गम्भीर होती नशे की समस्या

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में नशे और नशीले पदार्थों के विरुद्ध की गई एक कठोर टिप्पणी जहां पंजाब में नशे की समस्या की गम्भीरता को दर्शाती है, वहीं प्रदेश सरकार को इस समस्या पर शीघ्र अंकुश लगाये जाने हेतु एहसास भी कराती है। सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी कपूरथला ज़िला के कस्बा सुलतानपुर लोधी के गांव पंडोरी की एक उस घटना पर स्वत: संज्ञान लेते हुए की है जिसमें एक परिवार की एक महिला के पांच बेटों में से एक-एक करके सभी नशे की भेंट चढ़ गये। नि:संदेह इस एक घटना ने विगत समय में पंजाब की सीमाओं को लांघ कर बड़ी सनसनी पैदा की थी। यह घटना इंटरनेट पर पूरे देश में वायरल हुई थी। इसके बाद ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे को लेकर गम्भीर चिन्ता की अभिव्यक्ति की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब भर में हुई घटनाओं का हवाला देते हुए स्पष्ट रूप से संकेत किया कि प्रदेश का ज़िला लुधियाना नशे और नशीले पदार्थों के कारोबार का एक बड़ा केन्द्र बन चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि इस समस्या से भविष्य में होने वाला नुक्सान बेहद चिन्ताजनक हो सकता है। अदालत ने प्रदेश सरकार को भी परामर्श दिया है कि इस अति गम्भीर समस्या से निपटने के लिए प्रशासनिक तरीकों में बुनियादी बदलाव लाये जाने की बड़ी ज़रूरत है।
अदालत की इस एक गम्भीर टिप्पणी के बाद यह एक यक्ष प्रश्न सामने आ खड़ा होता है कि प्रदेश की युवा शक्ति को विनाश की ओर धकेलती इस समस्या से आखिर कैसे निजात पाई जा सकती है। गांव पंडोरी की घटना कोई एकाकी घटना नहीं है। इससे पूर्व भी ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जहां पूरे का पूरा परिवार नशे की भेंट चढ़ गया। नशे की लत को पूरा करने के लिए नशेड़ी अपने माता-पिता और भाई-बंधुओं की हत्या कर देने से भी नहीं चूकते। कई ऐसी घटनाएं भी हुई हैं जहां नशा करने वालों ने अपने घर, खेत और धन-सम्पत्ति तक को बेच दिया। नशे के कारोबार की समस्या यूं तो देश के कई अन्य राज्यों में भी है दरपेश किन्तु पंजाब इस दलदल में बहुत गहरे तक धंस चुका है। समस्या की गम्भीरता का पता इस एक तथ्य से भी चल जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह दावा किया है कि नशीले पदार्थों की तस्करी में लिप्त बड़े मगरमच्छों पर हाथ डाला जाना चाहिए। अदालत ने पुलिस प्रशासन को इस सारे मामले में अधिक संवेदनशील होने के लिए भी कहा है।
ऐसा नहीं कि प्रदेश की सरकार इस मामले को लेकर पूर्णरूपेण निष्क्रिय रही है। सरकारी दावों के अनुसार सैकड़ों नशा-कारोबारियों पर छापेमारी कर उन्हें सलाखों के पीछे डाला गया है। नशा करने वाले हज़ारों लोगों के पुनर्वास हेतु सरकारी धरातल पर सैकड़ों नशा छुड़ाओ केन्द्र स्थापित किए गए हैं। सरकार के ऐसे सभी प्रयास नि:संदेह हवा-हवाई नहीं हो सकते, किन्तु कहीं न कहीं ऐसी कोई कमी अवश्य रह जाती है कि जिससे सरकार के सभी प्रयास निष्फल हो कर धरे-धराये रह जाते हैं। न्यायालय द्वारा पुलिस प्रशासन को लगाई गई इस फटकार से मामला काफी स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस कई बार प्रचार पाने के लिए मीडिया के समक्ष छोटे-छोटे अपराधियों को पकड़ लेती है किन्तु वास्तविक समस्या वहीं बनी रहती है। नशे के सौदागर बड़े मगरमच्छों की हिमाकत देखिये कि अदालत ने ड्रग माफिया द्वारा मुख्य न्यायाधीश तक को धमकियां दिये जाने की बात स्वयं स्वीकार की है।
हम समझते हैं कि नि:संदेह यह मामला अब केवल कानून-व्यवस्था से वाबस्ता नहीं रह गया। यह गम्भीर समस्या सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने लगी है। ऐसी स्थिति में इसके विरुद्ध सरकार, समाज, प्रशासन और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को सामूहिक एवं संयुक्त रूप से प्रयास किये जाने की बड़ी आवश्यकता है। केन्द्र सरकार को भी इस मामले में प्रदेश सरकार के समक्ष सहयोग एवं सहायता का हाथ अवश्य बढ़ाना चाहिए। हाल ही में अनेक ग्राम पंचायतों ने सामूहिक रूप से नशे के कारोबारियों के विरुद्ध कार्रवाई का फैसला किया है। इसके अच्छे परिणाम निकलने की आशा भी दिखाई दी है। हम समझते हैं कि सरकार को इन प्रयासों की सार्थकता को प्रोत्साहन देकर आगे आना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों के शीघ्रता से निपटारे हेतु विशेष अदालतें गठित किये जाने की टिप्पणी भी बड़ी कारगर सिद्ध हो सकती है। सरकार को अपने प्रशासन को इस मामले में थोड़ा अधिक सक्रिय करना होगा। सरेआम नशा बिकने जैसी समाचार-पत्रों की सुर्खियां सचमुच चौंकाती हैं। ऐसे में प्रशासन पर उंगली उठना स्वाभाविक है। हम समझते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय की इस कठोर टिप्पणी के बाद पंजाब सरकार को नि:संदेह इस संबंधी अपनी नीति में बदलाव करके समस्या की जड़ पर प्रहार करना चाहिए। तभी इस विष-बेल को समूल नष्ट किया जा सकता है।
 

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