‘आ लौट के आ जा मेरे मीत’ के गीतकार भरत व्यास
‘आलौट के आजा मेरे मीत’ गाना आपने अवश्य सुना होगा। इसे सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमिका अपने प्रेमी की जुदाई में बहुत दुखी है, तड़प रही है और उसे वापस बुला रही है। फिल्म ‘रानी रूपमती’ में सिचुएशन भी कुछ ऐसी ही थी। लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि गीतकार भरत व्यास ने यह गीत प्रेमी-प्रेमिका के विरह के तौर पर नहीं लिखा था बल्कि उस समय जो उनकी दुखद पारिवारिक स्थिति थी, उससे उमड़ी भावनाओं के चलते यह गीत लिखा गया था। भरत व्यास का एक अन्य कालजयी गीत भी उनकी इस दर्दभरी मन:स्थिति की देन है। इन दोनों गीतों की रचना की पृष्ठभूमि को सुनकर जहां पाठकों की आंखों से आंसूं छलक सकते हैं, वहीं जब वह इन गीतों को दोबारा सुनेंगे, तो उन्हें इनके बोलों में एक पिता के छुपे दर्द का भी एहसास होगा। म्युज़िकल हिट फिल्म ‘जन्म जन्म’ 1957 में आयी थी। इसका एक गाना ‘ज़रा सामने तो आ ओ छलिये’ आज तक सुना व पसंद किया जाता है; क्योंकि इसके सच्चे बोल दिल की गहराइयों तक उतर जाते हैं। लेकिन यह बात कम लोग जानते हैं कि इसमें छुपी वेदना एक पिता की संवेदना से आयी थी।
दरअसल, हुआ यह था कि भरत व्यास का बेटा किसी बात पर उनसे रूठकर कहीं चला गया था। बेटे का घर से चला जाना निश्चितरूप से माता-पिता के लिए बहुत दु:ख की बात होती है। चूंकि भरत व्यास कवि भी थे, इसलिए संवेदनशील होने के नाते उनके दु:ख की कोई सीमा नहीं थी, विशेषकर इसलिए भी कि श्याम सुंदर दास उनका बहुत लाडला बेटा था। श्याम पर छोटी-छोटी बातों का बहुत गहरा असर हो जाता था। एक दिन किसी बात पर भरत व्यास ने श्याम को टोक दिया। वह नाराज़ होकर घर से चला गया। भरत व्यास ने बेटे की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने विज्ञापन दिये, जगह-जगह पोस्टर लगवाये, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, दरगाह आदि माथा टेका, प्रार्थनाएं करायीं। लेकिन बेटा नहीं मिला। भरत व्यास बेटे की जुदाई में तड़प रहे थे। बेटे के जाने का गम उन्हें खाये जा रहा था। अपराधबोध के कारण वह डिप्रेशन में चले गये। उनका किसी काम में मन नहीं लगता था। उन्होंने गीत लिखने भी बंद कर दिये थे।
बेटे की तलाश जारी थी। हर कोशिश की जा रही थी। भरत व्यास गुमसुम रहने लगे और चिड़चिड़े भी हो गये थे। एक दिन एक निर्माता ने उनसे गीत लिखने के लिए कहा। उन्होंने गुस्से में स्पष्ट न कह दी। उनके काम न करने से घर में आर्थिक संकट भी बढ़ता जा रहा था। भरत व्यास की पत्नी ने निर्माता से कहा कि वह उन्हें गीत लिखने के लिए मनायेंगी। पत्नी ने भरत व्यास को समझाया कि वह कोई ऐसा गीत लिखें जिसे सुनकर श्याम वापस आ जाये। वह राज़ी हो गये और अपने बेटे को एक तरह से संबोधित करते हुए उन्होंने ‘ज़रा सामने तो आ ओ छलिये’ गीत लिखा। गाने को मुहम्मद रफी व लता मंगेशकर ने गाया। श्याम नहीं लौटा। इसके बावजूद भरत व्यास को लगा कि वह अपने गीतों के माध्यम से अपने दिल के दर्द को अपने बेटे तक पहुंचा सकते हैं। इसलिए अपने बेटे को याद करते हुए ही उन्होंने ‘रानी रूपमती’ के लिए यह गाना लिखा ‘आ लौट के आजा मेरे मीत’। जब आप इस गाने के बोलों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे तो आप कलेजा चीरने वाले दर्द को एकदम से महसूस कर लेंगे। यह गाना आज तक पसंद किया जाता है। अच्छी बात यह रही कि इस गाने के बाद श्याम लौट आया। पिता का दर्द कम हुआ।
भरत व्यास का जन्म 6 जनवरी 1918 को बीकानेर रियासत में हुआ था, जो इस समय राजस्थान में है। उनके छोटे भाई बृज मोहन व्यास (1920-2013) एक्टर थे। भरत व्यास ने कलकत्ता से बी. कॉम की और फिर बॉम्बे में रहने लगे ताकि फिल्मों में गीत लिखने का अवसर मिल जाये। ‘ए मालिक तेरे बंदे हम’ (दो आंखें बारह हाथ) और ‘ये कौन चित्रकार है’ जैसे भक्ति गीत लिखने वाले भरत व्यास की बतौर गीतकार पहली फिल्म ‘दुहाई’ (1943) थी। उन्होंने कुछ फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार भी बतौर अभिनेता अदा किये, लेकिन उनकी एक्टिंग की दुकान कुछ खास चल न सकी। भरत व्यास को निर्देशन का भी शौक था और उन्होंने 1949 में फिल्म ‘रंगीला राजस्थान’ का निर्देशन किया, जिसके गीत भी उन्होंने लिखे और तीन गीतों का संगीत भी दिया। फिल्म फ्लॉप रही और उन्हें आगे निर्देशन का अवसर न मिला। हालांकि भरत व्यास अधिकतर धार्मिक व ऐतिहासिक फिल्मों में ही गीत लिखते थे, जिन्हें उस ज़माने में बी ग्रेड की फिल्में माना जाता था, लेकिन उनके कलम पर मां सरस्वती का आशीर्वाद था, इसलिए उनके दर्जनों गीत, जो उन्होंने 50 व 60 के दशकों में लिखे थे, आज भी बहुत पसंद किये जाते हैं। कुछ का ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं, मिसाल के तौर पर कुछ अन्य गीतों को याद दिलाना भी आवश्यक है- दिल का खिलौना हाय टूट गया (गूंज उठी शहनाई), सारंगा तेरी याद में (सारंगा), तू छुपी है कहां (नवरंग), ज्योत से ज्योत जलाते रहो (संत ज्ञानेश्वर) आदि। भरत व्यास का निधन 4 जुलाई 1982 को मुंबई में हुआ।
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