कभी मिशन होती थी हिन्दी पत्रकारिता 

जब देश 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाता है, तब यह उस यात्रा का स्मरण है जिसकी शुरुआत 1826 में उदन्त मार्तण्ड से हुई थी और जो आज मोबाइल स्क्रीन, यू-ट्यूब चैनलों और डिजिटल स्टूडियो तक पहुंच चुकी है।
एक बड़ा प्रश्न है—क्या हिंदी पत्रकारिता आज भी उतनी ही स्वतंत्र, निर्भीक और जनपक्षधर है जितनी अपने आरंभिक दौर में थी? लेख और समाचार सत्य की नींव पर खड़े होकर सत्ता से टकराते थे और उनके परिणाम सच का आईना होते थे। पत्रकार का लिखा पाठकों के मन को छू जाने के कारण एक अंगारे की तरह धधकता रहता और सच्चाई को सामने ले ही आता था। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे नाम उस दौर की याद दिलाते हैं जब पत्रकारिता नौकरी नहीं, राष्ट्रीय चेतना का अभियान थी। पत्रकार जेल जाते थे, अखबार बंद होते थे, लेकिन कलम नहीं रुकती थी।
हिंदी की पहुंच जनमानस तक थी और है। अंग्रेज़ी में लिखने वाले लेखक भी हिन्दी में अनुवाद, रूपांतर के ज़रिए विशाल हिन्दी पाठक वर्ग तक पहुंचने को लालायित रहते थे। खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार भी अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिन्दी में छपने के कारण सामान्य पाठकों के बीच लोकप्रिय हुए। इसी दौर में पत्रकारिता धीरे-धीरे संस्थानों से निकलकर व्यक्तित्व आधारित होती गई। पत्रकार घरानों को उद्योगपतियों द्वारा अपने विशाल औद्योगिक साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। सम्पादक का महत्व कम होता गया और सम्पादकीय कार्यालय उसकी एक अन्य गतिविधि बन गई और जैसा वह चाहे वैसा लिखा जाए या उसके हितों का समर्थन करते हुए पत्रकार अन्य कर्मचारियों की तरह उसके स्वार्थ पूरा करने में अपना लेखकीय योगदान दें। 
समाचार पत्र समूह जिनके लिए अंग्रेज़ी में पत्र पत्रिकाएं निकालना सत्ता में पैठ बनाने का मकसद लिए होता था, हिन्दी में अखबार निकालना जनमानस तक पहुंचने का रास्ता था। हिन्दी की कभी भारतीय भाषाओं के साथ प्रतिद्वंद्विता या प्रतियोगिता नहीं थी, परन्तु अंग्रेज़ी अक्सर दो बिल्लियों के बीच लड़ाई करवा कर बंदर की भूमिका निभाने में सफल हो जाती थी जिस कारण अंग्रेज़ी के अखबार 24, 28 या 40 पन्नों तक के होने लगे, हिन्दी के 4, 8 या 12 पन्नों तक सिमट गए। इस बात के प्रमाण हैं कि अनेक हिन्दी पत्र इतने समर्थ थे कि समूह के अंग्रेज़ी प्रकाशनों का खर्चा चलाते थे। विडम्बना यह रही कि इस स्थिति के बावजूद सबसे पहले हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं को बंद किया जाता था। अंग्रेज़ी पत्रिकाओं पर हावी दिनमान जैसी हिन्दी पत्रिकाएं बंद कर दिए गए।
यह फार्मूला अपना लिया गया कि यदि समाचार पत्र या पत्रिका लाभ में नहीं है तो उसे बंद कर दो, चाहे उसकी सर्कुलेशन और पाठकों के बीच पहुंच कितनी भी हो। इसके बाद बड़े समूहों ने सम्पादक की आवश्यकता को कम करते हुए इस तरह का मॉडल अपनाया जिसमें बाज़ार का प्रभुत्व हो और उसे जानने वाले बतायें कि सम्पादक को अपने सम्पादकीय लिखते और अन्य सामग्री का चयन करते समय किन बातों का ध्यान रखना है।  इस दौर में भी कुछ हिन्दी समाचार पत्रों के मालिक पत्रकारों की लेखनी के पक्षधर बने रहे और स्वतंत्र तथा तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता जीवंत बनी रही। 
हिन्दी और क्षेत्रीय पत्रकारिता ने गांवों की समस्याएं और स्थानीय भ्रष्टाचार से सीधा सामना किया।  यही कारण है कि भारत में सबसे अधिक चुनौती अक्सर उन पत्रकारों को होती है जो छोटे शहरों और कस्बों में काम करते हैं। आज मोबाइल फोन ने हर व्यक्ति को संभावित पत्रकार बना दिया है। यू-ट्यूब और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक तो बनाया है लेकिन इसमें जब निजी स्वार्थ शामिल हो जाता है तो इसकी छवि धूमिल हो जाती है। डिजिटल युग अपने साथ नई समस्याएं भी लाया है, जैसे फेक न्यूज़, ट्रोल संस्कृति, एल्गोरिद्म आधारित सनसनी, विचारधारात्मक ध्रुवीकरण और वायरल होने की होड़। आज खबर पहले वायरल होती है, सत्यापन बाद में होता है।
पहले समाचार जनता तक पहुंचते थे, परन्तु अब सार्वजनिक व्यवहार स्वयं समाचार उद्योग तक पहुंचता है। डिजिटल फ्लेटफार्म फैसला करते हैं कि कौन-सा समाचार कितने समय के लिए और कैसे दिखाना है। अब सिर्फ सम्पादक की मज़र्ी नहीं चलती, क्योंकि डेटा तथा विज्ञापन नये ‘अदृश्य सम्पादक’ बन गए हैं। यह आधुनिक पत्रकारिता का सबसे बड़ा तथा कम खर्च वाला सच है। क्या आज भी कोई पत्रकार सचमुच कह सकता है—न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर? शायद यह पूर्ण वास्तविकता नहीं, लेकिन पत्रकारिता का आदर्श अवश्य है और जब तक यह आदर्श है, तब तक लोकतंत्र में आस्था भी जीवित रहेगी। अंतत: पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, समाज को सच के साथ खड़ा करना है।
 

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