महाराजा रणजीत सिंह को प्रतीक बनाकर भाजपा क्या हासिल करना चाहती है ?

गरूर-ए-हिकमत-ओ-दानिश में झूमने वालो,
कुछ अहल-ए-दिल भी इसी ़खाक-दां में रहते हैं।
—कतील शिफाई 

(गरूर-ए-हिकमत-ओ-दानिश = अकल और जानकारी का अहंकार, ़खाक-दां = दुनिया, धरती)
राजनीति में कोई भी कदम या चाल बिना उद्देश्य से नहीं होती, परन्तु प्रत्येक चाल को समझना भी आसान नहीं होता। ़खैर, पंजाब भाजपा के नये अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के ताजपोशी समारोह में आश्चर्यजनक तौर पर महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीर की नुमाइश तथा वह तस्वीर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित सभी भाजपा नेताओं की तस्वीरों से कहीं बड़ी लगाना कई संकेतों और सवालों की ओर इशारा कर गया है। नि:संदेह भाजपा इस समय 2027 के चुनाव की तैयारियों में व्यस्त है, परन्तु इस तस्वीर के प्रतीक को इस्तेमाल करना एक आम राजनीतिक संकेत नहीं हो सकता, अपितु यह भाजपा की पंजाब के प्रति एक साहसी चाल की ओर इशारा करता है। इससे साफ प्रभाव मिलता है कि भाजपा तथा आरएसएस ने पंजाब तथा सिख समुदाय के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाने का फैसला बहुत कुछ सोच-विचार कर लिया है। 
इसमें सबसे पहले तथा स्पष्ट लक्ष्य सिखों में भाजपा के प्रति विरोध कम करना है और एक नई छवि बनाना है, क्योंकि अलग-अलग कारणों के बिना आरएसएस तथा भाजपा की हिन्दू राष्ट्र की भावना के कारण सिख समुदाय का बड़ा हिस्सा भाजपा को अपनी धार्मिक पहचान के लिए खतरा समझता है, जो विशेषकर किसान आन्दोलन तथा अकाली दल के भाजपा से अलग होने के बाद बहुत बढ़ा है। इससे अकाली दल बादल से भाजपा के समझौते के आसार भी कम होते दिखाई दे रहे हैं। वैसे भी चुनाव से 7-8 माह पहले पंजाब भाजपा की बागडोर एक जट्ट सिख नेता को सौंपना तथा महाराजा रणजीत सिंह जैसा सर्व-साझा राज देने का वायदा करना, यह प्रभाव देता है कि भाजपा पंजाब में सारे देश तथा पश्चिम बंगाल में अपनाई गई चुनावी रणनीति से अलग रणनीति पर काम करेगी। नि:संदेह एसआईआर तथा अन्य तकनीकी तैयारियां तो उसी तरह ही की जाएंगी, परन्तु भाजपा जिस प्रकार पूरे देश में हिन्दुओं को मुस्लिम अल्पसंख्यक से खतरे का भय दिखा कर एकजुट करती है, उसी प्रकार पंजाब में सिख अल्पसंख्यकों से हिन्दुओं को खतरा नहीं दिखाएगी, अपितु सह-अस्तित्व तथा हिन्दू-सिख एकता को उभारने तथा सभी जात-बिरादरियों को साथ लेकर चलने का यत्न करते नज़र आएगी। 
परन्तु भाजपा तथा आरएसएस सदा दीर्घकालिक रणनीति पर काम करते हैं। भाजपा का महाराजा रणजीत सिंह के राज की याद तथा गौरव को जगा कर सिखों में यह एहसास मज़बूत किया जाएगा कि सिखों की सल्तनत पर तो अब पाकिस्तान का कब्ज़ा है। इससे सिखों में पाकिस्तानी सरकार तथा सेना से मोह नहीं, अपितु नफरत की भावना को भी उभारा जा सकता है और एक नए पंजाब की दृष्टि भी उभारी जा सकती है। इसके पीछे भाजपा तथा आरएसएस की अखंड-भारत की भावना भी छिपी हुई प्रतीत होती है और यह तस्वीर अकस्मात रूप में ही पाकिस्तान को एक संदेश देती है कि भारतीय हिन्दू-सिख एक मज़बूत गठबंधन है। हालांकि अखंड भारत की भावना के बावजूद भाजपा कभी पाकिस्तान तथा कभी बांग्लादेश को क्रियात्मक रूप में भारत से इलहाक (मिलाने) के लिए तैयार नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकार तो देश में मुस्लिम आबादी तथा वोट भाजपा के लिए खतरनाक सीमा तक बढ़ जाएगी, परन्तु इस प्रकार की राजनीति सिखों में पाकिस्तानी क्षेत्रों के प्रति भावनात्मक मोह तथा दावे पैदा कर सकती है, जिससे सिखों के एक हिस्से में खालिस्तान के प्रति मोह का रुख बदला जा सकता है और यह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रवादी एजेंडे से सिख इतिहास को जोड़ने का एक यत्न भी प्रतीत होता है। चाहे यह बहुत लम्बे समय की सोच वाली रणनीति प्रतीत होती है, परन्तु याद रखना चाहिए कि आरएसएस ने भारत की सरकार पर कब्ज़ा करने के लिए 90 वर्ष का लम्बा संघर्ष किया है। इससे सिखों में यह एहसास भी पैदा किया जाएगा कि सिख इतिहास विदेशी मुस्लिम हमलावरों के खिलाफ लड़ाई का इतिहास है। 
उल्लेखनीय है कि आरएसएस लम्बा समय सिख धर्म को हिन्दू धर्म का हिस्सा मानता रहा है, परन्तु अब आरएसएस तथा भाजपा की रणनीति बदल रही प्रतीत होती है। वह सिख चेहरों तथा सिख प्रतीकों को आगे लाकर सिखों तथा पंजाबियों की संस्कृति को स्थानीय तौर पर उभार कर उनके मन में बैठा यह एहसास कि भाजपा का हिन्तुत्व सिखों को भी जैनियों तथा बोधियों की भांति अपने में समा लेगा, को खत्म करना चाहेगी। 
चाहे ये सभी कारण भाजपा तथा आरएसएस की लम्बे समय की राजनीति तथा रणनीति का हिस्सा हों, परन्तु तात्कालिक कारण तो 2027 के चुनाव ही हैं, क्योंकि भाजपा का लक्ष्य पंजाब में सरकार बनाने या कम से कम मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है। इसलिए जहां व्यापक स्तर पर दल-बदली, डेरों का समर्थन, एसआईआर, सिख समुदाय में जट्ट और गैर-जट्ट का विभाजन, सिख वोट के बिखराव के अतिरिक्त भाजपा साम-दाम-दंड-भेद का प्रत्येक तरीका इस्तेमाल करेगी। 
परन्तु फिर भी इस रणनीति का सफल होना इस बात पर निर्भर करेगा कि सिख मानसिकता इस रणनीति को भाजपा की सोच में एक बड़े विचारधारात्मक बदलाव की भांति महसूस करती है या इसे सिर्फ चुनाव राजनीति समझ कर नकार देती है। दूसरा भाजपा सिखों तथा पंजाब की केन्द्र से संबंधित लम्बे समय से लटक रही मांगों तथा शिकायतों का कोई समाधान चुनाव से पहले करती है या नहीं, इसका प्रभाव भी पंजाब की राणनीति तथा भाजपा के पक्ष या विरोध में बड़े स्तर पर प्रभावी होगा।
उ़फ ये सियासत कैसी कैसी, कैसी कैसी चालें हैं,
रामा रामा कहते कहते सोच में रावण रखते हैं।
—लाल फिरोज़पुरी
आरएसएस-भाजपा के नये सलाहकार
‘सरगोशियां’ हैं कि भाजपा तथा आरएसएस के पंजाब तथा सिखों बारे पुराने सलाहकार चाहे अभी भी भाजपा तथा सरकार में पदों पर विराजमान हैं, परन्तु भाजपा को यह एहसास हो गया है कि इन सलाहकारों की सलाह से भाजपा पंजाबियों तथा सिखों में अपनी पकड़ बनाने में लगभग विफल रही है। पता चला है कि भाजपा ने पंजाब तथा सिखों के बारे में अपने कुछ सलाहकार बदले हैं। ये सरगोशियां भी कमाल की हैं कि नए सलाहकार न तो अभी किसी सराकरी पद पर तैनात हैं और न ही भाजपा में शामिल हुए हैं। इस बारे में पूरा प्रयास करने के बावजूद भाजपा तथा आरएसएस के हमारी पहुंच वाले सूत्र इस बारे में कोई भी बात करने के लिए तैयार नहीं कि नए सलाहकार कौन हैं। इस बारे में बहुत रहस्य ही रखा जा रहा है और इस संबंधी संकेत तक नहीं किया जा रहा कि उनके नाम क्या हैं, परन्तु यह अवश्य कहा जा रहा है कि नए सलाहकारों की सलाह से भाजपा में शामिल कुछ ऐसे चेहरों का प्रभाव कम किया जा रहा है, जिन्हें सिख विरोधी माना जाता है। आगामी दिनों में यह स्थिति जल्दी ही साफ हो जाएगी। 
वक्त बदल जाए तो ़ख्वाब बदल जाते हैं,
दोस्त बदल जाते हैं, अहसास बदल जाते हैं। 
अकाली दल (पुनर्सुरजीत) तथा भाजपा का समझौता?
चाहे भाजपा के बहुत बड़े नेता यह घोषणा कर चुके हैं कि भाजपा पंजाब में सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी, परन्तु राजनीति में सम्भावनाएं बदलती रहती हैं। हालांकि कुछ लोग तो भाजपा तथा अकाली दल (बादल) और अकाली दल (पुनर्सुरजीत) दोनों से भाजपा के समझौते के आसार की बात करते हैं, परन्तु हमारे पास अकाली दल (बादल) से समझौते की बातचीत बारे कोई पक्की सूचना नहीं है, परन्तु पता चला है कि अकाली दल (पुनर्सुरजीत) के साथ भाजपा के समझौते की बात अवश्य चल रही है और यह बात चल भी काफी उच्च स्तर पर भाजपा हाईकमान के साथ चल रही है। एक संबंधित वरिष्ठ नेता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बातचीत चलती होने तथा काफी आगे बढ़ने की पुष्टि भी की है। पता चला है कि इस समझौते में भाजपा बड़े भाई की भूमिका निभाएगी। यह भी पता चला है कि अकाली दल (पुनर्सुरजीत) को कुछ अन्य छोटे अकाली गुटों को भी साथ लेने के लिए कहा गया है।

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