फिर सजेगी संस्कृति, संगीत और रंगों की महफिल

जून की तपती गर्मी जब उत्तर भारत के मैदानी इलाके को झुलसाने लगती है, तब हिमालय की गोद में बसा शिमला एक बार फिर रंगों, संगीत और लोक संस्कृति के उत्सवी खुमार में डूब जाता है। 8 से 12 जून 2026 तक आयोजित होने वाला इंटरनेशनल शिमला समर फेस्टिवल इस बार केवल एक पर्यटन आयोजन नहीं बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान और लोक जीवन का एक बड़ा उत्सव बनकर सामने आ रहा है। शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान और माल रोड पर होने वाला यह पांच दिनों का सांस्कृतिक महोत्सव देशभर के पर्यटकों, कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों को आकर्षित करेगा। 1960 में शुरु हुआ यह उत्सव हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय संस्कृति को मंच देने के उद्देश्य से की गई थी।
समय के साथ यह आयोजन इतना लोकप्रिय हो गया कि आज इसे उत्तर भारत के प्रमुख ग्रीष्मकालीन सांस्कृतिक महोत्सव में शामिल किया जाता है। इस साल का यह आयोजन कई दृष्टियों से खास और अलग है। प्रशासन के मुताबिक पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में लोकनृत्य, संगीत प्रस्तुतियां, कला प्रदर्शनियां, फूल प्रदर्शनी, महिला फूड फेस्टिवल, पारंपरिक पहाड़ी फैशन शो और विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक झलकियां देखने को मिलेंगी। इसके साथ ही पहली बार ‘राइड ऑफ सेवन हिल्स’ नामक हेलिकॉफ्टर जॉय राइड भी शामिल की जा रही है, जिसके जरिये पर्यटक शिमला की सात पहाड़ियों का हवाई दृश्य देख सकेंगे। शिमला समर फेस्टिवल की सबसे बड़ी पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता है। यहां केवल हिमाचली लोककला ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों की लोक परंपराएं भी एक मंच पर दिखायी देती हैं। इस बार उत्तराखंड का चोलिया नृत्य, जम्मू कश्मीर का गोजरी नृत्य, राजस्थान का भवई नृत्य, हरियाणा का घूमर नृत्य और तिब्बती सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को भी शामिल किया गया है।
इससे यह आयोजन मिनी इंडिया का रूप लेता दिखायी देता है। हिमाचल की प्रसिद्ध महानाटी और पारंपरिक नाटी नृत्य इस उत्सव का मुख्य आकर्षण माने जाते हैं। नाटी केवल एक लोकनृत्य नहीं बल्कि पहाड़ी समाज की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति है, जब सैकड़ों कलाकार एक साथ पारम्परिक वेशभूषा में नृत्य करते हैं, तो पूरा रिज मैदान जीवंत लोकचित्र में बदल जाता है। यही दृश्य हर वर्ष हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है। संगीत प्रेमियों के लिए यह महोत्सव खास रहने वाला है। आयोजकों के अनुसार लोकप्रिय गायकों व लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां हर शाम आयोजित की जाएंगी। इसके अलावा युवा कलाकारों को भी मंच दिया जायेगा। यह पहल स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में मदद करती है। ये उत्सव केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है। होटल, टैक्सी, रेस्त्रां, हस्तशिल्प व्यवसाय और स्थानीय बाजारों में पर्यटकों की संख्या बढ़ने से आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। शिमला का प्रसिद्ध लक्कड़ बाजार, हस्तनिर्मित लकड़ी के उत्पादों और स्थानीय शॉलों के लिए जाना जाता है, जहां इस दौरान विशेष भीड़ दिखाई देती है। फूड फेस्टिवल भी इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पर पर्यटकों को पारंपरिक हिमाचली व्यंजन जैसे मदरा, बबरू और धाम का स्वाद लेने का अवसर मिलता है।
आज जब भारत में क्षेत्रीय व्यंजनों के प्रति रुचि बढ़ रही है, तब ऐसे आयोजन स्थानीय खानपान संस्कृति को नई पहचान दे रहे हैं। फूल प्रदर्शनी और कला उत्सव भी इस बार आकर्षण का केंद्र रहेंगे। दुर्लभ पहाड़ी फूलों की अनेक प्रजातियों और स्थानीय कलाकारों की कृतियों को देखने के लिए यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस तरह यह आयोजन प्रकृति, कला और संस्कृति को एक साथ जोड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिमला समर फेस्टिवल केवल एक पर्यटन कार्यक्रम नहीं है बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। तेजी से बदलती जीवनशैली और डिजिटल मनोरंजन के दौर में ऐसे आयोजन स्थानीय परंपराओं को जीवित रखने का काम करते हैं। युवा पीढ़ी यहां लोकनृत्य, लोकसंगीत और क्षेत्रीय कलाओं से परिचित होते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत आगे बढ़ती है। दरअसल शिमला का रिज मैदान स्वयं इस उत्सव की आत्मा है। ब्रिटिश काल से यह जगह सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रही है। यह ऐतिहासिक स्थल आज भी शहर की सांस्कृतिक पहचान बना हुआ है, जब शाम ढलते ही रोशनी से जगमगाता रिज, लोकसंगीत की धुनों से गूंजता है तो शिमला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं बल्कि जीवंत संस्कृति का उत्सव बन जाता है। जून 2026 का शिमला समर फेस्टिवल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है, जो आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी संजोये रखना चाहता है। हिमालय की ठंडी हवाओं के बीच लोकनृत्य, संगीत, कला और परम्परा का यह संगम एक बार फिर साबित करेगा कि संस्कृति केवल इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की सबसे बड़ी ताकत है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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