बांग्लादेश में अगर बिजली जाती है तो मक्का क्यों नहीं ?

बांग्लादेश में अगस्त-2024 में शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। आश्चर्य है कि क्रिकेट लीग के.के.आर. की टीम से बांग्लादेशी खिलाड़ी को हटवा कर अपना राष्ट्रवाद सिद्ध कर रहे संगठन अदानी द्वारा बांग्लादेश को बेची जा रही बिजली की मात्रा बढ़ने के आंकड़े पर शुतुरमुर्ग बन जाते हैं। बदले हालात और भारत के साथ रिश्तों में आई खटास का खमियाजा बिहार के मक्का पैदा करने वाले किसानों को उठाना पड़ रहा है लेकिन गोड्डा (झारखंड) के कोयला आधारित बिजली घर से बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति से अदानी की आमदनी में इजाफा हो रहा है। 
सभी जानते हैं कि कोसी और सीमांचल में अच्छी मक्का होती है। वहां का किसान बांग्लादेश के बाज़ार को आपूर्ति के लिए ही जम कर मक्का उगाता रहा है। दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा तो बीते छह महीने से मक्का का निर्यात बंद हो गया। विदित हो यहां उगने वाली करीब 70 प्रतिशत मक्का का निर्यात बांग्लादेश में होता रहा है। स्थानीय बाज़ार में मक्का की आवक ज्यादा हो गई तो पिछले साल 2700 रुपये प्रति क्विंटल तक बिकने वाले मक्के को अभी 1800 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से भी खरीदार नहीं मिल रहे हैं। बहुत से किसानों को भरोसा है कि कुछ दिन में फिर निर्यात सामान्य हो जाएगा। अंतत: उन्होंने अपने घर-गोदामों में मक्का का स्टॉक कर लिया। बरसात के साथ सीलन और भंडारण की परेशानी बढ़ी तो अब किसान इस सोने से दमकती मक्का को गाय-भैंस को खिला रहे हैं।
स्थानीय किसान बताते हैं मक्के का भाव साल-दर-साल बढ़ रहा था। उन्नत बीज और तकनीकी के इस्तेमाल से उनकी फसल भी बढ़िया हो रही थी लेकिन बांग्लादेश का रास्ता बंद होते ही मक्का को कौड़ियों के दाम खरीदने वाले नहीं मिल रहे। आज इसके दाम बीते पांच साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। 
किसान को प्रभावित करने वाले ऐसे हालता प्याज, मसाले आदि के साथ भी हैं। भारत ने हाल के समय में गैर-बासमती चावल पर कई प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन बांग्लादेश के साथ विशेष कोटा रहता था। अब तनाव के कारण यह व्यापार भी अनिश्चितता के घेरे में है। अदरक, मिर्च और अंगूर जैसे उत्पादन जो ट्रकों में भरकर सीमा पर जाते हैं, वे बॉर्डर पर देरी होने के कारण अक्सर सड़ जाते हैं। इससे छोटे व्यापारियों को सीधे तौर पर लाखों का घाटा होता है। बांग्लादेश दुनिया का बड़ा गारमेंट एक्सपोर्टर है और वह इसके लिए भारत से धागा और कच्चा कपास खरीदता है। वहां राजनीतिक उथल-पुथल से फैक्ट्रियां बंद हुईं, जिससे भारत के सूरत, तिरुपुर और लुधियाना की स्पिनिंग मिलों का माल डंप हो गया है। खासकर उत्तर-पूर्वी राज्यों के सीमावर्ती राज्यों में लगने वाली खुली हाट में इस तनाव का व्यापक असर देखा गया। आश्चर्य है कि इस सबके बीच अदानी की बिजली के ऊपर कोई असर नहीं हुआ। 
इसके ठीक विपरीत दोनों देशों की सरकारों के आंकड़े बताते हैं कि अदानी पावर का बांग्लादेश को बिजली निर्यात बढ़ा रहा है। विदित हो झारखंड के गोड्डा स्थित प्लांट की क्षमता 1600 मेगावाट है और अनुबंध के अनुसार इसका शत प्रतिशत उत्पादन बांग्लादेश को भेजा जाना है। वैसे बांग्लादेश सरकार द्वारा नियुक्त एक पैनल ने इस आपूर्ति को अत्यधिक महंगा बताया था। इसके बावजूद अदानी के व्यापार में कमी नहीं आई। 
बांग्लादेश पावर ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश में बिजली की भारी कमी को पूरा करने का काम अडानी कर रहा है। सन् 2025 में बांग्लादेश को रिकॉर्ड 8.63 बिलियन किलोवाट-घंटा बिजली की आपूर्ति गोड्डा से की गई, जो कुल आपूर्ति का 8.2 प्रतिशत है। वहीं अन्य भारतीय कंपनियों से होने वाला आयात मामूली रूप से बढ़कर 7.92 मिलियन किलोवाट-घंटा हो गया। 
इस साल जनवरी के पहले 27 दिनों के दौरान कुल बिजली आपूर्ति में अदानी की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत रही। चूंकि बांग्लादेश में बिजली का उत्पादन कोयले की जगह जीवाश्म तेल से होता है सो वह महंगा पड़ता है। फिर बिजली उत्पादन से उपजे पर्यावरण संकट का खतरा भी नहीं है। 
समझना होगा कि वित्तीय वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत से बांग्लादेश को होने वाले निर्यात में लगभग 6.19 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। तख्ता पलट बाद अगस्त 2024 में यह गिरावट 19 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। एक तो बांग्लादेश में डॉलर की कमी है और वहां आर्थिक संकट भी है, सो भारतीय निर्यातकों को उनके माल का भुगतान मिलने में देरी हो रही है।  लॉजिस्टिक्स और सीमा पर रुकावट, भूमि बंदरगाहों (जैसे पेट्रापोल-बेनापोल) पर सुरक्षा कारणों और प्रदर्शनों की वजह से ट्रकों की आवाजाही कई बार ठप्प हुई, जिससे माल समय पर नहीं पहुंच पाया। अप्रैल 2025 के बाद कुछ भूमि बंदरगाहों से भारतीय धागे और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क से जुड़ी चुनौतियां बढ़ी हैं।

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