भारत की घेराबंदी के लिए आकार लेता ‘इस्लामिक नाटो’!
पिछले कुछ समय से भारतीय रणनीतिक विमर्श में एक शब्द बार-बार दोहराया जा रहा है- ‘इस्लामिक नाटो’। यह शब्द सुनने में जितना सीधा लगता है, असल में उतना ही जटिल, बहु-परतदार व भू-राजनीतिक है। कुछ लोग इसे अफवाह या राजनीतिक नारा मानते हैं, तो कुछ इसे भविष्य के बड़े सैन्य गठजोड़ की गंभीर चेतावनी लेकिन तब से यह शब्द दुनिया का और ज्यादा ध्यान खींच रहा है, जब से सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पिछले साल सितम्बर 2025 में हस्ताक्षरित हुए एक डिफेंस पैक्ट में तुर्किए भी शामिल होने के मोड़ पर पहुंच गया है। यह पैक्ट नाटो की तरह काम करेगा और इसमें किसी एक सदस्य पर हमला पूरे ग्रुप पर हमला माना जाएगा। इसे कई लोग ‘इस्लामिक नाटो’ या ‘मुस्लिम नाटो’ कह रहे हैं। ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक इस संबंधी बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और जल्द ही डील फाइनल हो सकती है। यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि इसमें सऊदी अरब का खजाना, पाकिस्तान का न्यूक्लियर हथियार और तुर्किए की मजबूत मिलिट्री पावर इस इस्लामिक नाटो में एक साथ आ रही हैं। भारत इस डील पर गहरी नज़र रख रहा है क्योंकि भारत और इज़रायल, इन दो देशों के लिए ही यह सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में सवाल है कि भारत को किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए?
दरअसल पहले ‘इस्लामिक नाटो’ शब्द अक्सर एक भावनात्मक-राजनीतिक टैग की तरह इस्तेमाल होता था जबकि जमीनी हकीकत में इसके पीछे दो अलग-अलग धाराएं दिखाई देती हैं। एक सऊदी नेतृत्व वाला आईएमसीटीसी जिसे 2015 में घोषित किया गया और जिसका मुख्यालय रियाद में है। इसे वास्तव में एक पैन-इस्लामिक आतंकवाद-रोधी गठबंधन बताया जाता रहा है। दूसरा हाल के महीनों में चर्चित सऊदी-पाकिस्तान ‘म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट’ है, जिसमें अब तुर्किये के शामिल होने की संभावनाएं भी बढ़ गयी हैं। इसी संभावना के बाद यह खतरनाक गठजोड़ बनकर उभरा है और इसलिए मुस्लिम नाटो जैसा शब्द प्रयुक्त किया जाने लगा है। नाटो की धारा-5 जैसी सोच-एक पर हमला, सब पर हमला, इसका भी ध्येय वाक्य बताया जा रहा है। कहने का मतलब यह कि भारत के लिए खतरे का आकलन करते समय यह समझना ज़रूरी है कि आईएमसीटीसी या नया नाटो जैसा इस्लामिक गठजोड़ त्रिपक्षीय धुरी-सऊदी-पाकिस्तान-तुर्किये, वास्तविक सैन्य-सामरिक प्रभाव पैदा कर सकता है-खासकर अगर यह केवल बयान नहीं, बल्कि साझा अभ्यास, हथियार, इंटेलिजेंस व कूटनीतिक समन्वय तक पहुंचे।
हालांकि आईएमसीटीसी को 2015 में घोषित किया गया था। इसमें दर्जनों मुस्लिम देश शामिल हैं और यह आतंकवाद/उग्रवाद-वित्तपोषण/विचारधारा-विरोध जैसे क्षेत्रों में पहल की बात करता है लेकिन इसकी स्पष्ट सीमाएं थीं जैसे यह नाटो जैसी बाध्यकारी सामूहिक रक्षा संधि नहीं था। साथ ही इसके कई सदस्य देशों के आपसी मतभेद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धाएं और गुटबंदी इसके ‘एकीकृत सैन्य बल’ बनने में बाधक थीं। आलोचक इसे कभी-कभी ईरान-विरोधी/शिया-विरोधी झुकाव वाला भी मानते रहे हैं, क्योंकि ईरान, इराक, सीरिया जैसे शिया-प्रभावी देश इसमें शामिल नहीं हैं। निष्कर्ष यह कि आईएमसीटीसी अपने आप में भारत के लिए ‘सीधा सैन्य खतरा’ नहीं था। यह अलग बात थी कि यह एक ऐसा मंच है जो भविष्य में कुछ देशों को अधिक समन्वित होने का अवसर दे सकता है-विशेषकर पाकिस्तान जैसे देश के लिए। नई सैन्य धुरी जिसमें सऊदी-पाकिस्तान रक्षा संधि-तुर्किये की भूमिका मिलकर असली और बड़ी चिंता पैदा करती है। भारत के लिए वास्तव में अधिक गंभीर संकेत सितंबर 2025 के सऊदी-पाकिस्तान ‘म्यूचुअल डिफेंस’ समझौते से ही आता है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट ने इसके होते ही साफ कर दिया था कि इसकी मूल भावना ‘एक पर हमला, दोनों पर हमला’ जैसी साझा सुरक्षा प्रतिबद्धता भारत के लिए वाया पाकिस्तान खतरा है।
इसके बाद 2026 जनवरी में मीडिया विश्लेषणों में यह खबर तेजी से उभरी कि तुर्किये इस ढांचे से जुड़ने की दिशा में बातचीत कर रहा है-तभी इसे ‘मुस्लिम नाटो’ जैसे नाम दिए गए। यह संयोजन खतरनाक इसलिए माना जा रहा है क्योंकि विश्लेषणों में इसे तीन पूरक ताकतों का मेल बताया गया है-तुर्किये का सैन्य-उद्योग, ड्रोन/तकनीक, युद्ध-अनुभव, पाकिस्तान की मिसाइल क्षमता साथ में परमाणु क्षमता और सऊदी अरब की वित्तीय शक्ति, प्रभावी अरब नेतृत्व, ऊर्जा-राजनीति आदि मिलकर इसे खतरनाक गठजोड़ बनाते हैं। हालांकि यह नाटो जितना संगठित न तो है, न हो सकता है। फिर भी भारत के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकता है क्योंकि इससे पाकिस्तान को ‘नई रणनीतिक गहराई’ मिल सकती है-कूटनीति, हथियार-सप्लाई, फंडिंग और अंतर्राष्ट्रीय नैरेटिव निर्माण में मुस्लिम देशों का साथ। इसलिए यह भारत के लिए एक नहीं तीन स्तरों पर खतरा बन सकता है- पहला सैन्य खतरा, दूसरा तुर्किये की पाकिस्तान को उन्नत सैन्य सहयोग का खतरा।
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