इसरो के पीएसएलवी-सी62 की विफलता के सबक
साल 2025 में ऐसा प्रतीत हो रहा था कि डीओएस (डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस) और इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन) को गति मिलने जा रही है। नेतृत्व परिवर्तन बिना किसी ज़ाहिर अवरोध के सम्पन्न हो गया था, मिशन की सूची भरी हुई लग रही थी और छह दशक तक सुनियोजित खतरा मोल लेकर गठित किये गये संगठन का संस्थागत विश्वास कायम था लेकिन जैसे ही वर्ष 2026 शुरू हुआ तो यह उम्मीद केवल आंशिक ही पूरी हो सकी। इसका अर्थ यह नहीं है कि सफलता पूर्णत: मायावी रही। दरअसल, जो योजना बनायी व घोषित की गई थी, उससे अगर मापा जाये तो उम्मीदों और निष्पादन के बीच का फासला निरंतर समीक्षा की मांग कर रहा है। प्रमुख मिशन हाथ से फिसले हैं, टाइमलाइन्स को बढ़ाना पड़ा है और असफलता, दोनों आंशिक व पूर्ण, बीच-बीच में देखने को मिली हैं। हालांकि पीएसएलवी-सी62 मिशन एक बार फिर नाकाम रहा, लेकिन इसरो व डीओएस की कोशिश होनी चाहिए कि 2026 भी अपेक्षा से कम प्रदर्शन का साल न रहे।
सोमवार (12 जनवरी 2026) को इसरो का पीएसएलवी-सी62 लांच के दौरान ‘अपने नियोजित उड़ान मार्ग से भटक गया’ जोकि न केवल सुरक्षा एजेंसीज के लिए बहुत बड़ा धक्का है कि महत्वपूर्ण रक्षा सैटेलाइट ईओएस-एन1 (अन्वेषा) खो गया बल्कि अनेक भारतीय व विदेशी संस्थाओं, स्टार्टअप्स व कम्पनियों ने विघटनकारी टेक्नोलॉजी वाली 15 उपग्रह भी खोए, जिनसे स्पेस सेक्टर में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता था। अगर वह 502 किमी की ऊंचाई पर अपनी सूर्य-समकालिक कक्षा में पहुंच जाते। डीआरडीओ की ईओएस-एन1 (अन्वेषा), रणनीतिक सुपर आंख, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट था, जिसमें सैंकड़ों वेवलेंथ ‘देखने’ की क्षमता थी, ज़मीन पर चीज़ों को पहचानने के लिए- जिससे वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उच्च वरीयता का एसेट बनता। अगर वह अपनी कक्षा में पहुंच जाता तो वह अपनी एडवांस्ड रिमोट सेंसिंग क्षमता से देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने में मदद करता और साथ ही कृषि, शहरी मैपिंग व पर्यावरण अवलोकन जैसे क्षेत्रों में नागरिकों के भी काम आता।
पीएसएलवी-सी62 मिशन का लक्ष्य न सिर्फ भारत की रणनीतिक राष्ट्रीय ज़रूरतों को पूरा करना था बल्कि कमर्शियल स्पेस में वैश्विक महत्वकांक्षाएं भी थीं। ज़ाहिर है इसकी नाकामी से इन दोनों उद्देश्यों को धक्का लगा है। इसरो, नासा, स्पेस एक्स से लेकर चीन व रूस के स्पेस कार्यक्रमों तक नाकामियों से बच नहीं सके हैं, लेकिन इन्हीं की बदौलत हाई-रिस्क वातावरण में दीर्घकालीन सफलता के लिए बहुमूल्य डाटा और आवश्यक सुरक्षा हासिल की जाती है। यह अच्छा नतीजा तभी मिल सकता है, जब नाकामी की जांच ईमानदारी से की जाये, जो सबक मिले हैं उन्हें गंभीरता से लागू किया जाये और सुधरी हुई व्यवस्था के साथ आगे बढ़ा जाये। अगर ऐसा नहीं किया गया तो वही होगा जिसका अनुभव रूस के स्पेस कार्यक्रम ने अनुभव किया- बाज़ार में हिस्सेदारी व प्रतिष्ठा दोनों चले जायेंगे।
पीएसएलवी लम्बे समय से इसरो का वर्कहोर्स रहा है, जिसने अपनी विश्वसनीयता की बदौलत अच्छा व्यापार किया है लेकिन अब वह दो बार नाकाम हो गया है, जिससे ग्राहक संकोच करने लगेंगे। कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाज़ार में, जहां नये लांचर तेज़ ताल का वायदा करते हैं, इसरो गुडविल की विरासत पर मुकाबला नहीं कर सकता। नवीनतम असफलता न सिर्फ इसरो की कमर्शियल विश्वसनीयता पर बट्टा लगाती है बल्कि डीआरडीओ द्वारा निर्मित रणनीतिक पेलोड सहित 15 सैटेलाइट का भी नुकसान हुआ है। भारत में पहले ही आसमान से निगरानी, टोहने व सुरक्षित कम्युनिकेशन का अभाव है। रक्षा सैटेलाइट के खोने से यह फासला अतिरिक्त चौड़ा हो जाता है और वह भी ऐसे समय जब क्षेत्रीय सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के संदर्भ में देरी नहीं की जा सकती।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसरो ने यह घोषित करने का असामन्य कदम उठाया था कि दुश्मन देश के अंदर सटीक स्ट्राइक्स देश की स्पेस क्षमता की वजह से ही मुमकिन हो सकी लेकिन हर नाकाम लांच तैनाती कार्यक्रम को महीनों, कभी-कभी वर्षों, पीछे धकेल देता है। रिप्लेसमेंट सैटेलाइटस को ज़रूरत होती है फंडिंग मंज़ूरी की, पुन:निर्माण चक्र की और नये लांच स्लॉट्स की। ज्ञात रहे कि साल 2025 इसरो के लिए अपेक्षा अनुरूप नहीं रहा और वर्ष 2026 उम्मीदों व निष्पादन के बीच फासले से शुरू हुआ है और ज़ोर-ज़ोर से पुकार रहा है कि चीज़ों पर सही से ध्यान दिया जाये। यह अनुमान सही नहीं है कि पीएसएलवी-सी62 की नाकामी की भरपाई प्राइवेट स्टार्टअप्स लांच से हो जायेगी। भारत के प्राइवेट लांच वाहन अभी भी विकास के शुरुआती चरण में हैं। निकट भविष्य के लिए, राष्ट्रीय रणनीतिक मिशन अब भी इस बात पर निर्भर हैं कि इसरो के लांच सिस्टम्स सुचारू रूप से कार्य करें। इसरो एक साथ गगनयान, हैवी-लिफ्ट डेवलपमेंट, गृह मिशन पर काम करने के अतिरिक्त कमर्शियल मांगों का भी विस्तार कर रही है। पीएसएलवी का संकट इंजीनियरिंग फोकस, टेस्टिंग सुविधाओं व नेतृत्व ध्यान को भटका देता है। इस दबाव का अन्य कार्यक्रमों पर असर पड़ने का खतरा बना रहेगा अगर वरीयताओं को स्पष्टता के साथ पुन: तय न किया जाये।
सीमित लांच क्षमता, फिसलती टाइमलाइंस और विदेशी रॉकेट्स पर बढ़ती निर्भरता भारत की स्पेस महत्वकांक्षा और निष्पादन की क्षमता में फासले का विस्तार करती जा रही हैं। इसी वजह से प्राइवेट सेक्टर विकल्पों को आकार दिया जा रहा है लेकिन घरेलू लांच प्रोवाइडर्स के संदर्भ में नीतियों में सुधार व लफ्फाज़ी के बावजूद भारतीय स्टार्टअप्स विदेशों की ओर देख रहे हैं। दिगंतारा, पिक्सेल व एक्सडीलिनक्स ने विदेशों में ही लांच किये हैं, स्पेस एक्स रॉकेट्स के ज़रिये। स्पेस एक्स ने एक साल में लगभग उतने ही मिशन लांच किये हैं जीतने इसरो ने अपनी स्थापना से अब तक किये हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



