पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार है दूध

आज विश्व दुग्ध दिवस पर विशेष 

दूध के पोषण महत्व तथा डेयरी क्षेत्र के योगदान को सम्मानित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 1 जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है।  इसकी शुरुआत वर्ष 2001 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ एओ) द्वारा की गई थी तथा इस दिवस को मनाने का प्रमुख उद्देश्य दूध के पोषण मूल्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, डेयरी किसानों एवं दुग्ध उद्योग के योगदान को सम्मान देना, खाद्य सुरक्षा और पोषण में दूध की भूमिका को रेखांकित करना तथा सतत डेयरी उत्पादन को बढ़ावा देना है। सच तो यह है कि यह दिवस ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोज़गार सृजन में डेयरी क्षेत्र के महत्व को भी उजागर करता है।
सनातन भारतीय संस्कृति में तो दूध को अत्यंत पवित्र, सात्विक और संपूर्ण आहार माना गया है। हमारे यहां तो वैदिक काल से ही दूध का उपयोग पूजा-पाठए यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में होता रहा है। भारतीय ग्रामीण जीवन, कृषि और पशुपालन की परम्परा में दूध का विशेष स्थान है।  बच्चों, युवाओं और वृद्धों सभी के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। एक रोचक तथ्य यह भी है कि दूध में लगभग 87 प्रतिशत पानी होता है, फिर भी यह सफेद दिखाई देता है। इसका कारण इसमें मौजूद केसीन नामक प्रोटीन तथा वसा के सूक्ष्म कण होते हैं। जब प्रकाश इन कणों से टकराता है तो वह सभी दिशाओं में समान रूप से बिखर जाता हैए जिससे दूध सफेद दिखाई देता है। संस्कृत में बड़े ही खूबसूरत शब्दों में कहा गया है कि दूध शरीर को बल, बुद्धि और आयु प्रदान करने वाला श्रेष्ठ आहार है। आज बढ़ती वैश्विक जनसंख्या के बीच डेयरी क्षेत्र करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार बना हुआ है और ग्रामीण विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। देश का वार्षिक दुग्ध उत्पादन 240 मिलियन टन से अधिक हो चुका है और यह क्षेत्र करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत है। विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष 930 मिलियन टन से अधिक दूध का उत्पादन होता है। वहीं, प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता के मामले में न्यूज़ीलैंड तथा कुछ यूरोपीय देश अग्रणी माने जाते हैं।
भारत को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने और विश्व का अग्रणी दुग्ध उत्पादक देश बनाने में श्वेत क्रांति की ऐतिहासिक भूमिका रही है। सरल शब्दों में कहें तो भारत को दूध की कमी वाले देश से विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बनाने का श्रेय इसी कार्यक्रम को जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1970 में ‘मिल्कमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में हुई थी।
भारत में प्रत्येक वर्ष 26 नवम्बर को डॉ. वर्गीज कुरियन के जन्मदिवस के अवसर पर राष्ट्रीय दुग्ध दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1970 में प्रारंभ हुआ ‘ऑपरेशन फ्लड’ उस समय दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण विकास कार्यक्रम माना गया था। बिल गेट्स सहित अनेक वैश्विक विचारकों ने इसे एकाधिकार और गरीबी के विरुद्ध सबसे सफल लोकतांत्रिक आंदोलनों में से एक बताया है, क्योंकि इसने किसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी के बजाय सीधे छोटे किसानों को सशक्त बनाया। आज वैश्विक दुग्ध उत्पादन में लगभग एक-चौथाई योगदान भारत का है। इस दृष्टि से भारत को विश्व की दुग्ध महाशक्ति कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत के अतिरिक्त अमरीका, पाकिस्तान, चीन, ब्राज़ील, जर्मनी, रूस, फ्रांस, न्यूज़ीलैंड और तुर्किये विश्व के प्रमुख दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल हैं। डेनमार्क भी अपने विकसित डेयरी उद्योग के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है।
डेयरी क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। वर्ष 2025 में विश्व दुग्ध दिवस की थीम ‘आइए डेयरी की शक्ति का जश्न मनाएं’ रखी गई थी। इस थीम के माध्यम से पोषण, ग्रामीण आजीविका, आर्थिक विकास और सतत विकास में डेयरी क्षेत्र की भूमिका को रेखांकित किया गया था। इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में विश्व दुग्ध दिवस की थीम ‘महिला डेयरी किसानों का उत्सव’ रखी गई है। यह थीम डेयरी क्षेत्र में महिलाओं के योगदान, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण तथा खाद्य सुरक्षा में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मानित करती है। सरल शब्दों में कहें तो यह थीम पशुपालन और डेयरी उद्योग में महिला किसानों के अतुलनीय योगदान तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी सक्रिय भागीदारी को केन्द्र्र में रखती है। विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर डेयरी क्षेत्र की उपलब्धियों के साथ-साथ इसकी चुनौतियों और उनके समाधानों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। 
पशुओं में रोगों का प्रकोप, गुणवत्तापूर्ण चारे की कमी, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान, दूध में मिलावट, कोल्ड चेन अवसंरचना का अभाव तथा छोटे दुग्ध उत्पादकों को उचित मूल्य न मिलना आदि प्रमुख समस्याएं हैं। इन चुनौतियों के समाधान के लिए पशुओं के नियमित टीकाकरण, उन्नत नस्लों के विकास, संतुलित पशु आहार की उपलब्धता, आधुनिक डेयरी तकनीकों के उपयोग, दुग्ध संग्रहण एवं शीत भंडारण सुविधाओं के विस्तार तथा दूध की गुणवत्ता की प्रभावी निगरानी आवश्यक है। विश्व दुग्ध दिवस केवल दूध के महत्व का ही उत्सव नहीं है, बल्कि यह किसानों, पशुपालकों और डेयरी क्षेत्र से जुड़े करोड़ों लोगों के योगदान को सम्मान देने का अवसर भी है। दूध पोषण, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा का एक मज़बूत आधार है। (एजेंसी)

#पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार है दूध