शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना कांग्रेस के लिए रहेगा फायदेमंद
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद कर्नाटक में इस समय एक बड़ा राजनीतिक और पीढ़ीगत बदलाव हो रहा है। कांग्रेस पार्टी द्वारा हाल ही के राजनीतिक संकट को सफलतापूर्वक सुलझाने के बाद उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को उनका उत्तराधिकारी चुना गया है। नेतृत्व में यह बदलाव कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य में एक अहम मोड़ है। यह बढ़ती चुनौतियों के जवाब में पार्टी के आलाकमान द्वारा किए गए एक रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है। शिवकुमार जो एक छोटे से किसान परिवार में पले-बढ़े हैं, ने लगातार आठ विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस पार्टी के ‘संकटमोचक’ के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। शिवकुमार जून 2002 से एक राजनीतिक संकटमोचक के रूप में जाने जाने लगे। उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी सरकार गंभीर समस्याओं का सामना कर रही थी। पार्टी सदस्यों के बीच असंतोष बढ़ रहा था और लोगों को दलबदल की आशंका थी, जिससे मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के नेतृत्व वाली सरकार अस्थिर हो सकती थी।
डी.के. शिवकुमार के पास नाजुक गठबंधनों को संभालने और अहम विश्वास मतों तथा राज्यसभा चुनावों के दौरान पार्टी सदस्यों के बीच एकता बनाए रखने के लिए मोलभाव करने और नेटवर्क बनाने की ज़बरदस्त क्षमता है। अपने पास मौजूद भारी वित्तीय संसाधनों की मदद से उन्होंने पार्टी के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए लॉजिस्टिक्स, कानूनी जोखिमों और राजनीतिक बाधाओं को संभाला है। अक्सर उन्हें केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी और जांच का भी सामना करना पड़ा है। अब ‘किंगमेकर’ ने ‘राजा’ की भूमिका संभाल ली है।
महीनों की टालमटोल व शिवकुमार खेमे के दबाव के आगे झुकते हुए, कांग्रेस आलाकमान एक सौहार्दपूर्ण समझौते पर पहुंचा। पिछले अक्तूबर में शिवकुमार के समर्थकों ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए, जिसका आधार सिद्धारमैया के साथ हुई एक गुप्त सहमति थी। सिद्धारमैया ने 2023 में यह पद संभाला था। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि यह कार्यकाल का मध्य समय था, इसलिए पार्टी को इस समझौते का सम्मान करना चाहिए। इस मांग की वकालत करने के लिए अलग-अलग गुट दिल्ली में इकट्ठा हुए। आलाकमान ने दोनों नेताओं को एक साथ बुलाया और उन्हें इस मामले पर सार्वजनिक रूप से चर्चा न करने के लिए राज़ी कर लिया। शिवकुमार को चुनना एक मुश्किल फैसला था, क्योंकि उन्हें यह तय करना था कि क्या सिद्धारमैया को उनके कार्यकाल के दौरान पद पर बनाए रखा जाए या उनकी जगह किसी और को लाया जाए। कर्नाटक में नेतृत्व में इस बदलाव के तीन मुख्य कारण थे- सिद्धारमैया की उम्र (वे 80 साल के हैं), भाजपा की बढ़ती ताकत और 2023 में हुआ एक गुप्त समझौता।
शिवकुमार जिन्हें कांग्रेस पार्टी के ‘संकटमोचक’ के तौर पर जाना जाता है और जिन्होंने लगातार आठ विधानसभा चुनाव जीते हैं, दृढ़ता की मिसाल हैं। पार्टी के संकट प्रबंधक के तौर पर वह चुनौतियों का सामना करते हैं, विवादों को सुलझाते हैं और अलग-अलग गुटों के बीच समझौते करवाते हैं। राजनीतिक बातचीत में उनकी कुशलता उन्हें कर्नाटक की राजनीति में एक अहम हस्ती बनाती है, जिससे एक रणनीतिक नेता के तौर पर उनकी साख और मज़बूत होती है।
सद्धारमैया जो पुरानी दुनिया के आकर्षण, गरिमा और सामाजिक न्याय की मिसाल हैं, उन्होंने हाशिए पर पड़े समुदायों का बिना थके समर्थन किया है। इससे उनकी विरासत पर गर्व महसूस होता है और कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी की जड़ें और मज़बूत हुई हैं। सिद्धारमैया ने अपनी अप्रत्याशित राजनीतिक यात्रा पर विचार किया और पार्टी के भीतर गुटबाज़ी की समस्या को स्वीकार किया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद। अपनी राजनीतिक यात्रा पर विचार करते हुए सिद्धारमैया ने कहा, ‘मैं एक गांव से आता हूं, मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं एमएलए, मंत्री या मुख्यमंत्री बनूंगा।’
सिद्धारमैया की लोकप्रियता के इर्द-गिर्द सत्ता के नए केंद्रों का उभरना नए प्रशासन के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है, क्योंकि उनके वफादार लोग अपना प्रभाव बढ़ाना चाहेंगे, जिससे पार्टी के भीतर फूट पड़ने का खतरा है, जिसका असर शासन और स्थिरता पर पड़ सकता है। अपनी टिप्पणियों में शिवकुमार ने कहा कि अवसर ही नेताओं को गढ़ते हैं, और सिद्धारमैया को एक ऐसे प्रमुख उदाहरण के रूप में पेश किया, जिन्होंने चुनौतियों पर पार पाकर कर्नाटक की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्तियों में से एक का मुकाम हासिल किया है। सिद्धारमैया ने शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखा, जिसका समर्थन वरिष्ठ नेता परमेश्वर ने किया। जहां एक ओर विधायक दल ने ‘हाई कमान’ के फैसले को स्वीकार किया, वहीं पर्यवेक्षकों ने शिवकुमार के नाम की घोषणा की, जिसके परिणामस्वरूप वे कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए। सिद्धारमैया कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल रहना चाहते हैं। अगर उनके समर्थकों को लगता है कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है, तो वे सत्ता का एक वैकल्पिक केंद्र बना सकते हैं, जिससे शिवकुमार के प्रशासन के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है। क्योंकि सिद्धारमैया के वफादार लोग अहम फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।
सरकार और पार्टी दोनों को अपनी रणनीतियों में तालमेल बिठाने की ज़रूरत है। कर्नाटक के विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, जिसके बाद 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे। शिवकुमार को पार्टी और सरकार का मार्गदर्शन करना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे चुनावों के लिए पूरी तरह तैयार हैं। (संवाद)



