क्या निकाय चुनाव परिणाम विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेंगे ?

हवा ़खफा है मगर इतनी संग-दिल भी नहीं,
तुम्हीं को शमाअ जलाने का हौसला न हुआ।
कैस-उल-जाफरी का यह शे’अर भूतकाल से बदल कर मैंने वर्तमान काल में इस लिए लिखा है कि पंजाब की सभी विपक्षी पार्टियां नगर कौंसिल चुनाव में सरकारी धक्के का शोर मचा रही हैं, परन्तु सच तो यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो और चाहे अकाली दल-भाजपा की, उन पर भी पंचायत तथा नगर कौंसिल चुनावों में धक्काशाही के आरोप लगते ही रहे थे। यह अलग बात है कि प्रत्येक सरकार अपने से पहली सरकार से अधिक धक्का करती गई। ‘आप’ सरकार भी अलग नहीं है। इसलिए नगर कौंसिल चुनाव के परिणाम को विधानसभा चुनाव का सैमीफाइनल कहना उचित नहीं। बहुत बार हुआ है कि सरकारी पार्टी नगर कौंसिल चुनाव तो जीत जाती रही, परन्तु विधानसभा चुनाव हारती रही। धक्केशाही लोगों को नाराज़ ही करती है। फिर नगर कौंसिल चुनाव तो सिर्फ शहरी क्षेत्र के ही चुनाव हैं और यह भी देखें कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल लगभग एक करोड़ 56 लाख वोट पड़े थे और अब यह लगभग साढ़े 22 लाख वोट ही पड़े हैं। इसलिए इन चुनावों के परिणाम पंजाब विधानसभा के परिणामों पर ज़्यादा प्रभावी नहीं हो सकेंगे।
वैसे यह ठीक है कि इस समय पंजाब में चाहे सत्ता-विरोधी रुझान अधिक है, परन्तु इसके बावजूद ‘आप’ तथा मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के लिए मौजूदा राजनीतिक स्थिति एक वरदान जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि एक ओर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस समय पूरी तरह शिथिल या सुस्त-सी प्रतीत होती है। दूसरी ओर उसके आधा दर्जन से अधिक नेता मुख्यमंत्री या कांग्रेस अध्यक्ष बनने के इच्छुक तो हैं, परन्तु किसी एक का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार दिखाई नहीं देते। धरातल पर भी कांग्रेसी नेता सिर्फ बयानबाज़ी तक ही सीमित दिखाई देते हैं जबकि कांग्रेस हाईकमान भी अभी सो रही है। अकाली दल ‘हन्ने हन्ने मीरी’ की स्थिति में है। सिख वोट जहां अकाली दलों में बंट जाएंगे, वहीं कांग्रेस, ‘आप’ तथा भाजपा भी सिख वोटों में से हिस्सा लेंगे। इस तरह सिख वोटें 5-6 हिस्सों में बंट जाने के आसार हैं। भाजपा सिर्फ एकजुट ही नहीं, अपितु आए दिन नये नेता भी शामिल कर रही है। भाजपा अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है और कहा जाता है कि उसका लक्ष्य सरकार बनाना नहीं, बल्कि बंगाल की तरह पहले मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है और वह 35-40 सीटों पर अधिक ज़ोर लगाएगी, परन्तु अब भाजपा द्वारा एक जट्ट सिख चेहरे केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से प्रतीत होता है कि भाजपा इस बार ही सरकार बनाने के लिए ज़ोर लागएगी, परन्तु कुछ राजनीतिक क्षेत्र यह भी कहते हैं कि भाजपा ‘आप’ को फिलहाल खत्म करने की रणनीति नहीं अपनाएगी, अपितु उसका लक्ष्य एक ओर कांग्रेस-मुक्त भारत है तथा दूसरी ओर वह सिख अल्पसंख्यकों का नेतृत्व भी खत्म करना चाहती है। सो, यह स्थिति ‘आप’ के लिए किसी वरदान से कम नहीं। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान बहुत तेज़-तर्रार व्यक्ति हैं और उन्हें मौके का फायदा उठाना खूब आता है। भाजपा के साथ तीव्र लड़ाई ‘आप’ को सही बैठती है और यह वृत्तांत (नैरेटिव) कि भाजपा तथा ‘आप’ में ही मुकाबला है, भी दोनों पक्षों के हक में जाता है। वैसे भी यदि ‘आप’ पंजाब में खत्म हो गई तो दिसम्बर में होने वाले गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश के चुनावों में वह कांग्रेस के वोट नहीं काट सकेगी, जो कि भाजपा के अनुकूल नहीं रहता, परन्तु अभी भी अकाली दलों में एकता तथा कांग्रेस के पास फूट खत्म करके सामने आने के लिए कुछ महीनों का समय शेष है, परन्तु जीत-हार का फैसला तो लोगों की ओर से अंतिम अवसर पर ही होगा। चुनावों में हवा अंतिम सप्ताह में बदलती है। हमारे सामने है कि पहले हवा भाई अमृतपाल के पक्ष में चली और बिल्कुल अंतिम सप्ताह भाई सरबजीत सिंह खालसा भी अचानक फरीदकोट से विजयी होकर उभरे। इसलिए वक्त ही बताएगा कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा।
वक्त की पाबन्द हैं आती जाती रौणकें,
वक्त है फूलों की सेज, वक्त है कांटों का ताज।
—साहिर लुधियानवी 
केवल सिंह ढिल्लों का पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनना
यह चर्चा तो काफी देर से चल रही थी कि पंजाब भाजपा का नया अध्यक्ष किसी जट्ट सिख को बनाया जाएगा, परन्तु इस बारे काफी टकराव था कि भाजपा में शामिल किसी नये चेहरे को अध्यक्ष बनाया जाए अथवा किसी पुराने भजापाई को। अंत में केवल सिंह ढिल्लों यह पद प्राप्त करने में सफल रहे हैं। चर्चा है कि उन्हें अध्यक्ष बनाने में सबसे बड़ी भूमिका पार्टी के पंजाब के महासचिव संगठन ‘मंथरी श्रीनिवासलु’ की है। इसके अतिरिक्त पंजाब को क्रियात्मक रूप में देख रहे हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ की भी बड़ी भूमिका बताई जा रही है। ढिल्लों पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के भी काफी नज़दीकी हैं और अब इस्तीफा दे चुके अध्यक्ष सुनील जाखड़ के भी नज़दीकी हैं। ढिल्लों को अध्यक्ष बनाने का साफ तथा स्पष्ट संदेश यही है कि भाजपा ने गांवों में जाने का फैसला कर लिया है और अब वह पंजाब में सरकार बनाने के लक्ष्य से चुनाव लड़ेगी। वैसे केवल सिंह ढिल्लों का मालवा में काफी प्रभाव है और वह एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। 
निगह बुलंद, सुखन दिलनवाज़, या पुर-सोज़,
यही है ऱख्त-ए-स़फर, मीर-ए-कारवां के लिए।
—अलामा इकबाल
(सुखन दिलनवाज़ = दिल को शांत करने वाला भाषण, मीर-ए-कारवां = नेता, रहनुमा)
सिख कौम की मांगों संबंधी एक पत्र
10 प्रमुख सिख शख्सियतों की ओर से भारत सरकार को कौम की 12 मांगें संविधान के दायरे में रह कर हल करने के लिए एक पत्र लिखा गया है। नि:संदेह इन शख्सियतों के पास सिखों का प्रतिनिधित्व करने का कोई कानून प्लेटफार्म नहीं, और यह भी ठीक है कि सिखों की संतुष्टि सिर्फ इन 12 मांगों को मनवा कर ही नहीं हो सकती, क्योंकि पंजाब के साथ अन्याय भी सिखों को अपने साथ किए अन्याय ही प्रतीत होते हैं, परन्तु फिर भी इन 10 सिख शख्सियतों की यह पहल तथा समझदारी तारीफ के काबिल है, क्योंकि यह स्थिति सिखों में संवाद करने तथा अंत में सिख कौम को अपना थिंक टैंक बनाने की ओर बढ़ाएगी। इन मांगों में अलग-अलग स्थानों पर समय-समय पर कृपाण पर रोक लगाने को बंद करना, सिख पहचान की संवेदनशीलता, सभी राजनीतिक सिख कैदियों को आम माफी, दविन्दर सिंह भुल्लर की मौत की सज़ा की माफी, कब्जाए गए सिख धार्मिक स्थानों की वापसी, पंजाब के पड़ोसी राज्यों में पंजाबी लागू करना, करतारपुर साहिब गलियारा स्थायी रूप से खोलना, सिखों की काली सूची खत्म करना, संसद में श्री दरबार साहिब पर हमले तथा सिख कत्लेआम के लिए बिना शर्त माफी मांगना आदि शामिल हैं। नि:संदेह इनमें अभी भी कई सिख तथा पंजाब की लगभग सभी मांगों का ज़िक्र नहीं, परन्तु इस संबंध में पहल करना अच्छी पहल है और कदम-दर-कदम आगे बढ़ना भी अच्छी रणनीति है। सभी मांगें एक बार तो मनवाई भी नहीं जा सकतीं।
इन्हीं ़गम की घटाओं से खुशी का चांद निकलेगा,
अंधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है।
—अ़ख्तर शीरानी
गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी तथा दुआ साहिब 
हरिद्वार में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी साहिब के नवनिर्माण के लिए तो उम्र भर संघर्ष करने वाले सिख नेता हरजीत सिंह दुआ नहीं रहे। यह गुरुद्वारा साहिब श्री गुरु नानक देव जी द्वारा सूर्य के उलट पानी देकर समझाने की घटना वाले स्थान पर बना हुआ था, जो हर की पैड़ी पर ही स्थित था, परन्तु 1979 में गंगा सौंदर्यकरण के समय इसे गिरा दिया गया था। कुछ लोग 1984 में गिराए जाने की बात भी करते हैं। यह गुरुद्वारा 1866 में बनना शुरू हुआ और 1935 में पूर्ण हुआ था। 2003 में अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन तरलोचन सिंह के कार्यालय में हुई बैठक में दुआ, हरिद्वार के डी.सी. तथा उत्तर प्रदेश नहरी विभाग के अधिकारियों में समझौता हुआ था कि यहां से लगभग 200 गज़ की दूरी पर गुरु नानक देव की याद में एक स्थान पर ‘नानकवाड़ा’ की जगह सिखों को गुरुद्वारा साहिब के लिए अलाट की जाएगी। सिखों ने इस स्थान पर कब्ज़ा करके शैड बना कर अस्थायी गुरुद्वारा तो बना लिया, परन्तु अभी तक सिखों को वह जगह कानूनी रूप में नहीं मिली। उल्लेखनीय है कि इस जगह की बात उस समय के उत्तराखंड के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला द्वारा अल्पसंख्यक आयोग के तत्कालीन उप-चेयरमैन तरलोचन सिंह के कहने पर ही चली थी। 
वास्तव में चाहे यह स्थान उत्तराखंड में है, परन्तु इसकी मालिकी अभी भी उत्तर प्रदेश नहरी विभाग की है। हरजीत सिंह दुआ के नेतृत्व में सिख संस्थाओं के समर्थन से गुरु नानक साहिब के 550वें शताब्दी समारोह के अवसर पर एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस संबंध में मिला भी था, परन्तु मामला अभी भी लटक रहा है। उल्लेखनीय है कि 17 सितम्बर, 2003 को तरलोचन सिंह ने तथा गुरुद्वारा कमेटी ने 29 सितम्बर, 2003 को सरकार को इस स्थान की मालिकी देने के लिए पत्र भी लिखा था जिसके बाद मुख्य सचिव ने भी यह स्थान सिख कमेटी को देने के लिए उत्तर प्रदेश अधिकारियों को पत्र लिखा, परन्तु मामला अभी भी लटक रहा है, जबकि विगत 5 वर्षों से फिर एक सिख लैफ्टिनैंट जनरल सेवा-निवृत्त गुरमीत सिंह उत्तराखंड के राज्यपाल हैं। अब जब हरजीत सिंह दुआ जीवन भर संघर्ष करते स्वर्गवास हो गए हैं तो उनको सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि सरकार कानूनी रूप में उनके साथ किए गए फैसले अनुसार इस गुरुद्वारे की मालिकी गुरुद्वारा कमेटी को सौंप दे। इस मामले में सिखों की हालत तो ताहिर अज़ीम के इस शे’अर जैसी है :
मुझ को भी हक है ज़िन्दगानी का,
मैं भी किरदार हूं कहानी का। 

-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000  

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