मगनरेगा में सुधार का विरोध अनावश्यक

मोदी सरकार ने जब से मगनरेगा का नाम बदलकर ‘वी.भी.—जी रामजी’ किया है, तब से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विरोध में कांग्रेस ने 45 दिन का विरोध आंदोलन शुरू किया था जो कि अभी चल रहा है। तेलंगाना, पंजाब और कर्नाटक की विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पारित किया गया है। केरल, बंगाल और तमिलनाडु में भी इसका ज़बरदस्त विरोध किया जा रहा है। विपक्षी दलों का सबसे पहला विरोध तो मनरेगा का नाम बदलने को लेकर ही है। उनका कहना है कि इस योजना से महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया गया है। इसके अलावा योजना के स्वरूप में बदलाव का भी विरोध किया जा रहा है जिसमें मोदी सरकार ने योजना को मांग आधारित से बदलकर आपूर्ति आधारित बना दिया है। अब इस योजना पर केंद्र सरकार का नियंत्रण ज्यादा हो गया है। इसके अलावा राज्यों पर भी वित्तीय बोझ डाला गया है। विपक्षी दल इसे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं और उनका कहना है कि सरकार ने राज्यों पर वित्तीय बोझ लाद दिया है। कुछ राज्यों द्वारा इस योजना को अदालत में भी चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। 
दूसरी तरफ  केंद्र सरकार का कहना है कि उसने रोज़गार गारंटी को 100 से 125 दिन कर दिया है। पहले इस योजना का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था, लेकिन अब राज्यों को भी बोझ सहन करना होगा। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वह राज्यों की जवाबदेही तय करना चाहती है। केंद्र द्वारा सारा पैसा देने के कारण राज्य योजना पर ध्यान नहीं देते थे। सरकार ने बुवाई/कटाई के 60 दिनों के दौरान रोजगार पर रोक लगा दी है ताकि खेती के लिए मज़दूर कम न पड़े। अब इस योजना में हर ग्रामीण परिवार को 125 दिन की वेतन आधारित गारंटी दी गयी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना को समग्र ग्रामीण विकास के साथ जोड़ा गया है। अब ये योजना सिर्फ पैसा बांटने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इससे ग्रामीण इलाकों के विकास कार्यों को जोड़ा गया है। इस योजना के बारे में यह आम धारणा है कि इस योजना में सारे काम कागज़ों में किए जाते रहे हैं, केंद्र सरकार इस धारणा को तोड़ना चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि इस योजना के अंतर्गत किये गए कार्य धरातल पर दिखने चाहिएं। 
अगर केन्द्र सरकार ने सिर्फ  योजना का नाम बदला होता तो कांग्रेस का विरोध जायज़ ठहराया जा सकता था, लेकिन सरकार ने इस योजना में बड़े बदलाव किए हैं । ऐसा भी लगता है कि सरकार ने जान-बूझकर कर योजना के नाम में बदलाव किया है, ताकि योजना की पहचान उसके साथ जुड़ जाए। 
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को बताना चाहिए कि मोदी सरकार ने जो बदलाव किए हैं, क्या वे नहीं किये जाने चाहिए थे। ये योजना संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा शुरू की गई थी, क्या आज कांग्रेस इस योजना में हुए भ्रष्टाचार की ज़िम्मेदारी ले सकती है। क्या कांग्रेस बता सकती है कि हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद इस योजना में किये गए विकास कार्य धरातल पर क्यों दिखाई नहीं देते।
यूपीए सरकार के दौरान इस योजना के कार्यान्वयन में इतनी खामियां थी कि इसमें सुधार ज़रूरी हो गए थे। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस योजना में बड़े बदलाव किए हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण जनता के पैसे की बर्बादी हो रही थी। इस योजना के बारे में कहा जाता था कि पहले गड्ढे किये जाते हैं और फिर उन्हें भर दिया जाता है। कुछ समय पहले 55 ज़िलों में की जांच में 300 करोड़ के घोटाले इस योजना में सामने आए हैं। यह योजना गरीबों के साथ जुड़ी हुई है, क्योंकि इससे उन्हें रोज़गार दिया जाता है। इस योजना का विरोध करने वालों को गरीब विरोधी करार दिया जाता है। शायद इसलिए इसमें सुधार करने में इतनी देर लगाई गई है। कांग्रेस भी यही विमर्श चला रही है कि मोदी सरकार गरीब विरोधी है, इसलिए योजना में बदलाव किया गया है। इस योजना में फर्जीवाड़े की एक खबर सामने आई है कि इस योजना में पंजीकृत पांच लाख मज़दूरों की उम्र 80 साल से ज्यादा थी। क्या मगनरेगा में इन श्रमिकों से कठिन परिश्रम वाले काम कराए गए थे, जिसमें गड्ढे खोदना, तालाबों, पोखरों और कच्ची सड़कों का निर्माण करना शामिल हैं। 80 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों के लिए फावड़ा उठाकर ऐसा काम करना असम्भव है। इससे साबित होता है कि इन श्रमिकों के नाम पर सरकारी पैसे की लूट की गई है। 
ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि इनमें से कई लोगों की कार्य क्षमता खत्म हो चुकी थी और कुछ लोगों की तो मृत्यु भी हो चुकी है। देशभर में मनरेगा योजना के अंतर्गत 6.5 करोड़ लोग पंजीकृत है जिसमें से एक करोड़ लोगों की उम्र 61 साल से ज्यादा है।  इसका मतलब है कि लगभग 15 प्रतिशत लोग इस योग्य नहीं हैं कि उनसे कठिन परिश्रम का काम कराया जा सके।  आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, गोआ, पुडुचेरी, लद्धाख, मणिपुर जैसे राज्यों में 61 से 80 साल वाले श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है। (युवराज)

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