इन्द्रधनुषी रंगों वाला प्रसिद्ध नागालैंड
भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित नागालैंड के पूर्व में म्यांमार, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम में असम और दक्षिण में मणिपुर है। इस राज्य का क्षेत्र अधिकांशत: पहाड़ी है। नागालैंड की राजधानी कोहिमा और सबसे ऊंची पहाड़ी का नाम सरमती है। नागालैंड के बारे में अब तक पुस्तकों में पढ़ा था या फिर गणतंत्र दिवस परेड में शामिल नागा कलाकारों की मोहक प्रस्तुति देखी थी। सेना में शामिल नागा रेजिमेंट के जवानों की शौर्य की गाथाएं भी सुनी थी लेकिन जब नागरी लिपि परिषद् द्वारा आयोजित एक समारोह में नागालैंड जाने का अवसर मिला तो मन प्रफुल्लित था।
हालांकि कुछ मित्रों ने प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस पूर्वोत्तर राज्य की विशेषताओं के साथ वहां लंबे समय से जारी हिंसा का डर भी दिखाया था लेकिन वहां हमें कहीं भी किसी भी प्रकार के डर का कोई कारण ढूंढे नहीं मिला। हां, कुछ नागा मित्रों ने गर्मजोशी से स्वागत करते हुए कहा, ‘आप इंडिया से आये हो’ तो कुछ आशंका ज़रूर हुई थी लेकिन पांच दिनों में उनका व्यवहार कहीं भी पराया अथवा अलगाववादी नहीं लगा। हमें कोहिमा जाने से पहले इनर लाइन परमिट बनवाना पड़ा। यही व्यवस्था अरुणाचल प्रदेश में हम पिछले वर्ष देख चुके हैं। सीमावर्ती राज्यों में इस व्यवस्था का उद्देश्य बाहरी लोगों पर निगाह रखना है। कोहिमा को पूरब का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है। आश्चर्य है कि राजधानी होते हुए भी कोहिमा में कोई हवाई अड्डा नहीं है। दीमापुर ही इस राज्य का प्रवेश द्वार माना जाता है जो रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। दीमापुर से कोहिमा जाने वाली सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग कहलाती है लेकिन उसकी दशा इतनी खराब है कि यह तय करना मुश्किल होता है कि सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क। मुझे याद आ रहा था।
सबसे पहले चर्चा नागालैंड तथा मणिपुर के प्रवेशद्वार दीमापुर की। नागालैंड की व्यवसायिक राजधानी के रूप में जाने जाने वाले दीमापुर की संस्कृति मिली-जुली है। वजह यह है कि पहले असम राज्य में शामिल था। कभी प्राचीन कचारी साम्राज्य का अंग रहे दीमापुर के नामकरण के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी प्राप्त हुई। दीमापुर तीन शब्दों दीए मा और पुर से मिलकर बना है। कचारी भाषा के अनुसार दी का अर्थ है नदी, मा का अर्थ है महान और पुर का अर्थ होता है शहर। दीमापुर प्राकृतिक रूप से बहुत खूबसूरत होने के साथ एक ऐतिहासिक शहर भी है। यहां पर कचारी शासनकाल में बने मन्दिर, तालाब और किले देखे जा सकते हैं। इनमें राजपुखूरी, पदमपुखूरी, बामुन पुखूरी और जोरपुखूरी आदि प्रमुख हैं।
नागालैंड वन और वन्यजीवों से समृद्ध प्रदेश रहा है। यहां की पहाड़ियों में गैंडे, हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, कई तरह के बंदर, सांबर, भैंसे और जंगली सांड पाए जाते हैं। यहां साही, पेंगोलिन (शल्कधारी चींटीखोर), जंगली कुत्ते, लोमड़ी मुश्क बिलाव नेवले भी पाए जाते है। विशाल भारतीय धनेश (हार्नबिल) पक्षी को राज्य के राजकीय पक्षी होने का सम्मान प्राप्त है। इस पक्षी की दुम के लंबे परों को पारंपरिक वेशभूषा में इस्तेमाल के लिए संभालकर रखा जाता है। सिर पर रखी टोपी में पक्षी हार्नबिल के पंख लगाते हैं।
नागालैंड की प्रमुख जनजातियां है- अंगामी, आओ, चाखेसांग, चांग, खिआमनीउंगन, कुकी, कोन्याक, लोथा, फौम, पोचुरी, रेंग्मा, संगताम, सुमी, यिमसचुंगरू और ज़ेलिआंग आदि। विविधता वाले नागालैंड में सभी प्रमुख नागाओं की अपनी-अपनी बोलियां हैं। यहां एक बोली नहीं बोली जाती। इन बोलियों की कोई लिपि न होने के कारण इनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। कुछ लोग इन्हें रोमन अपनाने की सलाह दे रहे हैं लेकिन वहां के विद्वान भाषाविद् देवनागरी को अपनाने पर बल दे रहे हैं क्योंकि नागरी लिपि ही इनकी बोलियों के सौंदर्य और स्वरूप को सुरक्षित रख सकती है। इस दिशा में लगातार कार्य भी हो रहा है। मजेदार बात यह है कि छोटे-छोटे क्षेत्रों में बंटे रहने वाले विभिन्न नागा जनजातियों की भी विभिन्न बोलियां हैं। एक नागा जनजाति दूसरे जनजाति की बोली नहीं के बराबर बोलते या समझते हैं। अलग-अलग बोलियों को जनजातियों के नाम से ही जाना जाता है। एक-दूसरे के बीच संवाद कायम रखने के लिए मिश्रित बोली नागामिज का उपयोग सदियों से होता रहा है। जहां तक हिन्दी का सवाल है तो नागालैंड में बखूबी समझी और बोली जाती है क्योंकि कक्षा 8 तक हिंदी अनिवार्य है। उसके बाद हिंदी पढ़ना ऐच्छिक है। बढ़ते ईसाई प्रभाव के कारण आजकल अंग्रेजी वहां राजकाज की भाषा है।
नागा समाज में महिलाओं को अपेक्षाकृत ऊंचा और सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। वे खेतों में पुरुषों के ही समान शर्तों पर काम करती हैं तथा जनजातीय परिषदों में भी उनका अच्छा-ख़ासा प्रभाव है। नागा मित्रों के अनुसार नवम्बर के अंतिम सप्ताह से उत्सवी माहौल का नज़ारा दिखने लगा था और क्रिसमस के मद्देनज़र दिसम्बर आते-आते पूरा नागालैंड लाल रंग की रोशनियों में सरोवर हो गया। ईसाई बहुल नागाओं के साथ-साथ गैर नागा भी अपने घरों को सजाते हैं। नागा लोगों का खानपान हमसे काफी अलग है। मुझे बताया गया कि वे सर्वभक्षी अर्थात् कुछ भी खा लेते हैं।
इस प्रदेश के अनेक खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। खूबसूरत जैफू चोटी, जंगली फूलों से भरी पड़ी रमणीय जकाउ घाटी, दुनिया का सबसे बड़ा रोडोडेन्ड्रान का पेड़, आर्किड की सैकड़ों प्रजातियां चित्ताकर्षक हैं, तो कोहिमा में द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापानी सेना जिसमें आज़ाद हिंद सेना के सिपाही भी शामिल थे, से युद्ध के दौरान शहीद हुए अफसरों और जवानों की याद में कोहिमा में बना ‘वार सिमेटरी’ इतिहास का एक अविस्मरणिय अध्याय है। हैरिटेज विलेज में पारंपरिक नागा जीवन शैली को, स्टेट म्यूजियम में एक ही जगह देखा जा सकता है। जनजातियों की रंगीन जीवन शैली, उनका इतिहास, संस्कृति, शस्त्रा, पहनावा, रहन-सहन को एक ही छत के नीचे देखने की अनुभूति रोमांच पैदा करती है जिससे सिद्ध हुआ कि ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद नागाओं ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं छोड़ा। हर वर्ष एक से पांच दिसम्बर तक शिकार की वजह से लुप्तप्राय: हो चले हार्नबिल पक्षी के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से राजधानी कोहिमा से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर खूबसूरत पर्यटन स्थल फेसमा में आयोजित किया जाता है। (उर्वशी)





