सम्मानित हुए सिर्फ शॉल से

जिसको सम्मान में मिला शॉल उसे लेकर अभी तक किसी ने न तो किया चूं और नहीं किया किसी ने बवाल। बल्कि इतना ज़रूर कहते हमारे यहां के बच्चे वाकई है कमाल। हमेशा मचाते रहते हैं धमाल। कार्य बेमिसाल।
आज कुछ लोगों को सम्मानित होते देख मुझे भी गर्व महसूस हो रहा था। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने दिल खोलकर चंदा दिए थे और अच्छा उगाही भी किए थे। आज उन्हीं का वाहवाही हो रहा था।
लेकिन हाय रे किस्मत वैसे लोगों का बदन कब तक शाल विहीन रहेगा। बदन पर कब साल चढ़ेगा। उनकी प्रतीक्षा की गाड़ी कब आगे बढ़ेगी। आज जिनको शाल मिला है वह बदन पर झूलाते हुए या यूं कहें इठलाते हुए चल रहे हैं। जिनको नहीं मिला है उनको उपेक्षा से देखकर मुंह बनाते फुलकर कूप्पा होकर सामने से निकलते हुए दिखाई दिए उन लोगों से जो अपमानित महसूस करे थे उनसे बात तक नहीं किए। 
पुरस्कार में सम्मानित शाल से वंचित एक पूरी मंडली एक पूरी जमात थी। जिनको सौगात के तौर पर उनके औकात को धराशाई होते देख रहे थे। यह सब देखकर कोई-कोई धांसू वक्तव्य का गोला उगल रहे थे तो किसी-किसी के आंखों से आंसू निकल रहे थे। 
मैं भी कभी इस तरह के पुनीत कार्यों में बढ़कर हिंसा लेता था। उस समय हम लोगों के साथ कुछ ऐसा वाक्या हुआ कि हम सब भीतर से आहत महसूस करने लगे थे। बस्ती में चाहे किसी तरह का कार्यक्रम हो उसमें शरीक होते थे। जब चंदा काटने की बारी आती थी हम लोग कितना भी इमानदारी से कार्य करते फिर भी हम सब उन लोगों के नज़रों में काफी खटकते थे। वे लोग हमेशा ब्लेम लगाते की तुम लोग चंदा का पैसा खाते पकाते हो आधे से अधिक दबाते हो आपस में बांटते हो। हम लोग के साथ हमेशा से यही होता, फिर भी हम लोग आप्पा नहीं खोता। 
तब हम सबने एक प्लान बनाया है कि क्यों न झुठ मुठ का बदनाम तो हो ही गए जबकि एक पैसा भी गड़बड़ नहीं किया।
तब हम लोगों ने अपने क्रेडिट पर एक कपड़े के दुकान से पेंट शर्ट बनवाकर उसको पहनकर ही उनके घर जाकर चंदा काटना शुरू किए। लो बेटा अब आपके ही पैसा से पैंट शर्ट पहनकर चंदा काट रहे हैं। लेकिन यह सिलसिला लंबा नहीं चला हम सब नौकरी पाकर अपने-अपने कार्यों में लग गए। 
एक लंबे अर्से के बाद फिर से यह सिलसिला चल निकला। तब और आज में काफी अंतर आ गया है। सब कुछ बदल गया है।
अब प्रतिष्ठा के लिए बड़े बुजुर्गों को शाल देकर सम्मानित करने की परंपरा बन गई है। एक लंबे अर्से के बाद पहली बार अपने बस्ती के कार्यक्रम में शरीक होने का मौका मिला। और नये परिवेश का यह व्यवहार बढ़िया लगा। मैं बारीकी से वाच कर रहा था कुछ लोग शाल से वंचित थे वे अपने को काफी अपमानित महसूस कर रहे थे।
इसलिए कि चंदा देने का लंबी पारी खेल चुके थे और उनको शॉल ओढ़ने का मौका अभी तक नहीं मिला था। 
देखें उन वंचितों को शॉल ओढ़ने का कब मौका मिलता है। लेकिन पूजा कमेटी मेंबरों का कहना है कि हम लोग जो छुट जाते हैं उनको विशेष कार्यक्रम आयोजित करके छुटे हुए जो अपने को अपमानित महसूस करते रहते हैं उनको शॉल ओढ़ाकर सम्मानित करने का कार्यक्रम चलाकर कमिटी गौरवान्वित होती है।
भूल वश जो छूट जाता है उसको अगले साल पहले उन लोगों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित करते हैं। जब मैं उन सबसे सम्पर्क साधा तो वाकई वे लोग भी अब अपमानित के जगह सम्मानित महसूस कर रहे थे।
-मो. 8329680650

#सम्मानित हुए सिर्फ शॉल से