देश की सरकारों ने शिक्षा क्षेत्र में अधिक दिलचस्पी नहीं ली
देश में शिक्षा को लेकर हंगामे वाली स्थिति बनी हुई है। पढ़े लिखे बेरोज़गारों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। शिक्षा संस्थान कुव्यवस्था, भ्रष्टाचार और विद्यार्थियों के जीवन से खिलवाड़ करने का अड्डा बन चुके हैं। यदि निष्पक्ष जांच हो तो सच्चाई सामने आ सकती है।
शिक्षा मंत्रियों की उदासीनता
हकीकत है कि आज़ादी के बाद से जितने भी महानुभाव इस पद पर आसीन हुए, उनका शिक्षा प्रणाली बनाने और एक ऐसी नीति निर्धारण करने में न रुचि थी, न योग्यता जिससे भारत का भविष्य अर्थात् बच्चे और युवा जुड़ सकें। सबसे पहले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जिन्होंने 1947 से 1958 तक पढ़ाई लिखाई के लिए अंग्रेज़ों की मैकाले पद्धति और पारम्परिक इस्लामी शिक्षा को लागू रखने के अलावा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। वैसे उन्हें भारतीय शिक्षा का शिल्पकार कहा जाता है क्योंकि पंडित नेहरू के विशेष कृपा पात्र होने से उनके नेतृत्व में यूजीसी और वैज्ञानिक शिक्षा की नींव रखी गई, लेकिन देश को मज़बूत शिक्षा नीति की ज़रूरत है। देश ने विश्वस्तरीय उच्च शिक्षण संस्थान बनाए, परंतु प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को कोई महत्व नहीं मिला। शिक्षा का एक ऐसा ढांचा विकसित हुआ जिसमें कुछ संस्थानों को छोड़कर अधिकांश स्कूल औसत या कमज़ोर बने रहे। उनके बाद के एल. श्रीमाली, हुमायूं कबीर, एम. सी. छागला, फखरुद्दीन अली मुहम्मद 1967 तक रहे जिनकी डिग्रियां उनके व्यवसाय के अनुसार थीं, लेकिन वे शिक्षा में कोई सुधार न ला सके।
जर्मनी का मॉडल विद्यालय से ही विद्यार्थियों को उद्योगों से जोड़ देता है। दक्षिण कोरिया तकनीकी शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता देता है। चीन अपने औद्योगिक विकास के साथ शिक्षा का तालमेल बैठाता है। इसके विपरीत भारत आज तक बड़ी संख्या में डिग्रीधारियों का उत्पादन कर रहा है, कौशलयुक्त युवाओं का नहीं। हमें ध्यान आया कि देश में शिक्षा नीति की आवशयकता है तो 1968 में महान शिक्षाविद दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में पहली नीति बनी। इसे आधे-अधूरे मन से थोड़ा बहुत लागू किया गया, लेकिन महत्वपूर्ण सिफारिशों को कचरे में फेंक दिया। त्रिगुणा सेन और डॉक्टर वी. के. आर. वी. राव से लेकर नूरुल हसन, जैसे महानुभाव आए जिनकी कोई बात नहीं सुनी गई। शेष के पास स्नातक या उसके आसपास की डिग्रियां थीं, लेकिन उनके नाम कोई ऐसा कारनामा नहीं जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए किया हो।
शिक्षक सबसे कमज़ोर कड़ी
किसी भी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता उसके शिक्षकों से तय होती है। फिनलैंड में शिक्षक बनने के लिए सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों का चयन होता है। जापान में शिक्षक को सामाजिक सम्मान प्राप्त है। दक्षिण कोरिया में शिक्षक राष्ट्रीय विकास के भागीदार माने जाते हैं। भारत में आज भी हज़ारों पद रिक्त हैं। प्रशिक्षण की गुणवत्ता असमान है। अनेक शिक्षक प्रशासनिक कार्यों में उलझे रहते हैं। जब शिक्षक ही सशक्त नहीं होगा तो विद्यार्थी कैसे होगा? राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो 1986 में नई शिक्षा नीति सामने आई जिसमें कंप्यूटर शिक्षा पर ज़ोर दिया। अब तक की दोनों नीतियों में शिक्षक की कहीं कोई भूमिका नहीं थी। सोच थी कि उन्हें तो कहीं से भी नियुक्त किया जा सकता है। उसके लिए कोर्स बने लेकिन जब वे पढ़ने के बाद पढ़ाने गए तो पता चला कि विद्यार्थियों को साधारण अक्षर ज्ञान और गणित के जमा-घटा तक का ज्ञान नहीं है। वे कुछ बोलते तो प्रशासनिक अधिकारी यह कहकर चुप करा देते कि तुम्हें हमसे ज़्यादा ज्ञान है तो इसे अपने पास रखो। मतलब कि शिक्षा जगत नेताओं और अधिकारियों के लिए मोटी आमदनी का साधन बनता गया। पढ़ना-लिखना इतना महंगा हो गया कि अमीर लोगों की जेब में समा गया। यही नहीं एक कमरे के विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गए और घर के मामूली पढ़े-लिखे चांसलर हो गए। नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाना तो मामूली बात हो गई। सरकारें बदलती रहीं, परन्तु शिक्षा की स्थिति और खराब होती गई।
भाजपा सरकार ने तो कमल ही खिला दिया, बारहवीं पास स्मृति ईरानी को शिक्षा की बागडोर सौंप दी। धर्मेंद्र प्रधान तक पूरा हिसाब-किताब जोड़कर देख लीजिए कि क्या किसी भी दल की सरकार ने शिक्षा को गंभीरता से लिया, निष्कर्ष ‘ नहीं’ में निकलेगा। इसका कारण यह है कि इनमें से कोई इतिहासकार और कानून का जानकार होने का दावा भले ही करे, लेकिन शिक्षा प्रणाली या नीति बनाने में कोई रुचि न थी। यह काम विभिन्न आयोग और नौकरशाही के हाथ का खिलौना बनकर रह गए। उन्होंने जो कुछ इनके पास भेजा, इन्होंने अपनी घुंडी छाप दी। उदाहरण के लिए 1968 की पहली शिक्षा नीति का शिक्षा पर छह फीसदी खर्च का लक्ष्य आज तक अधर में लटका हुआ है। तीन भाषा फार्मूला विवादों का पिटारा और सबसे अधिक गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी के कारण हुई। शहरों में शिक्षा संस्थानों की स्थापना कर अमीरों को इसका हकदार बनाने का नतीजा हुआ कि गांव-देहात में घोर अशिक्षा और नगरों में अंग्रेज़ी में गिटपिट करने वाले देसी अंग्रेज़ पैदा होते गए जिनका लक्ष्य था कि किसी तरह अमरीका या किसी अन्य देश में जाकर नौकरी या व्यवसाय करें। भानुमति का कुनबा और जादू की छड़ी घूमते ही पूरे देश में शिक्षा क्रांति करने के लिए 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने घोषणाओं की झड़ी लगा दी, जिन्हें पूरा करना ईश्वर के अधिकार में तो हो सकता है लेकिन इंसान तो अगले सौ साल में भी नहीं कर सकता।
विद्यार्थियों के साथ खिलवाड़
शिक्षा कोई कारोबार नहीं है। असलीयत है कि शिक्षा मत्रियों की वास्तविकता से हमेशा दूरी बनी रही, उन्हें कभी इसका ध्यान ही नहीं आया कि यह विषय देश के युवाओं और पीढ़ियों तक को प्रभावित करता है। कुछ नया करने के चक्कर में और अपनी और पार्टी की महत्वाकांक्षा तथा जनता के बीच छवि बनाने के लिए जितने भी काम हो सकते थे, वे किए जो विद्यार्थियों के साथ खिलवाड़ सिद्ध हुए। भारत में दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा प्रणालियों में से एक है। विशाल उच्च शिक्षा नेटवर्क, वैश्विक उत्कृष्ट संस्थान और बड़ी युवा आबादी होने के बावजूद कोई ऐसा नहीं जो इसे विश्वस्तरीय शिक्षा महासागर बना सके। अनेक विद्वान हैं, लेकिन पैसा प्रधान होने से विद्वता को मुंह की खानी पड़ती है।



