गौरवमय परम्पराओं पर विवाद

मुख्यमंत्री श्री भगवंत मान को श्री अकाल तख़्त साहिब के सचिवालय में बुलाये जाने से एक ऐसी अजीब स्थिति पैदा हुई है जिसने एक बार फिर सिख समुदाय में बड़ी दुविधा पैदा कर दी है। सवाल यह है कि इस उच्च धार्मिक अस्थान पर मुख्यमंत्री को बुलाए जाने का आदेश कितना उचित माना जा सकता है? इससे पहले श्री अकाल तख़्त साहिब के कार्यकारी जत्थेदार साहिब द्वारा यह बयान दिया गया था कि बुलाया जाने वाला व्यक्ति जो पतित हो और रहत-मर्यादा का धारणी न हो, उसे सिख परम्परा के अनुसार श्री अकाल तख़्त साहिब की फसील के सम्मुख अपना स्पष्टीकरण देने के लिए नहीं बुलाया जा सकता। इस कारण उक्त व्यक्ति को श्री अकाल तख्त साहिब के सचिवालय में बुलाया जाता है। जत्थेदार साहिब के इस बयान पर भी कई सिख शख्सियतों और सिख संगठनों ने सवाल उठाए थे। अब जिस सीमा तक प्रत्येक स्तर पर यह विवाद उठ खड़ा हुआ है, उसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। इस तरह के उठे विवादों से इस महान केन्द्र की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है। सिख संगत के मन में यह सवाल भी पैदा होता है कि इस महान तख़्त साहिब को विवादों के दायरे में लाने में कौन से व्यक्तियों और शक्तियों का हाथ है? हम समझते हैं कि यह महान तख़्त सभी का साझा है। यहां से मन को अच्छी जीवन-शिक्षा देने वाला और सर्व-समन्वय का संदेश ही दिया जाना चाहिए। यहां से मानवता की भलाई के लिए अरदास ही की जानी चाहिए। आज के समय में दुनिया भिन्न-भिन्न स्तरों पर जीवन व्यतीत कर रही है। प्रत्येक के हर विषय पर अपने-अपने विचार हैं। मीडिया के इस युग में प्रत्येक प्राणी अक्सर इन विषयों पर अपने विचारों का प्रकटावा भी करता रहता है। यदि मौजूदा घटनाक्रम की जटिलताओं में हम अपनी महान संस्थाओं को, उनसे संबंधित व्यक्तियों को जाने-अनजाने उलझाने का यत्न करेंगे तो हम स्वयं ही इन संस्थाओं की शान और आभा को विवादग्रस्त बनाने के भागी बनेंगे। हम बेहद दुख और पीड़ा से यह महसूस करते हैं।
विगत लम्बी अवधि से राजनीतिज्ञों द्वारा अपने राजनीतिक विवादों के दृष्टिगत सदियों से स्थापित इन संस्थाओं को अपनी लालसाओं के हित में इस्तेमाल करने का यत्न किया जाता रहा है। राजनीतिज्ञों ने इन संस्थाओं को आपसी विवादों में उलझा कर रख दिया है। इस तरह उन्होंने इन स्थानों की आभा को कम करने का काम किया है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी की शुरुआत गुरुद्वारा साहिबान का समूचा प्रबन्ध करने और अपनी सदियों पुरानी परम्पराओं को और गौरवमय बनाने और बुलंदियों पर पहुंचाने के उद्देश्य से हुई थी, परन्तु आज यह भी अनेक उलझनों में फंसी दिखाई देती है। इसके लिए भी इसके समय-समय रहे पदाधिकारी ज़िम्मेदार रहे हैं। वे उठने वाले विवादों को समुचित ढंग से समय पर सुलझाने में असफल रहे हैं। इसलिए उन्हें देर या सवेर जवाबदेह होना ही पड़ेगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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