मदर ऑफ आल डील्स’ से बौखलाया अमरीका

यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए अमरीका ने यूरोप से ज्यादा बलिदान दिया है। रूसी तेल खरीदने पर भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया और बदले में देखिये यूरोप भारत से व्यापार समझौता किया है।’ अमरीकी वित्तमंत्री स्कॉट बेसेंट ने यह प्रतिक्रिया एबीसी न्यूज़ चैनल से बातचीत करते हुए भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच 27 जनवरी, 2026 को सम्पन्न हुए ‘मुक्त व्यापार समझौता’ (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) होने से पहले दी थी। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अमरीका इस समझौते से किस कदर बौखलाया हुआ है। 16वें भारत-ईयू  समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस समझौके का ऐलान किया था। यह हाल के ऐसे किसी भी मुक्त व्यापार समझौते के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा और व्यापक समझौता है। इससे 200 करोड़ लोगों का साझा मार्केट तैयार होगा, जो दुनिया के 25 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद को कवर करेगा। अगर इसे यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है। इसे भारत और यूरोपीय संघ भले डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ का जवाब मानने से इन्कार कर रहे हों, लेकिन इससे पूरी दुनिया को यही संदेश गया है।
आम भारतीयों को समझाना ज़रूरी है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच सम्पन्न ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कही जाना वाला यह समझौता है क्या और इसे इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है? दरअसल जब दो या दो से ज्यादा देश आपस में यह तय कर लेते हैं कि वे एक-दूसरे के सामान और सेवाओं पर टैक्स, पाबंदियां और रुकावटें कम करेंगे या बिलकुल खत्म कर देंगे, ताकि उनके उत्पादों और सेवाओं की पहुंच एक-दूसरे के बाज़ारों तक सहजता से हो सके तो इसे मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) कहते हैं। हाल के सालों में भारत ने दुनिया के 7 देशों के साथ ऐसे मुक्त व्यापार समझौते किये हैं जिसमें ब्रिटेन, ओमान, न्यूज़ीलैंड आदि के साथ हुए समझौते शामिल हैं। इसी कड़ी में 27 जनवरी, 2026 को यूरोपीय संघ के साथ भी ऐसा ही समझौता सम्पन्न हुआ है जिसे ‘मदर ऑफ आल डील्स’ कहा गया है। यह डील 3 बड़ी वजहों से ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ मानी जा रही है।
ईयू कोई देश नहीं बल्कि 27 देशों का समूह और दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत व्यापारिक क्षेत्र है जबकि भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों के साथ आने से 200 करोड़ लोगों की मार्केट बनेगी। जिसमे 40 करोड़ उच्च क्रय क्षमता वाले उपभोक्ता हैं। माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक जब यह समझौता व्याहारिक रूप से लागू होगा तब वैश्विक व्यापार की सप्लाई चेन का चेहरा बदल जाएगा और तब चीन की जगह भारत तेज़ी से उत्पादन केन्द्र बनकर उभरेगा। भारत और यूरोपीय संघ के बीच पिछले साल 12.5 लाख करोड़ रुपये का व्यापार सम्पन्न हुआ था। इस डील के बाद भारतीय उत्पादों की पहुंच यूरोपीय बाज़ारों में और यूरोप की पहुंच भारतीय बाज़ारों के अंतिम कोने तक हो जायेगी। जानकारों का मानना है कि इस डील के लागू होते ही भारत-ईयू का व्यापार दोगुना हो जाएगा, इससे भारत अमरीकी टैरिफ  के नकारात्मक असर को कम कर सकेगा। दूसरी ओर यूरोपीय देशों की चीन पर निर्भरता कम होगी।
समझौते के तहत 90 फी सदी से ज्यादा सामान पर टैरिफ  खत्म करने की बात पर सहमति बनी। कृषि, डेयरी, ऑटो, शराब जैसे सेक्टर्स पर कोटा या धीरे-धीरे टैरिफ  में कटौती की बात तय हुई है। कुल मिलाकर देखें तो भारत और यूरोपीय संघ के बीच डील के 24 में से 20 चौप्टर्स पर सहमति हो चुकी है।
समझौता लागू होने के बाद ईयू का भारत पर लगने वाला औसत टैरिफ  3.8 फीसदी से घटकर 0.1 फीसदी हो जायेगा, जिससे भारतीय निर्यात के 6.4 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ने की उम्मीद है। इस डील से अब यूरोप में भारतीय कपड़े ज्यादा बिकेंगे क्योंकि अभी तक हमारे कपड़े और चमड़े पर ईयू 10 फीसदी ड्यूटी लगाता रहा है, जो कि इस डील के बाद शून्य हो जाएगी। इस डील के बाद यूरोप में भारतीय कपड़े और जूते काफी सस्ते हो जाएंगे, जिससे इनकी मांग बढ़ेगी। भारत आने वाली यूरोपीय शराब और वाइन पर अभी जहां 150 फीसदी का टैरिफ लगता है, वह ट्रेड डील के लागू होते ही 75 प्रतिशत हो जायेगा। यूरोपीय कार उत्पादन की प्रीमियर सेगेमेंट की कारें खासकर बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज, पोर्शे वगैरह का भारत में प्रवेश काफी आसान हो जाएगा। सरकार अभी तक इन पर 110 फीसदी टैरिफ  लगाती है, जो अगले 5 से 10 सालों में घटकर महज 10 फीसदी तक रह जाएगा।  इसी तरह यूरोप को इस डील से कैमिकल निर्यात में भी फायदा होगा। क्योंकि मशीनरी पर 44 प्रतिशत, कैमिकल पर 22 फीसदी और फार्मा सेक्टर पर लगने वाला 11 फीसदी टैरिफ आने वाले कुछ सालों में घटकर शून्य हो जायेगा। अब अगर इस समझौते से अमरीका बौखलाता है तो यह उसका सिरदर्द है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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