व्यंग -जानि न जाइ कुर्सी की माया
मैंएक कुर्सी हूं। बहुत सीधी-सादी, बहुत विनम्र। मेरे लिए चारों ओर आपाधापी मारकाट हमेशा मची रहती है, पर इसमें मेरा लेशमात्र दोष नहीं। मेरा इतिहास भूगोल बहुत पुराना है। यानि हर युग में, हर इंसान से मेरा पुराना नाता रहा है और हमेशा रहेगा। कुर्सी के लिए राजे महाराजे, नवाबों, जमीदारों, पाटीदारों में हमेशा संघर्ष रहा है। भले ही युग परिवर्तन के साथ मेरे रुप रंग और स्वरूप बदलते रहे हो, पर मेरे लिए आज भी जंग जारी है।
मेरे लिए कभी देश के अंदर जंगें होती हैं, तो कभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर एक देश दूसरे देश पर अपनी हनक जमाने के लिए ऊंची कुर्सी पाने के लिए मैदान-ए-जंग में होते हैं। कहते हैं, कुर्सी न किसी से प्रेम रखती हैं, न बैर, जो उस पर बैठता वह उसकी हो जाती हैं। फिर उस पर बैठने वाला चाहे कामी, क्रोधी, लालची हो या फिर राजा हरिश्चंद्र। सिंहासन से लेकर आज लाखों करोड़ों वाली स्पेशल कुर्सी तक के अपने सफर में मैंने यह देखा है कि मुझे पाने के लिए कहीं बेटा बाप का बैरी बन जाता हैं, कहीं भाई-भाई का दुश्मन बन जाता है, कहीं पति पत्नी का दुश्मन बन जाता हैं एक ही दोस्त-दोस्त का दुश्मन बन जाता है एक हीं कहीं तो बरसों से प्रेम में पगे रिश्ते भी एक कुर्सी की खातिर चिंदी-चिंदी हो जाते हैं। तार-तार हो जाते हैं।
आजकल एक मुख्यमंत्री की महंगी कुर्सी लोगों के लिए खास चर्चा का विषय बनी हुई है, कोई कह रहा, लाखों की यह फॉम वाली आरामदायक कुर्सी किस मद से आई, कोई बताए? कोई कह रहा है, इतनी आरामदायक कुर्सी पर बैठ कर मुख्यमंत्री जी गरीबों, बेरोज़गारों का दर्द क्या समझेंगे? कोई लिख रहा है, इतनी आरामदायक गुदगुदी गद्देदार कुर्सी मुख्यमंत्री ने आराम से सोने के लिए मंगवाई है ताकि उनके कानों तक कमजोर रिआया अपने दुखों, तकलीफों की आवाजें न पहुंचा सकें। और वह आराम से सोते हुए सपने में स्वर्गलोक की रंगीन अप्सराओं का नाच-गाना देखते हुए परमानन्द की प्राप्ति करते रहे। आज सिंघासन बत्तीसी जैसी अनेक पौराणिक कुर्सियों की कहानियां हर गली में असरी-पसरी पड़ी हैं। इसलिए जिधर देखिए उधर आदमी कम, नेता अधिक नज़र आ रहें हैं।
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