1950 के दशक की ग्लैमर क्वीन 

जिस समय ‘अच्छे घरों’ की महिलाओं के लिए फिल्मों में काम करना बुरा समझा जाता था, तो एक महिला ने खामोशी से इस परम्परा को चुनौती दी और बड़े पर्दे पर ग्लैमर की धारणा को ही बदल कर रख दिया। यह थीं ब़ेगम पारा, जिन्हें अक्सर बॉलीवुड की ओरिजिनल ग्लैमर गर्ल के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने उस युग में साहस दिखाया, जिसमें मामूली बोल्डनेस का संकेत भी आपत्तियों व आलोचनाओं को आमंत्रित कर लेता था। 1950 के दशक में अभिनेत्रियों से उम्मीद की जाती थी कि वह एक विशिष्ट इमेज में बंधी रहें- शालीन, रिज़र्व व पुरातनपंथी। लेकिन बेगम पारा ने इन ज़ंजीरों को तोड़ा जब उन्होंने ‘लाइफ मैगज़ीन’ के साहसिक फोटोशूट में पोज़ किया। अपने समय के लिए वह शूट बहुत बोल्ड था और पूरे देश में खलबली मचा गया था। अधिकतर के लिए यह शॉक था, जबकि ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जो इसे क्रांतिकारी समझते थे, लेकिन इससे वास्तव में हुआ यह कि सिनेमाई महिलाओं के प्रति नज़रिया बदलने लगा और अधिक मुखर व आत्मविश्वास से भरी महिला पात्रों के चित्रण के लिए दरवाज़े खुल गये। 
बेगम पारा की कोई योजना फिल्मों में आने की नहीं थी। वह फिल्मों में कैसे आ गईं, यह जानने के लिए उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। ज़ुपबेदा उल हक के रूप में बेगम पारा का जन्म 25 दिसम्बर 1926 को झेलम (वर्तमान में पंजाब, पाकिस्तान) में हुआ था, एक शाही पंजाबी परिवार में। उनके पिता मियां एहसान उल हक जालंधर में न्यायाधीश थे और बाद में बीकानेर रियासत के मुख्य न्यायाधीश भी रहे। वह अपने समय के बहुत अच्छे क्रिकेटर भी थे। उनका परिवार अलीगढ़ में बस गया, जहां बेगम पारा की परवरिश अति अनुशासित लेकिन उदार वातावरण में हुई। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त की। उनकी बड़ी बहन ज़रीना हक ने मदन मोहन बिम्बेट से शादी की और इस जोड़े की बेटी मीनू बिम्बेट थीं, जो बाद में राजनीतिक एक्टिविस्ट रुखसाना सुल्ताना के नाम से जानी गईं। एक्टर अमृता सिंह मीनू बिम्बेट की बेटी हैं यानी बेगम पारा सारा अली खान की परनानी थीं। बेगम पारा के बड़े भाई मसरूर उल हक 1930 के दशक के आखिर में बॉम्बे आ गये थे, एक्टर बनने के लिए। मसरूर की मुलाकात बंगाली अभिनेत्री प्रोतिमा दासगुप्ता से हुई, सेट पर, दोनों में प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। 
बेगम पारा अक्सर अपने भाई से मिलने के लिए बॉम्बे आती थीं। वह अपनी भाभी प्रोतिमा के साथ फिल्मी सेट्स व पार्टियों में भी जाया करती थीं। एक पार्टी में बेगम पारा पर फिल्मकार एस मुखर्जी व अभिनेत्री देविका रानी की नज़र पड़ी। वह दोनों बेगम पारा की उपस्थिति व आकर्षण से प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्म में भूमिका ऑफर की। बेगम पारा की पहली फिल्म ‘चांद’ 1944 में रिलीज़ हुई। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब रही और एक सफल कॅरियर का आरम्भ हो गया। बेगम पारा ने एक के बाद एक फिल्में कीं और वह इतनी तेज़ी से टॉप पर पहुंची कि कुछ ही वर्षों में अपने समय में सबसे अधिक पैसे लेने वाली अभिनेत्री बन गईं। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी में जब उनकी असाधारण सुंदरता व विश्वास का मिश्रण हुआ तो वह भीड़ से एकदम अलग खड़ी दिखायी दीं। 
जब वह अपने करियर के चरम पर थीं, तो उन्होंने 1958 में दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर खान से शादी कर ली और फिल्मों को अलविदा कह दिया ताकि अपने परिवार पर फोकस कर सकें। बेगम पारा व नासिर खान के तीन बच्चे हुए, जिनमें से एक अयूब खान फिल्म एक्टर हैं, लेकिन जीवन की अपनी चुनौतियां होती हैं। नासिर खान का 1974 में निधन हो गया। बेगम पारा दु:ख व अकेलेपन से घबराकर अपने बच्चों को लेकर पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह दो वर्ष के भीतर ही वापस भारत लौट आयीं। फिर दशकों तक वह स्पॉटलाइट से दूर जीवन बसर करती रहीं। उन्होंने उस फिल्मोद्योग में खामोश जीवन व्यतीत किया जिस पर वह कभी राज करती थीं। 

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#1950 के दशक की ग्लैमर क्वीन