स्वंय ही करो उपाय


साठ वर्ष तो हो ही गए होंगे। अपने गांव के स्कूल में पढ़ते समय प्राय: मुझे पहाड़े भूल जाया करते थे। यह नहीं कि मुझे स्मरण नहीं होने थे। मगर न जाने क्यों कक्षा में सुनाते समय एकदम से भूल जाता था। हो सकता था कि मास्टर जी के घूर कर देखने के कारण भूल जाता होऊं। इसलिए मैं प्राय: सहमा-सहमा सा रहता था।
उन दिनों मेरे माता जी खाने-पीने की वस्तुओं को घर में छिक्के पर रख दिया करते थे। एक दिन उस छिक्के पर रखे खाद्य पदार्थ में चोंच मारने के पश्चात एक चिड़िया मेरे सिर पर आकर बैठ गई। मैं तो घबरा गया था। मैंने तुरंत अपनी माता जी को बताया तो वे कहने लगी—यह तो अपशकुन होता है... प्रभु कृपा करे... तुम्हारे ऊपर तो कोई मुसीबत आने वाली है।’
माता जी बिना देर किए मुझे पंडित जी के पास ले गये तथा उन्हें सारी घटना बतला दी। पंडित जी ने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़ कर ध्यान से देखा। एक दो-बार उल्टा-सीधा भी किया। तब अत्यंत गम्भीर स्वर में कहा— बहन जी, इसके ग्रह तो बहुत बुरे हैं। शीघ्र ही कोई मुसीबत आ सकती है... और फिर इसके हाथ में तो विद्या की भी रेखा नहीं है। इसलिए बहन जी, अतिशीघ्र उपाय करवाना पड़ेगा। अगर शीघ्र उपाय न करवाया तो पढ़ाई का तो पहले ही भट्ठा बैठा हुआ है और भी क्षति हो सकती है। 
मेरे माता जी के पूछने पर उसने उपाय के लिए आवश्यक वस्तुएं तथा दक्षिणा (नकद राशि) के बारे में बतला दिया। माता जी परेशान से मेरे साथ घर लौट आए। पंडित जी ने उपाय के लिए जो खर्च बतलाया था, वह हमारे लिए सम्भव न था।  एक दिन मैंने अपने विज्ञान के अध्यापक को पंडित जी से हुई बातचीत के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे डांटते हुए कहा था —‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया? यूं ही बेकार के चक्करों में फंसने लगे हो।’ कुछ पल बाद उन्होंने मुझे प्यार से समझाते हुए कहा था ‘बेटा तुम जो भी स्मरण करते हो उसे बार-बार दोहराते रहो। सलेट पर लिख-लिख कर अभ्यास किया कर।’
... और तब मैंने उनके निर्देशानुसार पढ़ना शुरू कर दिया था। सम्भवत: बार-बार सलेट पर लिख-लिख कर अभ्यास करने से मुझे स्कूल में पढ़ाया हुआ अब स्मरण होने लगा था।
यद्यपि मैंने पंडित जी से उपाय करवाने से मना कर दिया था लेकिन फिर भी मेरे माता जी चोरी-छुपे पंडित जी को एक पंसेरी दाने तथा गुड़ की भेली दे आई थी।
मैं अपनी मेहनत से पढ़ता रहा और एक के बाद एक कक्षा उत्तीर्ण करते हुए जब शिक्षा-क्षेत्र की सबसे बड़ी उपाधि पी.एच.डी. अर्जित करके डाक्टर बन गया था तो मैं मानो अपने आप पर नियंत्रण न रख सका। वर्षों से मेरे सीने में नश्तर की भांति कुछ चुभा रहता था... और अब समय आ गया था कि मैं भी कुछ बोल कर अपने मन का गुबार निकाल सकूं। ...और मैं अपने गांव पंडित जी के पास जा पहुंचा तथा बिना कोई भूमिका बांधे कहा,‘तू तो कहता था मेरे हाथ में पढ़ाई की रेखा नहीं, मगर मैं तो डाक्टर बन गया हूं।’ पर उसने रत्ती भर भी शार्मिंदा होने की अपेक्षा बड़े रौब से कहा- ‘ओ भाई, यह रेखाएं तो बदलती रहती हैं।’ काश! वह यह कहता कि परिश्रम से हाथ की रेखाएं तोक्या, व्यक्ति जो चाहे बदल सकता है।’ समय में परिवर्तन आया और मैं विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक लग गया। .... और एक दिन वही पंडित अपने पोते को साथ लेकर मेरे पास विश्वविद्यालय में चला आया कि मैं उसके पोते की वहां नौकरी लगवा दूं। पंडित जी की आयु को देखते हुए मैंने और तो कुछ न कहा मगर इतना मेरी जुबान से अवश्य निकल पड़ा था ‘आप स्वयं ही कोई उपाय कर लेना था.. और फिर उपाय करने का आपका कौन-सा खर्च आना था।’ वह तो जैसे तिलमिला उठा था। मगर उसने रुआंसा होकर मात्र इतना ही कहा था ‘ओये, क्यों खिल्ली उड़ा रहा है, बूढ़े आदमी की। मुझ पर रहम कर... और लगवा दे इस आवारा की कहीं नौकरी। तेरी कृपा से दो जून रोटी के योग्य तो हो जाएगा।’ यूं कहते हुए उसकी आंखें भर आई थी।

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