अमर प्रेम
जो न तुम होते बेवफा
होता न मेरा जीवन सूना-सूना।
क्या होता है बिन जीवन साथी के जीना?
जीवन फीका-फीका लगता है।
कदम-कदम पर हर कोई
अपनापन दिखलाता है
पर उसके मुख पे धोखा का
मुखौटा होता है।
तुम क्या जानो अबला की पीड़ा
कितना सुनना पड़ता है ताना।
दिया होता जो वफा का सिला
अपना प्यार बनता न अफसाना।
जो न होते वो बेवफा
अपना प्यार भी लैला-मजनूं जैसा होता।
दुनिया की नज़रों में
अपना प्यार अमर प्रेम कहलाता।
-पुष्पेश कुमार पुष्प
विनीता भवन, निकट-बैंक ऑफ इंडिया
काजीचक, सवेरा सिनेमा चौक, बाढ़-803213 (बिहार)
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