बुढ़ापे का सौंदर्य

यह सुनकर अचरज होना स्वभाविक है कि सृष्टि में न तो कुछ सुंदर है और न असुंदर ही। सृष्टि में जो कुछ भी है, सबके सब अनूठे हैं। जहां तक आकार-प्रकार और रुप-रंग का प्रश्न है, हर कण के सृजन में अनूठापन है। सृष्टि में सबकुछ अनूठे हैं इसलिए इसे सृजन कहते हैं। सृष्टि में डुप्लीकेटिंग का कार्य नहीं होता है। गुण-धर्म में समानता हो सकती है, लेकिन रुप-रंग में नहीं।
एक बात और, सृष्टि में निश्चय ही सुंदर-असुंदर होने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन देखने वालों की आंखों में अपना-अपना मापदंड है, इसलिए हर दर्शक सृष्टि को अपने-अपने ढंग से देखता है और निर्णय लेता है। उसकी स्वीकृति के अनुसार जो प्राणी/पदार्थ अनुकूल पड़ता है वह आकर्षित करता है और जो प्राणी/पदार्थ प्रतिकूल पड़ता है उसमें विकर्षण होता है।
वार्द्धक्य में प्रकृति त्वचा की सुंदरता छीन लेती है। शरीर लगभग कांतिहीन लगता है। हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। भौंहें लटक जाती हैं। गाल पिचक जाते हैं। मांस पेशियां ढीली पड़ जाती हैं। आंखें धंस जाती हैं। दांत की जड़े कमजोर हो जाती हैं। केवल श्रवण शक्ति ही कमजोर नहीं पड़ती है, बल्कि स्मरण शक्ति भी समय-समय पर धोखा दे बैठती है। कितना गिनाएं! बुढ़ापा में नर हो या नारी सबकी श्री सम्पन्नता की दरिया सूखकर रेत हो जाती है लेकिन प्रकृति कंजूस नहीं है। वह जीवन को जीने में भरपूर सहयोग करती है। अड़चन तो मात्र यह है कि हम प्रकृति को समझने के बजाए उसके साथ निरंकुश शासन सदृश व्यवहार कर-करके अपनी पीड़ा बढ़ाते रहते हैं।
प्रसंगवश लेखक अपना संस्मरण संदर्भित करना चाहते हैं। उन्हें अपनी युवावस्था में पश्चिम बंगाल के पार्श्ववती क्षेत्रों में रहने का मौका मिला था। तब वे बांग्ला संस्कृति की एक विशेषता से परिचित हुए थे। उन दिनों वे देखते थे कि वहां की लड़कियां और जवान औरतें आमतौर पर सिर पर पल्लू नहीं रखती थीं। किन्तु वृद्धा प्राय: साड़ी इस प्रकार बांधती थीं जिससे उसके सिर और तन ढंके रहते थे। इस प्रचलन को देखकर उसके बारे में जानने की उत्सुकता का होना स्वाभाविक था। बंगाली मित्रा से बात करने पर वे समझ पाये थे कि ‘वृद्धावस्था में मुखारविंद के लावण्य एवं शारीरिक कांति के नष्ट हो जाने से नारी देह की विकृति दर्शक को अप्रीतिकर लगती है जिससे दर्शक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए वृद्धाएं अपनी काया ढं़के रहती हैं ताकि वे संपर्क में आने वाले गैर व्यक्तियों के उपेक्षा और उपहास का कारण न बनें।
उपर्युक्त पंक्तियों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि वृद्धावस्था में शारीरिक स्वच्छता और पहनावे की शुभ्रता अवस्थानुकूल होनी चाहिए और वृद्धों को वाणी की मधुरता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि वाणी का माधुर्य ही वार्द्धक्य का परम सौन्दर्य है। मधुर और पक्षपात रहित वाक-चातुर्थ वृद्धों की सम्पूर्ण कुरुपता को ढंक लेता है। यदि वाणी में माधुर्य के साथ-साथ उसमें हास्य व्यंग्य का पुट भी हो तब तो वार्द्धक्य सोने की अंगूठे में हीरे का नग सदृश श्री सम्पन्न हो जाता है।
हम जानते हैं कि नीम का कड़वा फल भी पक कर मीठा हो जाता है। कच्चा और खट्टा आम पकने पर मिठास से भर जाता है। बुढ़ापा में भी यह क्षमता विद्यमान रहती है कि वह वाणी के माधुर्य के साथ-साथ हास्य व्यंग्य को अपने शील-संव्यवहार में दृढ़ता से बनाए रख सकें।
वार्द्धक्योन्मुख नर-नारी से यह निवेदन है कि वे वार्द्धक्य की तैयारी समय रहते कर लें। यह तैयारी दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती है। और वाणी में मिठास तो भर ही लें। इससे उनकी अधिकाधिक समस्याओं के निदान का मार्ग स्वत: प्रशस्त हो जाएगा। (सुमन सागर)

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