जिनको फिल्में बनाने की लत थी सोहराब मोदी

जब सोहराब मोदी ने फिल्में बनाना छोड़ दिया था तब भी वास्तव में उन्होंने फिल्म बनाने का विचार नहीं छोड़ा था। वह एक और फिल्म बनाना चाहते थे। इसलिए 1982 में जब वह 85 साल के थे और बामुश्किल ही चल फिर सकते थे, उन्होंने ‘गुरु दक्षिणा’ फिल्म का मुहूर्त आयोजित किया। सोहराब की फिल्में बनाने की दीवानगी कमज़ोरी की हद तक थी, जिसका लोगों ने अनुचित लाभ उठाया और अग्रिम राशि अदा करने के कारण उन्होंने बहुत नुकसान उठाया क्योंकि मुहूर्त के दो दिन बाद उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया और फिर कभी नहीं उठे। उनकी पत्नी मेहताब ने 1986 में कहा था कि सोहराब को फिल्म बनाने की लत थी और तथ्य यह है कि फिल्म निर्माण के अतिरिक्त उनकी किसी चीज़ में दिलचस्पी नहीं थी।
सोहराब मेरवांजी मोदी का जन्म बॉम्बे में 2 नवम्बर 1897 को एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता आईसीएस (इंडियन सिविल सर्वेंट) थे, जिनके 12 बच्चों में से एक सोहराब थे। सोहराब का बचपन अपने पिता की पोस्टिंग की वजह से रामपुर, उत्तर प्रदेश में बीता, जहां उनकी दिलचस्पी हिंदी व उर्दू भाषाओं में हुई। स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद वह ग्वालियर में अपने बड़े भाई केकी मोदी के साथ रहने लगे जो जगह-जगह जाकर नाटकों का मंचन किया करते थे, विशेषकर शेक्सपियर के नाटकों का। सोहराब अपने भाई की कंपनी के साथ यात्रा करते और जब पर्दा गिरने पर दर्शकों की तालियां गूंजती तो उन्हें आत्मिक संतोष मिलता। अपने अभिनय व डायलॉग डिलीवरी की वजह से सोहराब का काफी नाम हुआ। सोहराब जब 16 बरस के हुए तो वह ग्वालियर के टाउन हाल में फिल्में प्रोजेक्ट करने लगे और 26 साल का होने पर उन्होंने आर्य सुभोध थिएट्रिकल कंपनी की स्थापना की।
बहरहाल, मूक फिल्मों में कुछ अनुभव प्राप्त करने के बाद सोहराब पारसी थिएटर के एक्टर बने। 1931 में साउंड फिल्मों के आगमन से थिएटर में लोगों की दिलचस्पी कम हो गई। मरती हुई कला को ज़िंदा करने के उद्देश्य से सोहराब ने 1935 में स्टेज फिल्म कंपनी स्थापित और अपने थिएटर के नाटकों को वह फिल्मों में बदलने लगे। ‘खून का खून’ (1935) ‘हैमलेट’ पर आधारित थी, जो नसीम बानो (सायरा बानो की मां) की पहली फिल्म थी। शेक्सपियर के ही ‘किंग जॉन’ पर आधारित दूसरी फिल्म ‘सैद-ए-हवस’ 1936 में आयी। दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रहीं।
हालांकि नसीम बानो से सोहराब के संबंध पर विराम लग गया था, लेकिन दोनों फिल्मों में साथ काम करते रहे, जैसे ‘शीश महल’ (1950) और ‘नौशेरवान-ए-आदिल’ (1957)। सोहराब ने अपने से 20 साल छोटी महताब से 26 अप्रैल 1946 को शादी की। सोहराब उस समय 48 साल के थे। मेहताब का संबंध गुजरात के एक नवाब परिवार से था और उनका अपनी पहली शादी से इस्माइल नाम का एक लड़का भी था जो उनके व सोहराब के साथ ही रहता था। मेहताब ने अपना एक्टिंग डेब्यू सोहराब के निर्देशन में फिल्म ‘परख’ (1944) से किया था। इस विवाह से उनके एक बेटा मेहेल्ली हुआ जो 1967 में इंग्लैंड में बस गया और बाद में उसने ब्रिटिश आर्टहाउस डीवीडी लेबल सेकंड रन स्थापित किया। सोहराब के बड़े भाई ने उनका परिचय श्री रामकृष्ण परमहंस मिशन से कराया। चूंकि उस समय तक श्री रामकृष्ण अपना शरीर त्याग चुके थे, इसलिए सोहराब ने पूज्य माता श्री शारदा देवी से आध्यात्मिक सलाह का आग्रह किया ताकि वह ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चल सकें। उन्हें योग्य शिष्य के रूप में स्वीकार करते हुए पूज्य माता ने उन्हें मंत्र दीक्षा दी, कलकत्ता के उद्बोधन में। यह सोहराब के शुरुआती जीवन का किस्सा है।
सोहराब ने 1936 में मिनर्वा मूवीटोन की स्थापना की, जिसके तहत वह प्रारम्भ में समकालीन सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाया करते थे, जैसे ‘मीठा ज़हर’ (1938) शराब की लत पर थी और ‘तलाक’ (1938) हिन्दू महिलाओं के तलाक अधिकारों पर आधारित थी। लेकिन उनकी कंपनी ऐतिहासिक फिल्में-‘पुकार’ (1939), ‘सिकंदर’ (1941) व ‘पृथ्वी वल्लभ’ (1943)- बनाने के लिए अधिक विख्यात हुई। यह फिल्में आज भी पसंद की जाती हैं ‘यहूदी’ के साथ, जिसमें सोहराब के साथ दिलीप कुमार व मीना कुमारी भी थे। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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