टीनएजर बच्चों को भी समझनी चाहिए मां-बाप की परेशानियां
अनुभा अपने ऑफिस में अकसर चिड़चिड़ी सी रहती हैं। उसका मूड अकसर सुबह से ही खराब रहता है। सब जानते हैं कि वह दो टीनएजर बच्चों की मां है। आज अनुभा इस बात को लेकर परेशान थी कि जब से रोहित की छुट्टियां हुई हैं, वह पिछले तीन दिन से न तो घर से बाहर निकला, न नहाया और न ही उसने कपड़े बदले हैं। जब वह टीवी देखने के लिए अपनी मां अनुभा के साथ बैठता है, तो अनुभा को उसके शरीर से पसीने की इतनी तेज दुर्गंध आती है कि वह उसे तुरंत नहाकर आने के लिए कहती हैं; लेकिन रोहित पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। उसका जब मन होता है, वह तभी नहाता है वरना वह बिना नहाए चार पांच दिन तक आराम से रह लेता है। रोहित की देखा देखी उसकी एक साल छोटी बहन भी वैसा ही व्यवहार करती है। घर में केई भी आ जाए वह स्लीवलैस कपड़ों में ही होती है। गंदा पजामा, बिना धोया मुंह, गंदे पैरों से वह बिस्तर पर लगातार अपने लैपटॉप पर फेसबुक से अपने फ्रेंड्स के साथ कनेक्टेड रहती है। यदि अनुभा उसे पैर धोकर बिस्तर पर आने के लिए कहती है, तो वह चिड़ जाती है। इस बात की शिकायत यदि अनुभा किसी से करती है, तो वह मां से लड़ने के लिए तैयार हो जाती है। टीनएज में बच्चों के व्यवहार में बदलाव आना सहज और स्वाभाविक है। लेकिन यदि बच्चे पैरेंट्स की किसी बात पर कोई ध्यान न दें, उनकी आज्ञा का उल्लघंन करें और अपने मनमाफिक तरीके से अपनी चीजों को हैंडिल करें तो इस तरह की स्थितियां मांओं के लिए खासतौर पर तनाव का सबब बन जाती हैं। टीनएजर लड़के या तो घर में टिकते नहीं हैं या घर में ही रहकर लगातार अपने कम्प्यूटर के जरिए अपने को ऑनलाइन रखते हैं। अपने कॅरियर और फैशन के प्रति वे इतने जागरूक होने का दावा करते हैं इसके बावजूद अपने रखरखाव की बात आती है, तो इसके प्रति लापरवाही बरतते हैं। इंटरनेट पर लगातार ऑनलाइन साइट्स के जरिए बदलते फैशन, मैन्स फैशन और स्टाइल पर अपनी पैनी निगाह रखते हैं। लेकिन खुद न समय पर नहाते हैं और न ही अपने कपड़ों का ध्यान रखते हैं। दरअसल उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता और वह इस बेफिक्री को ही अपना स्टाइल बना लेते हैं। अब रोहित के दोस्त गौरव को ही लें। वह अभी स्कूल में है, लेकिन उसकी दिली इच्छा है कि वह अपने बाल बढ़ाकर पोनी बनाए। उसकी ये ख्वाहिश है कि कॉलेज में एडमिशन लेने से पहले ही सबसे पहले छुट्टियों में ही अपने बाल लंबे करेगा और कानों में बाली तो उसे पहननी ही है। वह कहता है अभी तो समय है मस्ती करने के लिए कॅरियर बनाने के बाद जब सेटल हो जाएंगे, तो ये सब कहां करेंगे। फिर ये मस्ती की उम्र ही तो है।
इन टीनएजर की एकतरफा ये सोच है लेकिन दूसरी तरफ पैरेंट्स है कि वो उन्हें किसी भी तरह की आजादी देने के पक्ष में नहीं है। उनके पास अपने बच्चों की ढेरो शिकायतें होती है। हर चीज के प्रति बेपरवाह, चीजों को गंभीरता से न लेना, गंदा रहना, बात बात पर गर्म हो जाना, खुद को लॉजिकल साबित करना, हाजिर जवाबी की इंतहा देखिए कि इधर सवाल, पट जवाब। किसी की रिस्पेक्ट न करना, घर में किसी मेहमान के आने पर न तो उनके सामने आना न ही उनसे बात करना और न ही उनमें अपनी कोई दिलचस्पी दिखाना। लिस्ट बहुत लंबी है। पैरेंट्स की अपनी शिकायतें हैं। ये बच्चे क्यों नहीं समझते कि घर के भी अपने नियम कायदे होते हैं। अनुभा की भी हर समय यही शिकायत होती है कि कितने अच्छे वो दिन थे, जब वह अपने बच्चों को सुबह-सुबह नहला-धुलाकर सुंदर कपड़े पहनाकर उन्हें घर में रखती थी। स्कूल कॉलेज जाने के लिए भले ही वे अब नहाते हों, लेकिन घर में रहने के दौरान वह अपनी दिनचर्या में पूरा बदलाव कर लेते हैं। यदि उनसे कुछ कहा जाए तो वे अपने दूसरे फ्रेंड्स का उदाहरण दे देते हैं। अच्छा घर, अच्छा कॅरियर, अच्छा जीवन यह सब पाने के लिए उन्हें अपने आज को भी संभालना होगा। वो भी उसी दौर से गुजरेंगे जिस दौर से आज उनके पैरेंट्स गुजर रहे हैं। उनके साथ भी वही सब होने वाला है कि घर वह बनाएंगे और जिसका अनुशासन उन्हीं के टीनएजर बच्चे भंग करने की कोशिश करेंगे। अपने दिन रात के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से वे घर बनाएंगे। उसमें सामान जुटाएंगे और उनके बच्चे उन्हीं की कमाई हुई चीजों पर मौज करेंगे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



