भरोसे का हिसाब

सिंडिकेट बैंक की बेगमपेट शाखा में उस सोमवार को सुबह से ही भीड़ थी। मार्च का आखिरी पड़ाव और हर कोई किसी ज़रूरी काम के बोझ तले दबा हुआ था। ग्यारह बजते-बजते काउंटर के बाहर लाइनें सांप की तरह लहरा रही थीं। कहीं बुजुर्ग पासबुक अपडेट करवाने आए थे, कहीं लोन की किस्त भरने आई महिलाएं थकी-सी खड़ी थीं, तो कहीं व्यवसाई घड़ी देख-देखकर बेचैन हो रहे थे। हवा में कागजों की सरसराहट और कैश काउंटर के मशीन की आवाज सभी मिलकर एक अजीब सी लय बना रहे थे।
अजय कुमार तीन साल से इस शाखा में काम कर रहे थे। उम्र कोई तीस के आसपास, लेकिन आंखों में एक परिपक्वता थी जो अनुभव से ही आती है। उस दिन वह डिमांड ड्राफ्ट काउंटर पर था। सभी अर्जेन्ट ड्राफ्ट को तैयार करने की डेडलाइन दोपहर बारह बजे की थी। उँगलियां की बोर्ड पर चल रही थीं, नजर स्क्रीन पर टिकी हुई थी।
तभी एक भारी आवाज़ ने उस लय को तोड़ा। एक अधेड़ सज्जन, सफारी सूट पहने, लाइन तोड़कर सीधे उसके पास आए। हाथ में एक चेक था।
‘ये क्लियर कर दो, जल्दी है।’
अजय ने विनम्रता से कहा, ‘सर, लाइन में आ जाइए, बस पांच मिनट लगेंगे।’
सज्जन की भौंहें तन गईं। ‘लाइन? तुम्हें पता है मैं कौन हूँ? मंत्री जी का रिश्तेदार हूँ। अभी फोन करवाऊं?’
भीड़ में सुगबुगाहट हुई। अजय ने बिना विचलित हुए मुस्कुराते हुए कहा, ‘सर, अगर मैनेजर साहब ने कहा होता तो ज़रूर कर देता। बस एक बार उनसे पर्ची पर साइन करवा लाइए, ताकि लाइन में खड़े इन बुजुर्गों को मैं जवाब दे सकूं कि आपका काम पहले क्यों ज़रूरी है।’
मंत्री जी के नाम गुब्बारा फुस्स हो गया। सज्जन बुदबुदाते हुए लाइन के पीछे चले गए।
अजय वापस ड्राफ्ट बनाने में जुट गया। तभी उसके काउंटर के सामने एक और आकृति आकर रुकी। सफेद शर्ट-पैंट, गले में सोने की चेन, कलाई पर विदेशी घड़ी थी।
‘बैलेंस चेक कर दो।’
न ‘प्लीज’, न ‘भाई साहब’। सीधा आदेश।
अजय ने स्क्रीन से नज़र न हटाते हुए पूछा, ‘जी, आपका अकाउंट नंबर?’
‘याद नहीं है। मोबाइल नंबर से देख लो।’
अजय ने चश्मा ठीक किया। ‘सर, सुरक्षा के लिए अकाउंट नंबर ज़रूरी है। अगर मैं मोबाइल नंबर से किसी का भी डेटा खोलने लगूँ, तो आपकी गोपनीयता भी खतरे में पड़ जाएगी। क्या आप चाहेंगे कि आपका बैलेंस कोई और जान ले?’
सज्जन के पास तर्क नहीं था, बस अहंकार था। उन्होंने जैकेट की कॉलर ठीक की और मैनेजर के केबिन की ओर कदम बढ़ा दिए। चाल में वह निश्चिंतता थी जो तब होती है जब कोई जानता हो कि जीत उसकी जेब में पहले से रखी है।
केबिन का दरवाजा बंद हुआ। अजय काम में लग गया। लेकिन थोड़ी देर बाद भीतर से आवाजें आईं जो आधे हॉल में सुनाई दे रही थीं।
‘अरे, रेड्डी साहब! आप यहां? बस एक फोन कर देते, मैं खुद आ जाता!’
अजय के हाथ एक पल के लिए रुके। फिर वह फिर काम में डूब गया।
थोड़ी देर बाद इंटरकॉम बजा।
‘अजय, एक अकाउंट नंबर नोट करो और रेड्डी साहब को पिछले छह महीने का स्टेटमेंट निकाल दो।’ अजय ने नंबर डाला। स्क्रीन पर खाताधारक का नाम था-श्रीमती रत्ना रेड्डी। तो यह रेड्डी साहब की पत्नी का खाता है?
उसने फोन उठाया। ‘सर, यह खाता रत्ना मैडम के नाम पर है। स्टेटमेंट के लिए उनकी साइन की हुई एप्लीकेशन लगेगी।
फोन पर झुंझलाहट आई। ‘अरे यार अजय! रेड्डी साहब सामने बैठे हैं। ये घर के आदमी हैं, पति हैं उनके। दे दो स्टेटमेंट, ज्यादा टाइम मत लगाओ।’
अजय ने गहरी सांस ली। यही वह लम्हा होता है जब कोई क्लर्क तय करता है कि वह सिर्फ नौकरी कर रहा है या जिम्मेदारी निभा रहा है। उसे पिछले महीने की वह घटना याद आ गई।
एक महिला आई थी सादी साड़ी में और उनके हाथ में डायरी थी। उसने शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसके खाते का पूरा स्टेटमेंट उसके परिवार के एक सदस्य को बिना अनुमति दे दिया गया था। वह पैसे घरेलू हिंसा से बचने के लिए धीरे-धीरे जमा कर रही थी। उन पैसों का भेद खुल जाने से उसकी मेहनत मिट्टी में मिल गई थी। शाखा को लीगल नोटिस आया था। लेकिन उस नोटिस से भी ज्यादा अजय को याद था उस महिला की आंखों में वह बेबसी जो तब होती है जब कोई भरोसा टूटता है।
उसने शांत स्वर में कहा, ‘सर, मैं समझता हूँ, लेकिन बिना खाताधारक की लिखित अनुमति के मैं यह स्टेटमेंट नहीं दे सकता। पिछले महीने ही हमारे शाखा में एक ऐसी घटना हुई थी। बैंक को लीगल नोटिस भी आया था। अगर रत्ना मैडम भी शिकायत कर दे तो? आप खुद सोचिए।’
फोन पर सन्नाटा छा गया। शायद मैनेजर साहब को वह नोटिस याद आ गया। उन्हें एहसास हुआ कि पहचान और नियम दो अलग चीजें हैं और जब दोनों में से एक को चुनना हो, तो नियम ही बड़ा होता है। हमेशा ही। (क्रमश:)

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