चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की बरकतें

चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की नई टीम पंजाब तथा चंडीगढ़ के प्रमुख व्यक्तियों एवं संस्थाओं के साथ तालमेल करके नई और अनोखी ऊंचाइयों को छू रही है। यू.टी. गैस्ट हाउस में हुए 2025 के अंतिम दिनों वाले अंतर्राष्ट्रीय कवि दरबार की महिमा अभी हवा में ही थी कि इस संस्था ने 22 मई, 2026 को अपने शहर के मेहर चंद महाजन डी.ए.वी. कॉलेज के परिसर में आठ साहित्यकारों को सनापति सम्मान प्रदान करके और अगले दिन 23 मई को सैक्टर 38 के रानी लक्ष्मी बाई भवन के आंगन में 2023-24 में प्रकाशित हुईं सबसे अच्छी पुस्तकों को निवाज़ कर उपलब्धि हासिल की है।
2025 के कवि दरबार में चंडीगढ़ और पंजाब समेत दूर-दूर से आए कवियों ने भाग लिया। इनमें फ्रांस, नीदरलैंड्स, तिब्बत, नेपाल, शिलांग, कोच्चि, कोलकाता, जयपुर, अजमेर और दिल्ली के कवियों ने अपनी कविताएं पढ़ीं। उनके उत्तम शब्दों की गूंज आज भी हवा को महका रही है। भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन माधव कौशिक के शब्दों सहित जो इस कवि दरबार की अध्यक्षता कर रहे थे।
22 मई की शाम को सनापति पहचान के लिए सम्मानित लेखकों में गुरपाल सिंह संधू तथा रौणकी राम  पंजाबी साहित्यकार हैं। माधव कौशिक तथा संतोष शर्मा हिन्दी भाषा के जाने-पहचाने हस्ताक्षर हैं। इनके अतिरिक्त सुलेखा शर्मा तथा विवेक अतरे अंग्रेज़ी भाषा के तथा विक्रम कुमार विवेकी तथा जसबीर सिंह संस्कृत के। वहां यह बात नोट करने वाली है कि अच्छी पुस्तकों के लिए सम्मानित किए गए लेखकों में अंग्रेज़ी, हिन्दी और पंजाबी रचनाकार तो हैं परन्तु संस्कृत का कोई नहीं। जहां तक उर्दू भाषा का संबंध है, यह भी संस्कृत की तरह दृष्टिविगत हो गई है। उर्दू को तो 1947 के देश विभाजन ने दबा लिया, नहीं तो मिज़र्ा गालिब, फैज़ तथा साहिर की बुलंदियां छूहने वाली इस भाषा को कौन भूल सकता था। टी.एन. चाज़ के अनुसार :
उर्दू का मुहाफिज़ है, हिन्दू ना मुसलमां ही,
बेगोद से बच्चे को अब किसने उठाना है।
यह बात अलग है कि डिजिटल मीडिया के इस युग में चंडीगढ़ की इस एकादमी जैसी कुल संस्थाओं ने प्रकाशित हुए अक्षरों की लाज रखी हुई है। अकादमी द्वारा पुस्तके लिखने वालों की राशि को 25,000 रुपये से दोगुना करना इसकी पुष्टि करता है। यदि इसमें अनुवादित पुस्तक के लिए सम्मानित किए गए जगदीप सिद्धू तथा आलोचना करने वाले डा. जसपाल सिंह को भी याद कर लें तो चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की कलगी को दो और पंख लग जाते हैं।
जिन लेखकों को उनकी पुस्तकों के लिए सम्मानित किया गया, उनमें लोकगीत प्रकाशन के हरीश जैन, गुनाहगार नामक पंजाबी नाटक के लिए, शशि प्रभा की ‘मैं ने पूछा पापा से’, प्रेम विज की ‘मेहनत दा फल’ के लिए, मुरारी लाल अरोड़ा ‘एक शाम बच्चों के नाम’ (हिन्दी) के लिए, राजेश अतरे हिन्दी नाटक ‘त्याग या परित्याग’ के लिए, विजय कपूर हिन्दी काव्य संग्रह ‘बह जाने के बाद’ के लिए, मोहन लाल जाट ‘चंडीगढ़ तूं मैं’ के लिए, राजिन्दर धवन ‘मैं सागर खारा तुम नदी मीठी’ के लिए तथा ब्रिज भूषण, मनोज कुमार, रविन्दर टंडन, हरलीन कौर, सरदारी लाल धवन, सतीश थिंद, दविन्दर कौर, सिमरजीत कौर ग्रेवाल, हरदेव चौहान, गुरदर्शन सिंह मावी तथा सुभाष शर्मा उनकी अलग-अलग विधाओं में लिखीं रचनाओं के लिए सम्मानित किए गए। यदि इनमें पंकज मालवियां की ‘थिएटर के बाद’, राजिन्दर निशेश की ‘सूरज दा घोड़ा’, योजना रावत की ‘पूर्वराग’, विजय कपूर की ‘तुम ही बताओ’, हरबंस कौर गिल की ‘कड़क कलेजे माहि’ बहादर सिंह गोसल की ‘मेरीयां श्रेष्ठ बाल कहानियां’, लिल्ली स्वर्ण की ‘डिवाइन डायलैक्ट आफ फ्लावर’ तथा राजबीर देसवाल की गिन लें तो इनकी संख्या अढ़ाई दर्जन से बढ़ जाती है।   
इन समारोहों के मुख्य मेहमान तथा अध्यक्ष डा. गुलाब चंद कटारिया, राज्यपाल पंजाब, डा. रत्न सिंह, उप-कुलपति, जगत गुरु नानक देव पंजाब स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी, पटियाला तथा माधव कौशिक अध्यक्ष भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली थे, जिनकी भावना गुलाब चंद कटारिया के शब्दों से स्पष्ट है। उन्होंने साहित्य को समाज का आईना कह कर प्रशंसा की और इसे सही दिशा की ओर लेजाने वाला प्रकाश सतम्भ बताया। उन्होंने अब तक मिले दिशा-निर्देशों का गुणगान करते हुए वर्तमान साहित्यकारों से भी यही आशा व्यक्त की। साहित्य को अपने-अपने युग का मार्गदर्शक कह कर नये साहित्यकारों की महिमा की। उन्होंने साहित्य को अपने-अपने युग का आभूषण कह कर सराहा और इससे सांस्कृतिक चेतना तथा बौद्धिक गहराई की उम्मीद करके नये तथा पुराने लेखकों से पहरा कायम रखने की अपील की।
अंतिका 
(मिज़र्ा ़गालिब)
मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
काश कि इधर होता अर्श से मकां अपना।  

ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com  

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