अजब रिश्ता
रिश्तों की दुनिया में कुछ संबंध ऐसे भी होते हैं, जिनका कोई नाम नहीं होता, कोई खून का धागा नहीं जुड़ा होता, फिर भी वे जीवन की सबसे मजबूत डोर बन जाते हैं। बड़ी भाबु की बहन राजकुंवर और आराध्य के परिवार का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था-न लिखित, न घोषित, बस चुपचाप निभाया गया।
बड़ी भाबु आराध्य की रिश्ते में कुछ नहीं लगती थीं, लेकिन मोहल्ले की दीवारों के भीतर उन्होंने एक पूरा संसार रचा था। उनका छोटा सा घर, उनकी सधी हुई दिनचर्या और उनका असीम धैर्य-सब कुछ जैसे स्त्री संघर्ष की जीवंत तस्वीर था। अस्सी वर्ष की उम्र में एक असाध्य रोग से जूझते हुए, जब वे इस दुनिया से विदा हुईं, तो उनके जाने से सिर्फ एक जीवन नहीं गया, बल्कि कई रिश्तों की धुरी भी टूट गई।
बड़ी भाबु के पति सेना में थे। आराध्य ने उन्हें कभी देखा नहीं, क्योंकि वे देश के लिए शहीद हो चुके थे। जवान उम्र में विधवा हो जाना, वह भी बिना किसी संतान के यह खालीपन बड़ी भाबु ने कभी शब्दों में नहीं ढाला। उन्होंने अपने दु:ख को जिम्मेदारी में बदल लिया। उनकी छोटी बहन राजकुंवर की पांच बेटियां ही उनका संसार बन गईं। उन बेटियों को उन्होंने कभी भांजी नहीं कहा, हमेशा ‘मेरी बच्चिया’ कहा।
दोनों बहनों ने मिलकर जीवन की कठोरता का सामना किया। किसी निजी संस्था के लड़कियों के हॉस्टल में मेड की नौकरी-सुबह से रात तक झाड़ू, पोंछा, बर्तन और अनगिनत जिम्मेदारियां। उसी कमाई से पांच बेटियों की पढ़ाई, परवरिश और फिर शादी-ब्याह। समाज अक्सर कहता है कि बेटियां बोझ होती हैं लेकिन बड़ी भाबु और राजकुंवर ने अपने पसीने से साबित किया कि बेटियां नहीं, बल्कि अवसरों की कमी बोझ होती है।
बड़ी भाबु स्वभाव से सख्त थीं। कभी-कभी राजकुंवर को डांट भी देतीं-काम ठीक से न हुआ तो, या किसी बात में लापरवाही दिखी तो, लेकिन राजकुंवर ने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया। वह जानती थीं कि उस सख्ती के पीछे अपार प्रेम और चिंता छिपी है। स्त्रियों के बीच यह मौन समझ अक्सर शब्दों से ज्यादा गहरी होती है।
समय बीतता गया। बेटियां अपने-अपने घर बसाकर ससुराल चली गईं। बच्चे हुए, जिम्मेदारियां बढ़ीं। बड़ी भाबु की उम्र और बीमारी दोनों बढ़ती गईं। आराध्य तब छोटा था, लेकिन उसके मन में बड़ी भाबु की छवि हमेशा एक स्नेहिल पड़ोसन की रही, जो बिना रिश्ता पूछे, सिर पर हाथ रख देती थी।
बड़ी भाबु के जाने के बाद, वह घर जैसे सूना पड़ गया। एक दिन आराध्य की मम्मी किसी कार्यक्रम से लौट रही थीं। रास्ते में राजकुंवर का घर पड़ा। मन में आया-बड़ी भाबु तो नहीं रहीं, लेकिन राजकुंवर तो हैं, हाल-चाल पूछ लेना चाहिए। जब वे पहुंचीं, तो राजकुंवर की आंखों में एक गहरी उदासी थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा-
‘आजकल आराध्य और आप कोई मिलने नहीं आते। मुझसे कौन मिलना पसंद करेगा। बड़ी भाबु का प्यार था, जो तुम्हें खींच लाता था। आज बिना बड़ी भाबु के यह छोटा सा घर खाने को दौड़ता है। अकेली हूं न!’
यह अकेलापन सिर्फ एक स्त्री का नहीं था, यह उस सामाजिक व्यवस्था का आईना था, जहां स्त्री जीवन भर दूसरों के लिए जीती है और अंत में उसके पास सिर्फ खाली दीवारें बचती हैं।
जब बड़ी भाबु जीवन की अंतिम अवस्था में थीं, तो उन्होंने अपने पास के थोड़े-से गहने-पंजेब, चांदी के भारी कड़ले और एक सोने का हार-राजकुंवर को थमाते कांपते हाथों से देते हुए कहा-
‘बेटियों को बांट देना। मेरे पास और कुछ नहीं है देने को।’
यह गहने नहीं थे, यह उनके अधूरे मातृत्व, त्याग और संघर्ष की आखिरी निशानी थी।
आज राजकुंवर अब भी उसी संस्था में मेड का काम करती हैं। हॉस्टल, जहां कभी चार हजार लड़कियां रहती थीं, अब सिमटकर सौ-डेढ़ सौ रह गया है। वहीं से खाना ले आती हैं। जीवन किसी तरह कट रहा है। बेटियां अपने संसार में व्यस्त हैं-व्यस्तता, जो अक्सर संवेदनाओं को पीछे छोड़ देती है।
आराध्य को जब यह सब पता चला, तो उसके भीतर कुछ हिल गया। उसने समझा कि रिश्ते सिर्फ नाम और खून से नहीं बनते, वे समय देने से बनते हैं। राजकुंवर जैसी स्त्रियां समाज की रीढ़ हैं- जो बिना शिकायत, बिना मंच, बिना प्रशंसा के जीवन भर दूसरों का भार उठाती हैं।
यह कहानी सिर्फ राजकुंवर और बड़ी भाबु की नहीं है। यह उन अनगिनत स्त्रियों की कहानी है जो अपनी पहचान दूसरों की खुशियों में घोल देती हैं। स्त्री विमर्श का असली प्रश्न यही है- क्या समाज कभी उन स्त्रियों से पूछेगा, ‘तुम कैसी हो?’
क्योंकि कभी-कभी, सिर्फ हाल पूछ लेना भी किसी के जीवन में सबसे बड़ा सहारा बन जाता है।
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