बेमिसाल प्रतीकों के आधुनिक शायर थे डा. बशीर बद्र
भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 1972 में शिमला समझौता हुआ, जिसे करने के लिए पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो आये थे। उन्होंने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात करते हुए एक शेर पढ़ा ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे/जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।’ यह डा. बशीर बद्र का शेर है और एक देश के प्रमुख द्वारा कूटनीतिक वार्ता में इसे सुनाने से स्वत: ही मालूम हो जाता है कि इसके रचनाकार की ख्याति किसी सरहद तक सीमित न थी। निश्चितरूप से पद्श्री (1999) डा. बशीर बद्र, जिनके सभी काव्य संकलन- ‘ईकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’ व ‘आसमान’ विभिन्न सरकारी अकादमियों से पुरस्कृत हुए न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय शुहरत के मालिक थे बल्कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों तक में उनके अशआर (शेर का बहुवचन) दिलचस्पी के साथ पढ़े व सुने जाते थे। बीती 28 मई 2026 को लम्बी बीमारी के बाद 91 वर्ष की आयु में उनका दुनिया को अलविदा कहने से भारतीय साहित्य, विशेषकर उर्दू शायरी, के एक युग का अंत हो गया है। उनका जन्म सैय्यद मुहम्मद बशीर के रूप में 15 फरवरी 1935 को गांव बुखिया, निकट हंसवार, वर्तमान में ज़िला अम्बेडकर नगर में हुआ था।
इस लेख का उद्देश्य डा. बशीर बद्र की ज़िंदगी पर रोशनी डालना नहीं है, जिसके बारे में सभी जानते हैं कि उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.ए, पीएचडी की डिग्रियां प्राप्त कीं, इसी विश्वविद्यालय में लेक्चरार रहे, फिर 17 वर्ष तक मेरठ कॉलेज में प्रोफेसर और बाद में भोपाल बस गये, जहां उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली। इस लेख का मकसद उनके चर्चित अशआर जैसे- ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो/न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये।’ या ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी/यूं कोई बेव़फा नहीं होता।’ आदि को दोहराना भी नहीं है; क्योंकि यह तो सभी की ज़बानों पर हैं। यह लेख यह बताने के लिए भी नहीं है कि लबो-रुखसार के पेचो-खम में उलझी हुई परम्परागत उर्दू शायरी में आधुनिकता (जदीद) की जो नींव नासिर काज़मी ने रखी थी, उस पर बुलंद-ओ-बाला इमारत का निर्माण रंगों और खुशबू के शायर डा. बशीर बद्र ने किया और वह आम आदमी के रोजमर्रा के एहसास व अनुभवों की सशक्त आवाज़ बनकर उभरे, आपबीती को जगबीती बनाते हुए। मसलन, 1987 में जब वह विदेश की यात्रा पर थे, तो मेरठ के दंगों में उनके घर को फूंक दिया गया था और इस हादसे पर उन्होंने कहा- ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि डा. बशीर बद्र नासिर काज़मी से बहुत अधिक प्रभावित थे। मसलन, नासिर काज़मी का एक शेर है- ‘हमारे घर की दीवारों पे ‘नासिर’/उदासी बाल खोले सो रही है।’ और अब डा. बशीर बद्र का शेर सुनिये- ‘उदासी पतझड़ों की शाम ओढ़े रास्ता तकती/पहाड़ी पर हज़ारों साल की कोई इमारत सी।’ दरअसल, डॉ. बशीर बद्र को जो बात शायरों की भीड़ में एकदम अलग खड़ा कर देती है, वह है उनके द्वारा बेमिसाल प्रतीकों का इस्तेमाल करना, जो कहीं दूसरी जगह नहीं मिलते और यही बताना इस लेख का मकसद है। डा. बशीर बद्र के हाथों में ़गज़ल की रिवायत नये लबो-लहजे से दोचार हुई। उन्होंने अपनी ़गज़लों में नये प्रतीक प्रयोग किये, जो विचित्र या अजीबो गरीब नहीं हैं बल्कि जो हमारे आसपास के हैं और जाने पहचाने से हैं, इसलिए आम आदमी जल्दी व आसानी से जुड़ जाते हैं, लेकिन यह प्रतीक उनसे पहले किसी ने इस्तेमाल नहीं किये हैं।
हालांकि डा. बशीर बद्र की ़गज़लों में हुस्न-ओ-इश्क भी है, दर्शन भी है, समाजी व सियासी हालात भी हैं, लेकिन उनकी ़गज़लों की खूबी है उनके नायाब प्रतीक। इस संदर्भ में कुछ शेर सुनिये- ‘मुझे हादसों ने सजा-सजा के बुहत हसीन बना दिया/मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो महंदी से रचा हुआ।’ एक ़गज़ल के दो शेर इस तरह से हैं- ‘भरी दोपहर का खिला फूल है/पसीने में लड़की नहायी हुई;’ व ‘ख़ुशी हम गरीबों की जैसे मियां/मज़ारों पे चादर चढ़ायी हुई।’ इस शेर में गरीबी पर कितना गहरा व्यंग्य है, सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। डा. बशीर बद्र की शायरी में सौंदर्य वर्णन भी बहुत ही खूब है और यह करते हुए भी वह अलंकारों का अति प्रभावी प्रयोग करते हैं, जो उनकी शायरी को अधिक रोचक बना देते हैं। मसलन, प्रेमिका की आंखों की सुंदरता को वह इस तरह से बयान करते हैं- ‘उसकी आंखों को गौर से देखो/मंदिरों में चऱाग जलते हुए।’ अब देखिये कि प्रेमिका के चेहरे की तुलना वह चांद से किस तरह एकदम अलग अंदाज़ से करते हैं- ‘पहली बार नज़रों ने चांद बोलते देखा/हम जवाब क्या देते खो गये सवालों में।’ इसी ़गज़ल का एक अन्य शेर भी बहुत ख़ूब है- ‘मेरी आंख के तारे अब न देख पाओगे/रात के मुसाफिर खो गये उजालों में।’
डॉ. बशीर बद्र की शायरी में इन्द्रधनुष के धनक रंग हैं। अगर उनकी शायरी को एक वाक्य में बयान करने का साहस किया जाये तो हुस्न जब चुपचाप खड़ा हो जाता है वो मुजस्मा (मूर्ति) कहलाता है और जब हरकत व नृत्य करने लगता है तो डा. बशीर बद्र का शेर बन जाता है। ‘वो सबके सामने बाहों में आके खो जाना/फरिश्तों जैसी मासूमियत हवस की नहीं।’ या ‘आ मेरे सीने पर सर रख अपने कान से सुन पगली/मेरे भगवान बोल रहे हैं मन मंदिर की घंटी में।’ बहरहाल, संक्षेप में बात केवल इतनी है कि अब डा. बशीर बद्र के बाद ऐसा शेर कौन कहेगा- ‘खुदा ऐसे एहसास का नाम है/रहे सामने और दिखायी न दे।’
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



