संकट बहुत है। वहां लोग लम्बे समय तक ब्लैक आऊट की समस्या से आतंकित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या और भी विकट है। इंडोनेशिया को एनर्जी सब्सिडी पर प्रतिदिन 6 हज़ार डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। भारत में पैट्रोल की कीमतों में बार-बार वृद्धि करनी पड़ रही है। दूध की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई है। यह जनता को चुभ रहा है। तेल की कीमतों में अगर और वृद्धि की गई तो अनेक चीज़ों के दाम भी बढ़ेंगे। जिसे सहन करना मुश्किल हो जाएगा। वाशिंगटन सेंटर फॉर ग्लोबल डेवेलपमेंट के अनुसार क्रूड ऑयल को 100 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर रखने से एशियाई सरकारों को प्रत्येक वर्ष घरेलू उत्पाद का लगभग एक प्रतिशत खर्च करना पड़ेगा। कम ही एशियाई देशों के लिए यह मुमकिन है। वे पहले ही गरीबी में सांस ले रहे हैं। डीज़ल और खाद की कमी के चलते पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया के किसान विशेष तौर पर फिक्रमंद हैं। यूरिया जो ज्यादातर खाड़ी देशों से आता है उसकी कीमत युद्ध शुरू होने के बाद पचास प्रतिशत बढ़ गई है। लाखों किसान धान की फसल बोने को लेकर असमंजस में हैं। भारत में कृषि पहले ही मुश्किल दौर में है। जर्मनी के थिंक टैंक के अनुसार भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका में खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों में दस प्रतिशत का इज़ाफा हो सकता है। याद करें कि भारी कीमतों के उछाल से 2022 में श्रीलंका सरकार गिर गई थी।

