हार के बाद टीएमसी का हश्र क्या शिव सेना जैसा होगा ?

पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की बड़ी हार के बाद, रह-रहकर जो एक के बाद एक घटनाएं सामने आ रही हैं, उन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पार्टी का हाल महाराष्ट्र की शिव सेना जैसा हो सकता है? हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि टीएमसी टूट जायेगी, लेकिन पार्टी पर गंभीर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यूं तो इसकी शुरुआत परिणाम आने के अगले दिन से ही हो गई थी, जब कई नेताओं ने पहले दबी जुबान और फिर खुलकर यह कहना शुरू कर दिया था कि दीदी के कुछ चहेतों की मनमानी के कारण पार्टी का यह हाल हुआ है, लेकिन असली संकट गुजरे 2 जून, 2026 को तब उभरकर सामने आया, जब हाल ही में पार्टी से निकाले गये टीएमसी नेता रिजू दत्ता ने दावा किया कि 80 में से 50 से ज्यादा टीएमसी विधायक खुद को असली तृणमूल बताने की तैयारी कर रहे हैं। रिजू दत्ता ने यह भी कहा कि इन विधायकों के तीन प्रमुख मुद्दे हैं। पहला यह कि असली तृणमूल कांग्रेस हम ही हैं। दूसरा यह कि विपक्ष के नेता ऋतब्रत होंगे, न कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय जिन्हें ममता बनर्जी ने विपक्ष का नेता बनाया है। तीसरा मुद्दा यह है कि क्योंकि दो तिहाई बहुमत हमारे पास है, इसलिए पार्टी का चुनाव चिन्ह हमारा होना चाहिए।
गौरतलब है कि हाल में सम्पन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 80 सीटें मिली हैं। इस तरह दो तिहाई विधायकों के पार्टी से अलग होने पर ही उन्हें एक नये गुट के रूप में मान्यता मिल सकती है और इसके लिए 54 विधायक होने चाहिए। जिन रिजू दत्ता ने मीडिया में जाकर यह सब कहा है, वह खुद विधायक नहीं हैं। इसलिए कोई ज़रूरी नहीं है कि उनके कहे के मुताबिक ही हो, लेकिन जिस तरह खुलेआम पार्टी को तोड़ने और खुद ममता बनर्जी पर भेदभाव बरते जाने के टीएमसी के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गये हैं, उससे यह साफ लगता है कि हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में पहली जैसी पकड़ नहीं रही है। रिजू दत्ता की बात पूरी तरह से हवाहवाई भी नहीं लग रही, क्योंकि 2 जून 2026 को टीएमसी से हाल में निकाले गये दो विधायकों संदीपन शाह और ऋतब्रत बनर्जी ने कोलकाता के एमएलए हॉस्टल में जाकर कई विधायकों के साथ बैठक की है। इनमें ममता बनर्जी के कई बिल्कुल खास विधायक हैं, लेकिन भाजपा ने साफ कहा है कि टीएमसी विधायकों के लिए उनकी पार्टी के दरवाजे बंद हैं। पश्चित बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने साफ शब्दों में कहा है कि हमने बिना किसी बाहरी की मदद के 207 विधायकों का आंकड़ा छू लिया है। इसलिए हमें किसी बाहरी विधायक की ज़रूरत नहीं है।
दूसरी तरफ टीएमसी का दावा है कि सभी विधायक सिर्फ दो निष्कासित विधायकों के अलावा ममता बनर्जी के साथ हैं। विधानसभा में पार्टी की तरफ से विपक्ष के नेता शोभन चट्टोपाध्याय ने कहा कि पार्टी के टूटने की अफवाहें हताशा में दिये गये बयान हैं, इनका हकीकत से कोई लेना देना नहीं है। सारे विधायक ममता बनर्जी के साथ रहेंगे और टीएमसी के संगठन पर अपना भरोसा जतायेंगे। लेकिन कांग्रेस ने मौके पर चौका मारते हुए कहा है कि टीएमसी भले कुछ भी कहे, लेकिन असली बात यही है कि टीएमसी एकजुट नहीं रह पायेगी। कांग्रेस नेता उदित राज ने साफ शब्दों में कहा कि ममता बनर्जी वही काट रही हैं, जो उन्होंने बोया है। टीएमसी के कार्यकर्ताओं में भीषण असंतोष है, इसलिए उसका ज़िंदा रह पाना मुश्किल है। उदित राज के मुताबिक ममता बनर्जी को चाहिए कि वह अब इंडिया ब्लॉक को मजबूत करने के बारे में सोचें। जहां तक इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक पंडितों का आंकलन है, उसके मुताबिक टीएमसी की टूट की तीन संभावनाएं बन रही हैं। 
पहली यह कि टीएमसी के कुल विधायकों में से 54 विधायक पार्टी से अलग हो जाएं, तो उन पर दल-बदल का कानून लागू नहीं होगा। दूसरी स्थिति यह है कि टीएमसी दो गुटों में बंट जाए, लेकिन दूसरे गुट को टीएमसी के रूप में मान्यता तभी मिलेगी, जब चुने हुए 54 विधायक उसके साथ होंगे और इसका फैसला चुनाव आयोग करेगा। पार्टी के 28 में से 19 सांसद भी उनके साथ आने चाहिएं। क्योंकि अलग और मूल पार्टी के रूप में दावा बागी टीएमसी विधायकों का तभी साबित होगा। अगर सांसद साथ नहीं आते तो बागी गुट को विधानसभा में नेता विपक्ष का पद तो मिल सकता है, लेकिन संगठन और पार्टी का संविधान व उसके तंत्र पर नियंत्रण ममता बनर्जी के गुट का ही रहेगा।
साल 2019 में भाजपा और शिव सेना ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर विवाद हो जाने के कारण उद्धव ठाकरे ने भाजपा से अलग होकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर ‘महाविकास अघाड़ी’ (एमवीए) बना ली थी। लेकिन जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिव सेना के 40 से ज्यादा विधायकों ने बगावत कर दी और इस तरह उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री का पद खो दिया। ठीक ऐसे ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को अजित पवार ने साल 2023 में तोड़ दिया था। यही नहीं, फरवरी 2024 में निर्वाचन आयोग ने अजित पवार गुट को आधिकारिक एनसीपी गुट माना था और उसे पार्टी का चुनाव चिन्ह घड़ी अलॉट कर दिया था। ठीक यही हश्र शिव सेना के साथ भी हुआ था, जब बाला साहेब ठाकरे की शिव सेना का चुनाव चिन्ह उद्धव ठाकरे की जगह शिंदे गुट को मिल गया था। 
आखिर क्या वजह है कि चुनाव के पहले जो ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति की सबसे मजबूत लड़ाका नेता लग रही थीं, वह अचानक इस कदर कमजोर हो गई हैं? दरअसल इसकी वजह यह है कि टीएमसी की समूची राजनीतिक संरचना ममता बनर्जी के इर्दगिर्द ही टिकी है। पिछले 15 सालों में सत्ता में रहते हुए ममता बनर्जी ने पूरी ताकत अपने हाथों में रखी है। ऐसे में जब पार्टी हार गई, तो वैचारिक अनुशासन से ज्यादा फायदे की राजनीति की असलियत सामने आ गई और जीते हुए विधायक सत्ता का सुख पाने के लिए इधर-उधर हाथ पैर मारने लगे। दरअसल इन विधायकों को लगता है कि वो टीएमसी के साथ बने रहेंगे तो उनका राजनीतिक भविष्य संकट में पड़ जायेगा। दूसरी बात यह भी है कि भाजपा को पश्चिम बंगाल में दो तिहाई बहुमत मिलने के कारण टीएमसी के कार्यकर्ताओं और दूसरी कतार के नेताओं का भी मनोबल टूट गया है। उन्हें लगता है जिस तरह लंबे समय तक प्रदेश में सीपीएम का शासन रहा, फिर ममता बनर्जी का, उसी तरह अब लंबे समय के लिए भाजपा सत्ता पर काबिज रहेगी, तो उनका क्या होगा? ये सारी उठा-पटक इसी हताशा का नतीजा है, जो अगर टीएमसी को दूसरी शिव सेना बना दे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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