यूरोप को प्राथमिकता देना भारत की शानदार कूटनीति
आगामी 26 जनवरी 2026 को भारत द्वारा अपने 77वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन को मुख्यातिथि बनाना केवल एक औपचारिक राजनयिक घटना भर नहीं है। यह एक रणनीतिक संदेश है और वह भी तब जब वैश्विक व्यापार, सप्लाई-चेन और सुरक्षा समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं। भारत सरकार के अनुसार दोनों नेता 25-27 जनवरी 2026 की स्टेट विज़िट पर आएंगे और 27 जनवरी 2026 को 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। यह एक ऐतिहासिक संकेत इसलिए भी है क्योंकि यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग-ईयू की ‘दो शीर्ष कुर्सियां’—एक साथ भारत की परेड में शामिल होंगी, जिसे ईयू ने भी द्विपक्षीय रिश्तों के मजबूत होने का प्रतीक बताया है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत अमरीका की नाराज़गी/व्यापारिक नुकसान की भरपाई यूरोप से करना चाहता है? अन्यथा हमारा इस तरह ‘यूरोप को तरजीह’ देने का अमरीका व दुनिया के लिए क्या संदेश है?
वास्तव में यह संदेश ‘अमरीका-विरोध’ का नहीं बल्कि डाइवर्सिफिकेशन का है। भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र कई वर्षों से रहा है-स्ट्रेटजिक ऑटोनोमी यानी किसी एक ध्रुव पर निर्भर न होना। ईयू नेताओं को गणतंत्र दिवस पर बुलाना, मूलत: यही बताता है कि भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है। अमरीका के साथ रक्षा/टेक/इंडो-पैसिफिक सहयोग। रूस के साथ ऊर्जा/ऐतिहासिक रक्षा संबंध। खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा/निवेश और ईयू के साथ व्यापार-तकनीक-मानक-निर्धारण। यह चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब प्रतिस्पर्धा केवल हथियारों की नहीं रही, अब मुकाबला है-टैरिफ, सप्लाई-चेन, सेमीकंडक्टर, एआई नियम, डेटा गवर्नेंस, ग्रीन-टेक और कार्बन टैक्स जैसी चीजों का। ईयू इन सबमें नियम और मानक तय करने वाली महाशक्ति है। ‘व्यापार समझौता’ इस सबकी असली बैकग्राउंड है। मुक्त व्यापार समझौता तथा व्यापक व्यापार और निवेश समझौता की रफ्तार वास्तव में इस पूरे घटनाक्रम का सबसे ठोस व्यापारिक पहलू है। इसके पीछे वास्तव में व्यापक व्यापार और निवेश समझौता को आगे बढ़ाने की कोशिश है। रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के व्यापार सचिव ने कहा है कि ईयू के साथ व्यापार समझौता ‘करीब’ है और यह भारत के लिए अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बन सकता है। इसी बीच यह भी रिपोर्ट हुआ कि 16वां भारत-ईयू शिखर सम्मेलन 27 जनवरी 2026 को होगा और उसी समय ईयू के शीर्ष नेता दिल्ली में होंगे। तो गणतंत्र दिवस का निमंत्रण केवल ‘सांस्कृतिक सम्मान’ नहीं। यह आर्थिक कूटनीति की हाई-प्रोफाइल पैकेजिंग है। जिसमें परेड का प्रतीकात्मक मंच-शिखर सम्मेलन की ठोस डील शामिल है।
सवाल है क्या यह अमरीका की नाराज़गी की भरपाई है? निश्चित रूप से यह सवाल बहुत ‘समय-संवेदनशील’ है। क्योंकि दुनिया में अब ‘टैरिफ युग’ में लौट रही है और बड़े देश अपने हितों के लिए दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक भारत-ईयू डील की तेज़ी को अमरीका के साथ टैरिफ/ट्रेड टेंशन और बाजारों के डाइवर्सिफिकेशन की ज़रूरत से जोड़ा गया लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अमरीका से दूरी बना रहा है। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी एक मार्किट के भरोसे नहीं बैठना चाहता। अगर अमरीकी बाजार/ट्रेड में अनिश्चितता बढ़ती है, तो ईयू-जो खुद दुनिया का सबसे बड़ा/सबसे समृद्ध बाज़ार समूह है-एक वैकल्पिक इंजन बन सकता है। ऐसे हम इसे ‘भरपाई’ से ज्यादा रिस्क इंश्योरेंस कह सकते हैं। इसीलिये अमरीका और शेष विश्व के लिए भारत की इस ‘मुख्यातिथि’ एक विशेष डिप्लोमेसी संदेश और सिर्फ अमरीका के लिए ही नहीं, इस फैसले का अमरीका, चीन, रूस, खाड़ी-सभी के लिए अलग-अलग संदेश निकलता है।
जहां तक अमरीका के लिए संदेश की बात है तो भारत साफ कह रहा है-हम आपके साझेदार हैं, लेकिन एक्सक्लूसिव कैंप में नहीं। अगर व्यापार/टैरिफ पर दबाव आएगा, तो भारत के पास विकल्प हैं। यह ‘सॉफ्ट बैलेंसिंग’ है-बिना खुले विरोध के। ठीक इसी तरह इसमें चीन के लिए भी संदेश है। ईयू आज ‘चीन से जोखिम मुक्त’ की बात करता है-यानी सप्लाई-चेन में चीन पर निर्भरता को घटाना। ऐसे में भारत का ईयू के साथ उठना-बैठना चीन को यह बताता है कि ‘ईयू-भारत धुरी’ सप्लाई-चेन में चीन का विकल्प बनने की कोशिश कर सकता है। इस सबके साथ इस चीफ गेस्ट डिप्लोमेसी में ग्लोबल साउथ के लिए संदेश है, भारत इसके जरिये यह दिखाता है कि वह विकासशील देशों की आवाज़ बने रहते हुए भी विकसित दुनिया के साथ सौदे कर सकता है-यानी कूटनीति और मोलभाव की ताकत दोनों, लेकिन इस सबमें सिर्फ भारत के लिए ही फायदा नहीं है यूरोप के लिए भी इसमें ‘विनिंग शॉट’ है, क्योंकि यूरोप को भारत से इसमें 4 बड़े फायदे दिखते हैं-और यही इस फैसले की दूसरी परत है। वास्तव में यूरोप को इसमें भारत का ग्रोथ मार्किट दीखता है यानी विशाल उभरता बाज़ार। इसलिए ईयू भारत के साथ लंबे समय से मुक्त व्यापार समझौता चाहता है। इसके अलावा इसमें सप्लाई-चेन का विविधीकरण भी है। कोविड के बाद और भू-राजनीतिक तनाव के बीच यूरोप को वैकल्पिक सप्लाई-चेन चाहिए। भारत, ‘चीन-1’ रणनीति का सबसे बड़ा दावेदार है। यूरोप के लिए तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है-ईयू-इंडिया ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल टीटीसी, जो इस सहयोग का महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है, जिसमें भरोसेमंद तकनीकी, सुरक्षा चुनौतियां जैसी चीजें शामिल हैं। साथ ही इसमें इंडो-पैसिफिक और सुरक्षा का विशेष पहलू है। दरअसल ईयू अब इंडो-पैसिफिक में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। भारत उसके लिए स्वाभाविक साझीदार है।
एंटोनियो कोस्टा और उर्सुला वॉन डेर लेयेन को 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्यातिथि बनाना भारत का स्पष्ट संदेश है कि वह 2026 के अनिश्चित वैश्विक माहौल में ईयू को रणनीतिक-आर्थिक साझेदार के रूप में ऊंची प्राथमिकता दे रहा है। यह कदम अमरीका से रिश्ते तोड़े बिना व्यापार जोखिम घटाने, बाज़ार विविधता बढ़ाने और सप्लाई-चेन/टेक में भारत की भूमिका मजबूत करने की कोशिश है। साथ ही ईयू के लिए भी यह अवसर है कि वह भारत जैसे विशाल बाज़ार और लोकतांत्रिक साझेदार के जरिए नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और आर्थिक सुरक्षा में मज़बूती पाए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



