सचेत होकर किया जाए ए.आई. का इस्तेमाल
बदलाव इस ब्रह्मांड का केन्द्र बिन्दु है। कागज़ के आविष्कार के साथ प्रिंटिंग के तरीके और साधन बदल गए—अर्थात पहले धातु, कपड़े या मिट्टी पर छपाई होती थीए, इसी तरह स्क्रीन के आने से दृश्य माध्यम और पेशकारी के तरीके भी बदल गए। ए.आई. (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) मशीनें या सॉफ्टवेयर की बुद्धि सूचना और तकनीक में एक अहम बदलाव है। विकास के इस चरण में अब कम्प्यूटर आधारित मशीनें इंसानों की तरह सोच पाएंगी या लगभग सोचने लगी हैं। ए.आई. (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) अब इंसानी जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। यह मनुष्य द्वारा मशीन सूझबूझ की एक अनोखी खोज है, जिसने इंसानी इतिहास को भी संदेह में डाल दिया है।
जब भी कोई नया और शॉर्टकट सिस्टम समाज में विकसित होता है तो उसके फायदों की वजह से लोग इसकी तारीफ करने लगते हैं, लेकिन जो दवा जितनी जल्दी रोग ठीक करती है, उसके दुष्प्रभाव भी उतने ज़्यादा होते हैं। पिछले 5-6 सालों में ए.आई. का बोलबाला बढ़ने से यह लोगों के बीच दिन-प्रतिदिन लोकप्रिय हुई है। ए.आई. से हर चीज़ को बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता है और इसकी कार्य-क्षमता भी बहुत अधिक हो सकती है।
मेडिकल क्षेत्र में ए.आई. बहुत अच्छा काम कर रहा है। ए.आई. के लाभ उठाते समय हमें इससे होने वाले नुकसान के बारे में भी सचेत रहना चाहिए। कम आबादी वाले देशों के लिए ए.आई. बहुत कारगर है, जहां काम करने वाले लोग कम हैं। लेकिन भारत जैसे 146 करोड़ की आबादी वाले देश में काम करने वालों की कोई कमी नहीं है। हमारे देश में बड़े पैमाने पर ए.आई. का इस्तेमाल करने से न सिर्फ लोग बेकार हो जाएंगे, बल्कि पढ़े-लिखे सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरियां भी खतरे में पड़ जाएंगी। ए.आई. के साथ विद्यार्थियो की मानसिता पर भी प्रभाव पड़ेगा। याद कीजिए, जब कंप्यूटर और कैलकुलेटर नहीं थे, तो छोटे बच्चों को भी मौखिक पहाड़े याद होते थे। अब तो बच्चे 2+2=4 भी कैलकुलेटर पर करते हैं।
अब बच्चे खाना तभी खाते हैं जब उन्हें साथ-साथ मोबाइल पर खेल दिखाए जाएं। माताएं अपने बच्चों को सुलाने के लिए लोरी तक मोबाइल पर सुनाती हैं। चैट जी.पी.टी. से संबंधित समाचार हर दिन सुनने को मिलती हैं और बच्चे इन तकनीकों से ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं। आज के बच्चे हर दिन ए.आई. से लैस तकनीक और एलेक्सा सीरीज़ से बात करते हैं। ए.आई. जहां बच्चों के लिए फायदेमंद है, वहीं उन पर विपरीत प्रभाव भी डाल सकती है। लोग सम्मानजनक हस्तियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करके उन्हें सोशल मीडिया पर अपलोड कर देते हैं। कई भोले-भाले लोग इसे सच मान लेते हैं। झूठी खबरें लोगों तक तेज़ी से पहुंचाई जाती हैं, जिससे नुकसान होने का डर हमेशा बना रहता है। ए.आई. का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे लोगों की निजता खत्म हो रही है। असामाजिक तत्व लोगों का डेटा हैक करके उनके बैंक खाते में से पैसे ट्रांसफर कर लेते हैं।
आजकल डिजिटल अरेस्ट नामक एक घातक तरीका बहुत प्रचलित हो गया है। कई पढ़े-लिखे लोग, सेवा-मुक्त अधिकारी और बड़े कारोबारी इसका शिकार होकर करोड़ों रुपये गंवा चुके हैं। असल में असामाजिक तत्व गलत तरीके बहुत जल्दी सीख जाते हैं। वे आपके किसी भी रिश्तेदार या बच्चे का मोबाइल नंबर हैक करके और उस नंबर से आपको फोन करके कहेंगे कि आपका बच्चा या रिश्तेदार किसी कथित अपराध में फंस गया है, यदि उसे बचाना चाहते हैं तो बताए गए खाते में इतने पैसे भेज दें, नहीं तो मामला दर्ज करके उसे जेल भेज दिया जाएगा। वे अक्सर बुजुर्गों को उनके रिश्तेदारों की आवाज़ से भ्रमित करके उनका बैंक खाता नम्बर पूछ लेते हैं और मिलीभगत से पैसे निकाल लेते हैं।
अब हम ए.आई. से दूर नहीं भाग सकते क्योंकि कृषि, शिक्षा, मेडिकल क्षेत्र में इसके अनेक लाभ हैं। हमें इनका फायदा अवश्य उठाना चाहिए, परन्तु इसका इस्तेमाल बहुत सचेत होकर करना चाहिए। असल में ए.आई. एक तकनीकी मशीनी सूझबूझ है, इंसानी समझ और मशीन सूझबूझ में बहुत अंतर होता है। अब गूगल ऐप को ही देख लीजिए जो ए.आई. का ही एक हिस्सा है और इसके पास जानकारी का विशाल भंडार है। जितनी तेज़ी से ए.आई. तकनीक फैल रही है और लोग इसे तेज़ी से सीख भी रहे हैं। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि ए.आई. बहुत आगे निकल जाए और हम बहुत पीछे रह जाएं। जब हम गूगल से कुछ अनुवाद करते हैं, तो कई बार उसका अर्थ कोई और होने के कारण नतीजे भी गलत निकलते हैं। हमें पूरी जानकारी लेने के बाद ही ए.आई. का इस्तेमाल करना चाहिए।
-मो : 81968-10007



