कृष्ण चन्द्र, अब्बास, मंटो, बेदी तथा चुगताई

इस माह की ‘एकम’ और ‘प्रीत लड़ी’ में सियादत हसन मंटो तथा इस्मत चुगताई की चर्चा पढ़ कर उर्दू अफसाना-निगारी का वह युग याद आ गया है, जिसमें अब्बास, कृष्ण चन्द्र तथा राजिन्दर सिंह बेदी का भी बोलबाला था। गत शताब्दी के 30वें दशक का यह दौर प्रगतिशील साहित्यकारी को समर्पित था। बात कहने का अंदाज़ तथा पेशकारी प्रत्येक की अपनी-अपनी थी। इनमें से सबसे छोटी आयु (11 मई, 1912 से 18 जनवरी, 1955) के मंटो का जन्म जिला लुधियाना का समराला तहसील के आधीन आते गांव पपड़ौदी का था। इस्मत चुगताई भी मंटो जितनी ही लोकप्रिय हुई और उसकी तरह तल्ख, कटु तथा शीरीं पेशकारी के लिए जानी जाती थी। 
मैं इन पांचों में से सिर्फ राजिन्दर सिंह बेदी को मिला था। वह मुझसे बीस वर्ष बड़े होने के बावजूद हमउम्र की तरह मिलते और पत्र लिखते थे। ये पंक्तियां लिखते समय मुझे उनका वह पत्र मिल गया है जो उन्होंने 30 अप्रैल, 1961 को लाजवंती कहानी के अंग्रेज़ी अनुवाद की स्वीकृति देते हुए मुझे लिखा था। बेदी भी उस युग के अनूठे स्तम्भ थे। सियादत हसन मंटो तथा इस्मत चुगताई की तरह चुस्त, चालाक व निडर।
इस ताज़ा लेख में मैं अपनी तरफ से कुछ और न लिख कर सिर्फ दूसरों का लिखा दे रहा हूं। मंटो के निधन समय कृष्ण चन्द्र की लिखी श्रद्धांजलि और इस्मत चुगताई और मंटो की आपसी नोक-झोंक। मंटो की लिखी नोक-झोंक का शीर्षक है ‘इस्मत चुगताई और मैं’। यहां दिया गया पंजाबी अनुवाद सुरिंदर रामपुरी का है। यह गांव भी मंटो के पपड़ौरी से सिर्फ दस किलोमीटर दूर है। मंटो के लेख के कुछ हिस्से पेश हैं :
उन दिनों जब मैं मुम्बई में था, हैदराबाद के एक लेखक का पत्र मिला। उसने लिखा था, ‘यह क्या बात बनी कि इस्मत चुगताई ने आपसे शादी नहीं की’ अगर मंटो और इस्मत मिल जाते, तो कितना अच्छा होता। अफसोस है कि इस्मत ने साहित्य से शादी की और मंटो...।
उन दिनों हैदराबाद में प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन हुआ। मैं तो उस सम्मेलन में नहीं गया, लेकिन लड़कियों के एक ग्रुप ने इस्मत को घेर कर पूछा, ‘तुमने मंटो से शादी क्यों नहीं की?’ इतना अवश्य है कि अगर मंटो और इस्मत की शादी हो जाती तो उर्दू कहानी साहित्य के इतिहास पर इसका एटमी प्रभाव पड़ता।
शाहिद लतीफ अपनी पत्नी के साथ बम्बई के क्लेरम रोड पर एडलफी चैंबर्स के फ्लैट नंबर 16 में आए, जहां मैं रहता था। यह अगस्त 1942 की बात है। एक महीने पहले इस्मत की कहानी ‘लिहाफ’ ‘अदबो-लतीफी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। मुझे याद है कहानी पढ़ने के बाद मैंने कृष्ण चन्द्र से कहा था, ‘कहानी बहुत अच्छी है लेकिन आखिरी लाइन कलाहीन है। अगर अहमद नदीम की जगह मैं सम्पादक होता, तो इसे काट देता।’ 
इसलिए जब कहानियों पर बात शुरू हुई, तो मैंने इस्मत से कहा, ‘मुझे आपकी कहानी ‘लिहाफ’ बहुत पसंद आई। कहानी सुनाते समय कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करना आपका विशेष गुण है, लेकिन मुझे हैरानी है कि आपने इस कहानी के आखिर में इतनी फिज़ूल-सा वाक्य क्यों लिख दिया?’
 इस्मत ने कहा, क्या गलत है उस वाक्य में।’
 मैं जवाब में कुछ कहने ही लगा था कि मैंने इस्मत के चेहरे पर वही लज्जा देखी, जो आम घरेलू लड़कियों के चेहरे पर किसी वर्जित चीज़ का नाम सुन कर आ जाती है। जब इस्मत चली गईं तो मेरे दिल ने कहा, ‘यह तो बिल्कुल ही औरत निकली।’
फिर एक दिन मेरी पत्नी ने इस्मत से ‘लिहाफ’ के बारे में कहा, ‘यह क्या बकवास कहानी लिखी है।’ इस्मत ने तुरंत कहा, ‘बोलो मत, बर्फ लाओ कहां है।’ इस्मत को बर्फ खाने का बहुत शौक है। बच्चों की तरह टुकड़ा हाथ में लेकर काटती रहती थी। आपसी टकराव के डर से हम बहुत कम बात करते थे। जब मेरी कहानी प्रकाशित होती तो वह उसे पढ़कर दाद देती। ‘नीलम’ के प्रकाशिथ होने पर उसने विशेष तौर पर मेरी तारीफ की थी।
कृष्ण चन्द्र ने मंटो के निधन पर एक लेख लिख कर  श्रद्धांजलि दी :
एक अनोखी घटना घटी हुई है, मंटो का निधन हो गया है। वैसे तो उसकी कब से मौत हो चुकी थी। कभी सुना कि वह पागल हो गए हैं, कभी सुना कि ज़्यादा शराब पीने की वजह से अस्पताल में पड़ा है, कभी सुना कि उनके दोस्त भी उन्हें छोड़कर चले गए हैं, कभी सुना कि वह तथा उनकी पत्नी और बच्चे भूख में दिन काट रहे हैं। लेकिन यकीन नहीं हुआ क्योंकि तब भी उनकी कहानियां लगातार प्रकाशित हो रही थीं, अच्छी और बुरी दोनों। उन्हें पढ़ कर मंटो का मुंह नोचने का मन करता और कई कहानियां पढ़कर उनका मुंह चूम लेने को मन करता। ये कहानियां इस बात का सबूत थीं कि मंटो ठीक थे।
लेकिन जब रेडियो पाकिस्तान ने यह खबर दी कि मंटो का हार्ट अटैक से निधन हो गया है तो दिल और दिमाग को यकीन नहीं हुआ कि ऐसा हो सकता है। लेकिन अगले ही पल मुझे यकीन करना पड़ा क्योंकि रेडियो पर पत्रकारों ने इस बात की पुष्टि कर दी थी। आज के बाद, वह नई कहानी नहीं लिखेंगे। आज के बाद उनकी राज़ी-खुशी का कोई पत्र नहीं आएगा।
‘निक-सुक’ हदें पार कर रहा है लेकिन मैं कृष्ण चन्द्र की निम्नलिखित बात लिखे बिना नहीं रह सकता :
आज बहुत ठंड है और आसमान में हल्के बादल हैं, लेकिन बारिश की एक भी बूंद नहीं। मेरी आंख में एक भी आंसू नहीं है। मंटो को रोने-रुलाने से बहुत नफरत थी। यह बहुत अजीब संयोग है कि जिस दिन मैं पहली बार मंटो से मिला, मैं दिल्ली में था। उसी घर में था जहां वह एक गरीब और सताई हुए भाषा का, गरीब और सताया हुए लेखक था।
अभी उसके कुछ कहने और सुनने के दिन रहते थे। ज़िन्दगी के कड़वे अनुभव, समाज की कठोरता, परेशान ज़िन्दगी, टूटे हुए व्यक्तित्व का गुस्सा और विरोध के ज़ख्म ने उससे ‘टोभा टेक सिंह’ जैसी कई और कहानियां लिखवानी थी। दुख मंटो की मौत का नहीं है, मौत तो सबको आनी है, दुख तो इस बात का है कि उसने साहित्य को जो हीरे, पन्ने तथा जवाहरात देने थे,  वे नहीं मिल पाए. जो सिर्फ वही दे सकते थे। उनकी जगह कोई नहीं भर पाएगा। यह मैं भी जानता हूं, राजिन्दर सिंह बेदी भी, इस्मत चुगताई भी, ख्वाज़ा अहमद अब्बास भी और उपिन्दर नाथ अशक भी। हम सभी उनसे झगड़ने वाले, उनसे प्यार करने वाले, उनसे नफरत करने वाले, उनके हमसफर और साथी थे। आज हम सबकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा मर गया है, उसकी पूर्ति नहीं हो सकेगी। आज हममें से हर कोई मंटो के करीब है और एक-दूसरे के ज़्यादा।
 

ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com
 

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